अबुद्धः शब्द यहाँ महत्वपूर्ण है. केवल अज्ञा के कारण, मूर्ख साधारण उपद्रवी परम भगवान को अनुचित ढंग से समझते हैं और अपनी मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं को निर्दोष व्यक्तियों के बीच प्रसारित करते हैं. परम भगवान श्रीकृष्ण ही भगवान के मूल प्रधान व्यक्तित्व हैं, और जब वे सभी के सम्मुख साक्षात् उपस्थित थे, तो उन्होंने कर्म के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण दिव्य शक्ति प्रदर्शित की. वे अपनी इच्छानुसार गतिविधि करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र हैं, लेकिन उनके कार्य-कलाप आनंद, ज्ञान और अमरत्व से परिपूर्ण होते हैं. उनकी विभिन्न शक्तियाँ प्राकृति क्रम की योजना में संपूर्णता से कार्य करती हैं, और उनकी विभिन्न शक्तियों के प्रतिनिधित्व द्वारा कार्य कर रही हैं. वे शाश्वत रूप से परम स्वतंत्र बने रहते हैं. जब वे विभिन्न प्राणियों के प्रति अपनी अहेतुक दया द्वारा भौतिक संसार में उतरते हैं, तो वे ऐसा स्वयं अपनी शक्ति से करते हैं. वे प्रकृति के भौतिक नियमों की किसी भी परिस्थिति के अधीन नहीं हैं, और वे वैसे ही अवतरित होते हैं जैसे वे मूल रूप से हैं. मानसिक अटकल लगाने वाले उन्हें परम व्यक्तित्व के रूप में गलत समझते हैं, और वे उनकी अवैयक्तिक विशेषताओं को सब कुछ होने वाला अबोध्य ब्राह्मण मान लेते हैं. इस तरह की अवधारणा भी बद्ध जीवन का उत्पाद है क्योंकि वे स्वयं अपनी व्यक्तिगत क्षमता से आगे नहीं जा सकते.

इसलिए, वह जो भगवान को उसकी सीमित शक्ति के स्तर पर सोचता है, सामान्य व्यक्ति होता है. ऐसे व्यक्ति को विश्वास नहीं दिलाया जा सकता कि भगवान का परम व्यक्तित्व भौतिक प्रकृति की रीतियों से हमेशा अप्रभावित रहता है.वह यह नहीं समझ सकता कि सूर्य संक्रामक पदार्थ से हमेशा अप्रभावित रहता है. मानसिक कल्पना करने वाले हर वस्तु की तुलना स्वयं अपने प्रयोगात्मक ज्ञान के दृष्टिकोण से करते हैं. इसलिए जब भगवान वैवाहिक बंधन में एक सामान्य व्यक्ति की तरह व्यवहार करते दिखाई देते हैं, तो वे उन्हें वैसा ही समझते हैं, बिना यह विचार करे कि भगवान एक ही बार में सहस्त्र या उससे अधिक पत्नियों से विवाह कर सकते हैं. सीमित ज्ञान के चलते वे चित्र के एक ही पक्ष को ही स्वीकार करते हैं जबकि दूसरे पर अविश्वास करते हैं. इसका अर्थ है कि वे केवल अज्ञानतावश ही भगवान कृष्ण को अपने जैसा मानते हैं और अपने ही निष्कर्ष निकालते हैं, जो मूर्खतापूर्ण और श्रीमद्-भागवतम् के मूलपाठ से अप्रमाणिक होते हैं.

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी) “श्रीमद् भागवतम्”, प्रथम सर्ग, अध्याय 11 – पाठ 37

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