लोग अक्सर इस प्रभाव में रहते हैं कि देवता शक्तिशाली होते हैं, लेकिन लोग यह नहीं जानते कि कृष्ण उन सबसे ऊपर हैं. देवताओं में उच्चतम, ब्रम्हा, ने ईश्वरः परमह कृष्णः सच-चिद-आनंद-विग्रहः (ब्रम्ह संहिता 5.1) श्लोक में इस संबंध में अपने विचार कहे हैं: “कृष्ण सर्वोच्च नियंत्रक हैं, और उनका शरीर ज्ञान, आनंद, और अमरत्व से भरा हुआ है”. केवल एक स्वामी-कृष्ण हैं. अन्य सभी उपाधीन हैं, तैंतीस करोड़ देवता होते हैं. प्रत्येक भृत्य या सेवक है. जब कृष्ण आदेश देते हैं, “मेरे प्रिय श्री अमुक-अमुक, अब अपना स्थान छोड़ दो और जाओ,” तब व्यक्ति को जाना पड़ता है. इसलिए प्रत्येक व्यक्ति एक सेवक है. यही स्थिति भगवान ब्रम्हा और किसी चींटी की भी है. यस्त्व इंद्रगोपम अथवेंद्रम अहो स्व-कर्म. भगवान इंद्र से लेकर इंद्रगोप, एक मामूली कीट, तक सभी अपने कर्म के परिणाम भोग रहे हैं. देवी दुर्गा इतनी बलशाली होती हैं कि वे निर्माण, पालन और संहार कर सकती हैं. हालाँकि, वे कृष्ण से स्वतंत्र कार्य नहीं कर सकतीं. वे कृष्ण की छाया के समान हैं. एक साधु जानता है कि प्रकृति, कृष्ण के निर्देशानुसार कार्य कर रही है. समान रूप से, एक पुलिस कर्मी जानता है कि वह स्वतंत्र रूप से नहीं बल्कि सरकार के आदेशों के अधीन कार्य कर रहा है. यह संज्ञान उस संदर्भ में आवश्यक है कि वह पुलिसकर्मी जिसकी कुछ शक्तियाँ हैं, यह न सोचे कि वह भगवान हो गया है. नहीं, भगवान इतने तुच्छ नहीं हैं. भगवान की कई ऊर्जाएँ हैं, और इन ऊर्जाओं में से एक दुर्गा है. ऐसा नहीं हैं कि वही सभी कुछ हैं, क्योंकि लाखों दुर्गा हैं, उसी तरह जैसे लाखों शिव और लाखों ब्रह्मांड हैं. यद्यपि लाखों देवता हैं, भगवान एक ही हैं. ऐसा नहीं है कि लाखों भगवान हों. निश्चित ही, भगवान लाखों रूपों में विस्तार ले सकते हैं, लेकिन वह अलग बात है. एक भक्त परम भगवान के व्यक्तित्व के सेवक के रूप में ही देवताओं का सम्मान करता है, देवता को परम शक्ति मान कर नहीं. जो देवताओं को सर्वोत्तम मानता है वह व्यक्ति भगवान को नहीं जानता. ऐसे लोग कम बुद्धिमान होते हैं. एक भक्त देवताओं का सम्मान करता है, लेकिन वह जानता है कि परम भगवान कृष्ण ही हैं. कृष्णस् तु भगवान स्वयम्. देवताओं को भगवान के सेवकों के रूप में नियुक्त किया गया है, कृष्ण की एक पत्नी जाम्बवती और उनकी सखी कालिंदी के बीच एक संवाद में सभी देवताओं का एक वर्णन मिलता है. जाम्बवती ने पूछा, “हमारे कृष्ण की परिक्रमा करने वाला व्यक्तित्व कौन है?” कालिंदी ने उत्तर दिया, “वे दुर्गा हैं, सभी सांसारिक कार्य-कलापों की प्रमुख.” फिर जाम्बवती ने पूछा, “प्रार्थना करने वाला व्यक्ति कौन है?” कालिंदी ने उत्तर दिया, “वे भगवान ब्रम्हा हैं.” फिर जाम्बवती ने पूछा, “वह व्यक्ति कौन है जो पृथ्वी पर गिर गया है और कृष्ण का सम्मान कर रहा है?” कालिंदी ने उत्तर दिया, “वे इंद्र, स्वर्ग के राजा हैं.” जाम्बवती ने अगला प्रश्न किया, “वह कौन व्यक्ति है जो देवताओं के साथ आया है और उनके साथ परिहास कर रहा है?” कालिंदी ने उत्तर दिया, “वे मेरे ज्येष्ण भ्राता, यमराज हैं, मुत्यु के अधिकारी.” यह संवाद यमराज सहित सभी देवताओं का वर्णन प्रदान करता है. भगवद्-गीता में भगवान के परम व्यक्तित्व कृष्ण कहते हैं कि प्रकृति के नियम उनके संचालन में संपूर्ण हैं. किसी को भी यह नहीं सोचना चाहिए कि प्रकृति अपने-आप, बिना किसी देख-रेख के कार्य कर रही है. वैदिक साहित्य कहता है कि बादलों का नियंत्रण इंद्र देवता करते हैं, सूर्य भगवान द्वारा ऊष्मा प्रदान की जाती है, कोमल चंद्र आभा चंद्रमा द्वारा प्रदत्त है और पवन का बहाव वायु देवता की व्यवस्था के अधीन हो रहा है. लेकिन इन सभी देवताओं के ऊपर भगवान का परम व्यक्तित्व, सर्वोच्च जीव है. नित्यो नित्यनाम चेतनास चेतनानम।. देवता सामान्य जीव भी होते हैं, लेकिन अपनी स्वामीभक्ति-अपनी आध्यात्मिक सेवा- के कारण उक्त पदों पर उन्नत किया गया है. ये विभिन्न देवता, या निदेशक, जैसे चंद्र, वरुण और वायु, को अधिकारी देवता कहा जाता है. देवता विभागीय प्रमुख होते हैं. परम भगवान के शासन में केवल एक या दो-तीन ग्रह नहीं होते; बल्कि लाखों ग्रह और लाखों ब्रम्हांड होते हैं. भगवान के परम व्यक्तित्व की सत्ता विशाल है, और उसमें सहायकों की आवश्यकता होती है. देवताओं को उनके शरीर के अंग माना जाता है. इन सबका वर्णन वैदिक साहित्य में किया गया है. सूर्य भगवान, चंद्र भगवान, अग्नि भगवान और वायु भगवान परम भगवान के निर्देशों के अधीन कार्य कर रहे हैं. इसकी पुष्टि भगवद-गीता (9.10) में की गई है, मयध्यक्षेन प्रकृतिः सुयते स-चरचरम. प्राकृतिक नियमों का संचालन उनके अधीन किया जाता है. चूँकि वे नेपथ्य में हैं, सभी कार्य समय पर और नियमित रूप से संपन्न होते हैं.

स्रोत : अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “आत्म साक्षात्कार का विज्ञान”, पृ.343
अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2007 संस्करण, अंग्रेजी), “भगवान कपिल, देवाहुति के पुत्र की शिक्षाएँ”, पृ. 17,155, 244

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