प्रत्येक सहस्त्राब्दि में परम भगवान को विभिन्न प्रकार से पूजा जाता है. सत्य-युग में आत्म साक्षात्कार की प्रक्रिया ध्यान थी, और इस प्रक्रिया की शिक्षा भगवान के श्वेत अवतार द्वारा दी जाती है. इस अवतार ने कदम्ब ऋषि को वर दिया था जिसके द्वारा वे भगवान के परम व्यक्तित्व के अवतार को पुत्र के रूप में पा सकते थे. सत्य युग में, सभी लोग कृष्ण का ध्यान किया करते थे, और प्रत्येक जीव को पूर्ण ज्ञान था जो कि तब भी पिछले युगों के लिए सुझाई गई ध्यान प्रक्रिया की साधना का प्रयास कर रहे थे. त्रेता युग में सुझाई गई आत्म साक्षात्कार की प्रक्रिया त्याग करना थी, और इसकी शिक्षा भगवान के लाल अवतार द्वारा दी जाती थी. द्वापर सहस्त्राब्दि में, कृष्ण व्यक्तिगत रूप से उपस्थित थे, और सभी लोग उनकी पूजा इस मंत्र से करते थे: “नमस्ते वासुदेवाय नमः संकर्षण्य प्रद्युम्नयनुरुद्धाय तुभ्यम् भगवते नमः” “मैं भगवान के परम व्यक्तित्व, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, और अनिरुद्ध के प्रति अपनी निष्ठा अर्पित करता हूँ”. यह द्वापर युग के लिए आत्म साक्षात्कार की प्रक्रिया यही थी. अगले सहस्त्राब्द – कलि-युग के इस वर्तमान काल- में भगवान कृष्ण के पवित्र नाम के जाप की दीक्षा देने के लिए अवतार लेते हैं. इस युग में भगवान पीले रंग में हैं (चैतन्य महाप्रभु), और वे कृष्ण नाम के जाप द्वारा भगवान का प्रेम सिखाते हैं. इस शिक्षा को स्वयं कृष्ण द्वारा व्यक्तिगत रूप से संचालित किया जाता है, और वे भगवान के प्रेम का प्रदर्शन उनका अनुसरण करने वाले सहस्त्रों लोगों के साथ जाप, गायन और नृत्य करके प्रदर्शित करते हैं. भगवान के परम व्यक्तित्व के इस विशिष्ट अवतार की भविष्यवाणी श्रीमद्-भागवतम् (11.5.32): “कृष्ण-वर्णम् त्विषकृष्णम् सांगोपांगस्त्र-प्रसादम् यज्ञैः संकीर्तन-प्रयैर याजंति हि सुमेधसः” “कलि के युग में भगवान एक भक्त के रूप में अवतार लेते हैं, जिनका रंग पीताभ है, और वे हमेशा हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जाप करते हैं. यद्यपि वे कृष्ण ही हैं, उनका वर्ण द्वापर युग के कृष्ण के समान सांवला नहीं है, अपितु सुनहरा है. कलि युग में भगवान परम भगवान के प्रेम की शिक्षा संकीर्तन आंदोलन के माध्यम से देते हैं, और जो जीव बुद्धिमान हैं वे आत्म-साक्षात्कार की इस प्रक्रिया को अपनाते हैं”.

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2012 संस्करण, अंग्रेजी), “भगवान चैतन्य, स्वर्ण अवतार की शिक्षाएँ”, पृ. 100 और 101

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