सुदर्शन का अर्थ “शुभ दृश्य” होता है. सुदर्शन चक्र भगवान के परम व्यक्तित्व की दृष्टि होती है जिससे वे समस्त संसार को रचते हैं. सा ऐक्षत, सा असृजत. यह वैदिक संस्करण है. सुदर्शन चक्र जो उत्पत्ति का मूल है और भगवान को सबसे प्रिय है, उसमें सहस्त्र शलाकाएँ होती हैं. यह सुदर्शन चक्र अन्य सभी शस्त्रों के बल का संहारक है, अंधकार का संहारक है, और भक्ति सेवा के बल का प्रदर्शक है; यह धार्मिक सिद्धांतों को स्थापित करने का साधन होता है, और यह समस्त अधार्मिक कृत्यों का संहारक है. बिना उसकी दया के, ब्रम्हांड का पालन नहीं हो सकता, और इसलिए भगवान के परम व्यक्तित्व के द्वारा सुदर्शन चक्र को प्रयुक्त किया जाता है.

स्रोत – अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद् भागवतम्” , नवाँ सर्ग, अध्याय 5 – पाठ 5 व परिचय

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