परमार्थ कृष्ण अद्वितीय हैं. उन्होंने स्वयं-रूप, स्वयं-प्रकाश, तद्-एकात्म, प्रभाव, वैभव, विलास, अवेश, और जीव के रूप में स्वयं को स्वयं ही विस्तृत किया है, सभी को संबंधित व्यक्तित्वों के अनुकूल असंख्य ऊर्जाएँ प्रदान की गई हैं. पारलौकिक विषयों के ज्ञानी पंडितों ने सावधानी पूर्वक विश्लेषण करके परमार्थ कृष्ण को चौंसठ प्रमुख गुणों से युक्त जाना है. लेकिन श्रीकृष्णगुणों के शत प्रतिशत धारक हैं. और उन अवतारों की श्रेणी के स्तर तक उनके व्यक्तिगत विस्तार जो सभी विष्णु-तत्व हैं जैसे स्वयं-प्रकाश, तद्-एकात्म, इन पारलौकिक विशेषताओं के तिरयान्वे प्रतिशत तक धारक होते हैं. भगवान शिव, जो न तो अवतार हैं न ही उनके मध्य हैं, लगभग चौरासी प्रतिशत गुणों के धारक हैं. लेकिन जीव, या जीवन की विभिन्न स्थितियों में भिन्न-भिन्न जीव, गुणों के अठहत्तर प्रतिशत की सीमा तक धारक होते हैं.

भौतिक अस्तित्व की बाधित स्थिति में, जीव इन गुणों को बहुत छोटी मात्रा में धारण करते हैं, जो जीव के पवित्र जीवन के संबंध में विभिन्न होते हैं. सबसे श्रेष्ण जीव ब्रम्हा हैं, जो एकल ब्रम्हांड के परम व्यवस्थापक हैं. वे पूर्ण रूप से अठहत्तर प्रतिशत गुणों के धारक हैं. अन्य सभी देवता कम मात्रा में समान गुणों के धारक हैं, जबकि मानव में ये गुण बहुत क्षीण मात्रा में होते हैं. मानव के लिए श्रेष्ठता का मानक गुणों को पूर्णता में अठहत्तर प्रतिशत तक विकसित करना है. प्राणी कभी भी शिव, विष्णु या भगवान कृष्ण के समान गुण नहीं धारण कर सकते. एक जीव पूर्णता में अड़तालीस प्रतिशत पारलौकिक विशेषताओं का विकास करके ईश्वरीय बन सकता है, लेकिन वह शिव, विष्णु या कृष्ण जैसा भगवान नहीं बन सकता. वह कालांतर में ब्रम्हा बन सकता है. आध्यात्मिक रूप से आकाश में स्थित ग्रहों में रहने वाले ईश्वरीय प्राणी हरि-धाम और महेशधाम नामक विभिन्न आध्यात्मिक ग्रहों में भगवान के अनन्त सहयोगी होते हैं. सभी आध्यात्मिक ग्रहों से ऊपर भगवान कृष्ण का धाम कृष्णलोक या गौलोक वृंदावन कहलाता है, और अठहत्तर प्रतिशत उपरोक्त गुणों को पूर्णता में विकसित करके, श्रेष्ण जीव, वर्तमान भौतिक शरीर का त्याग करने के बाद कृष्णलोक में प्रवेश ले सकता है.

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी) “श्रीमद् भागवतम्”, प्रथम सर्ग, अध्याय 3 – पाठ 28

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