यदि कोई स्वयं को सजाता है, तो दर्पण में उसका प्रतिबिंब भी सजाया हुआ दिखाई देगा. उसी प्रकार, चूँकि हम कृष्ण के प्रतिबिंब हैं, यदि हम कृष्ण का श्रंगार करते हैं तो हमारा भी श्रंगार हो जाएगा. बाइबल में कहा गया है कि मानव को भगवान की छवि में बनाया गया था, और इसका अर्थ है हम भगवान की छवि का प्रतिबिंब हैं. ऐसा नहीं है कि हम अपने रूप के आधार पर भगवान के किसी रूप का अविष्कार या कल्पना करते हैं. जो लोग अवतारवाद के मायावाद दर्शन का पालन करते हैं, वे कहते हैं, “परम सत्य अवैयक्तिक है, लेकिन चूंकि हम व्यक्ति हैं हम कल्पना करते हैं कि परम सत्य भी कोई व्यक्ति है,” यह एक त्रुटि है, और वास्तव में सच इसके ठीक विपरीत है. हमारे दो हाथ, दो पैर, और एक सिर हैं क्योंकि स्वयं भगवान का रूप भी ऐसा ही है. हमारा व्यक्तिगत रूप है क्योंकि हम भगवान के प्रतिबिंब हैं. कृष्ण का शरीर पूर्णतः आध्यात्मिक है (सद्-चित-आनंद-विग्रह), लेकिन हमारे पास उस आध्यात्मिक को देखने की आँखें नहीं हैं. हमारी आदत भौतिक, स्थूल (जड़) चीज़ों को देखने की है. हम पत्थर, धातु, लकड़ी, और अन्य तत्व देख सकते हैं, और चूंकि कृष्ण ही सबकुछ हैं, हमारी दोषपूर्ण आँखों के लिए दृश्यमान होने के लिए वे इन रूपों में दिखाई देते हैं. ऐसा नहीं है कि कृष्ण पत्थर हैं या कि हम किसी पत्थर की पूज कर रहे हैं. हम कृष्ण की पूजा कर रहे हैं, लेकिन चूंकि हम पत्थर जैसे भौतिक पदार्थ के अलावा कुछ नहीं देख पाते, कृष्ण कृपापूर्वक पत्थर में उकेरे गए रूप में दिखाई देते हैं. जैसे हम सभी जीव हैं, कृष्ण, भगवान, भी एक जीव हैं, कृष्ण अवैयक्तिक नहीं है.चूंकि हम सभी अलग-अलग व्यक्ति हैं लेकिन हमारा ज्ञान और एश्वर्य सीमित है, अव्यक्तिवादी इस अवधारणा से सामंजस्य नहीं बैठा पाते कि सभी चीज़ों का परम, मूल, असीमित कारक भी कोई व्यक्ति हो सकता है. चूंकि हम सीमित हैं और भगवान असीमित हैं, मायावादी या अवतारवादी, अपने विपन्न ज्ञान के कारण, सोचते हैं कि भगवान अवैयक्तिक होंगे. भौतिक तुलना करते हुए, वे कहते हैं कि ठीक आकाश की तरह, जिसे हम असीमित समझते हैं, अवैयक्तिक है, यदि भगवान असीमित हैं तो वे अवैयक्तिक भी होंगे. लेकिन वैदिक निर्देश ऐसा नहीं है. वेद निर्देश करते हैं कि भगवान एक व्यक्ति हैं. कृष्ण एक व्यक्ति हैं, और हम भी व्यक्ति हैं, लेकिन अंतर यह है कि उनकी पूजा करनी होगी जबकि हमें पूजक बनना होगा. राजा या राष्ट्रपति व्यक्ति होता है, और नागरिक भी व्यक्ति होते हैं, लेकिन अंतर यह है कि राष्ट्रपति या राजा श्रेष्ठ व्यक्ति होते हैं, जिन्हें सभी प्रकार से सम्मान दिया जाना चाहिए.

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “रानी कुंती की शिक्षाएँ” पृ. 87, 88, 161, 213

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