परम भगवान सभी, भौतिक और पारलौकिक दोनों संसारों के दृष्टा हैं. दूसरे शब्दों में सभी संसारों के परम लाभार्थी और भोगने वाले परम भगवान ही हैं, जैसा कि भगवद्-गीता (5.29) में पुष्टि की गई है. आध्यात्मिक संसार उनकी शाश्वत शक्ति का प्रकटन है, औऱ भौतिक संसार उनकी बाह्य शक्ति का प्रकटन है. जीव भी उनकी अल्प शक्ति हैं, और स्वयं अपनी इच्छा से वे या तो पारलौकिक या भौतिक संसार में रह सकते हैं. भौतिक संसार जीवों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं है क्योंकि वे आध्यात्मिक रूप से भगवान के साथ एक होते हैं और भौतिक संसार में जीव भौतिक संसार के नियमों द्वार बद्ध हो जाते हैं. भगवान चाहते हैं कि सभी जीव, जो उनके ही अंश हैं, उनके साथ पारलौकिक संसार में रहें, और भौतिक संसार में बद्ध आत्माओं के प्रबोधन के लिए, सभी वेद और प्रकट शास्त्र होते हैं–जो व्यक्त रूप से बद्ध आत्माओं को वापस घर, भगवान के पास जाने की याद दिलाने के लिए हैं. दुर्भाग्यवश बद्ध जीवात्माएँ, जो यद्यपि बद्ध जीवन के त्रिविध कष्ट भोग रहे हैं, वापस भगवान के पास जाने के प्रति गंभीर नहीं होते हैं. ये पापों और गुणों की जटिलता से, जीवन जीने की उनकी पथभ्रष्ट पद्धति के कारण होता है. उनमें से कुछ जो कर्मों के गुणी होते हैं भगवान के साथ अपने खोए संबंध को पुनर्स्थापित करना शुरू कर देते हैं, लेकिन वे भगवान के व्यक्तिगत गुणों को समझने में असमर्थ होते हैं. जीवन का मूल उद्देश्य भगवान से संपर्क बनाना और उनकी सेवा में लग जाना होता है. यही जीवों की प्राकृतिक स्थिति होती है, लेकिन जो निर्वैयक्तिवादी होते हैं भगवान की प्रेममयी सेवा करने में असमर्थ होते हैं उन्हे उनके निर्वैयक्तिक गुण, विराट-रूप, या ब्रम्हांडीय रूप का ध्यान करने का सुझाव दिया जाता है. किसी न किसी विधि से, व्यक्ति को वास्तविक प्रसन्नता प्राप्त करना हो, और अपनी बंधनमुक्त स्थिति अर्जित करना हो तो उसे भगवान के साथ अपने विस्मृत संबंध को पुनर्स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए. कम बुद्धिमान शुरुआत करने वालों के लिए, निर्वैयक्तिक गुण, विराट-रूप, या भगवान के ब्रम्हांडीय रूप का ध्यान करना, धीरे-धीरे व्यक्ति को व्यक्तिगत संपर्क तक उन्नत कर देगा. यहाँ व्यक्ति को पिछले अध्यायों में निर्दिष्ट विराट-रूप पर ध्यान करने का सुझाव दिया गया है ताकि वह समझ सके कि किस प्रकार विभिन्न ग्रह, समुद्र, पर्वत, नदियाँ, पक्षी, पशु, मानव, देवता और जिसकी भी हम कल्पना कर सकते हैं वह सब भगवान के विराट स्वरूप के ही विभिन्न अंश और अंग हैं. इस प्रकार से विचार करना भी परम सत्य पर ध्यान करना है, और जैसे ही ऐसा ध्यान प्रारंभ होता है, व्यक्ति अपने ईश्वरीय गुण विकसित कर लेता है, और समस्त संसार उसके सभी लोगों के लिए एक प्रसन्न और शांत निवास दिखने लगता है. बिना भगवान पर इस प्रकार के ध्यान के, मानव मात्र के सभी अच्छे गुण उसकी वैधानिक स्थिति के बारे में मिथ्या धारणा से ढँक जाते हैं, और बिना ऐसे विकसित ज्ञान के, मानव के लिए समस्त संसार एक नर्क बन जाता है.

<span style=”color: #00CCFF;”>अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी) “श्रीमद् भागवतम्”, द्वितीय सर्ग, अध्याय 2- पाठ 14</span>

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