जब भगवान अवतार लेते हैं, तो उनके दो अभीष्ट होते हैं राक्षसों का नाश करना और साधुओं की रक्षा करना, जो आज्ञाकारी भक्त हैं. साधूनाम् शब्द, जिसका अर्थ “संत सदृश व्यक्ति” होता है, भक्तों के संदर्भ में है. इसका सांसारिक ईमानदारी या बेईमानी, नैतिकता या अनैतिकता से कोई संबंध नहीं होता; इसका भौतिक गतिविधियों से कुछ लेना देना नहीं है. कभी-कभी हमें विचार आ सकता है कि साधु शब्द का संदर्भ किसी ऐसे व्यक्ति से है जो भौतिक रूप से अच्छा या सदाचारी है, लेकिन वास्तविकता में साधु शब्द का संदर्भ ऐसे व्यक्ति से है जो पारलौकिक स्तर पर हो. इसलिए एक साधु का अर्थ भक्त होता है, क्योंकि जो आध्यात्मिक सेवा में रत होता है वह भौतिक गुणों से परे हो जाता है (स गुणन समतित्यैतन). जब कृष्ण प्रकट होते हैं, तो वे भक्तों की रक्षा और राक्षसों का संहार करते हैं. इसलिए अपने नारायण रूप में कृष्ण के चार हाथ होते हैं. इन दो हाथों में वे राक्षसों का संहार करने के लिए एक चक्र और दंड रखते हैं, और अन्य दो हाथों में वे शंख और कमल रखते हैं जो भक्तों को आशीर्वाद देने और उनकी रक्षा करने के लिए हैं. भगवान कहते हैं, कौंतेय प्रतिजनिः न मे भक्तः प्रनाश्यति. इस प्रकार कृष्ण अपने शंख का नाद करते हैं, “मेर भक्त कभी पराजित नहीं होंगे.” और कमल के पुष्प के साथ वे अपना आशीर्वाद देते हैं. कमल पुष्प, जो अक्सर लक्ष्मी के हाथ में भी दिखाई देता है, आशीर्वाद का प्रतीक है. अब कुछ लोग कह सकते हैं कि कृष्ण इस या उस उद्देश्य से प्रकट हुए हैं, लेकिन वास्तविक निष्कर्ष यही है कि कृष्ण स्वयं अपने आनंद के लिए प्रकट होते हैं, इसलिए नहीं कि वे किसी अन्य कर्तव्य से बंधे हैं. हम जन्म लेते हैं क्योंकि हम अपने कर्म से बंधे हैं, लेकिन पूर्ण स्वतंत्र होते हुए, कृष्ण किसी अन्य के अनुरोध पर या कर्म के कारण नहीं आते, बल्कि वे स्वयं अपनी इच्छा (आत्म मायाय) द्वारा आते हैं. कृष्ण की बाह्य, भौतिक ऊर्जा के कारण हम जन्म लेने के लिए विवश हैं, लेकिन कृष्ण किसी अन्य की माया, या ऊर्जा से नियंत्रित नहीं होते, और इसलिए वे ऐसी परिस्थिति में जन्म नहीं लेते. माया, भ्रामक ऊर्जा, कृष्ण के नियंत्रण में है, तो माया उन्हें कैसे नियंत्रतित कर सकती है? जो सोचते हैं कि हमारी तरह, कृष्ण माया से नियंत्रित हैं उन्हें भगवद्-गीता में मूढ़, एक मूर्ख के रूप में वर्णित किया गया है (अवजानाति मढ़ मूढ़ मनुसिम् तनुम् आश्रितम्).

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “रानी कुंती की शिक्षाएँ” पृ. 85, 134

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