बाली महाराज वामनदेव को दान देना चाहते थे, किंतु भगवान ने अपने शरीर का विस्तार कुछ इस प्रकार से किया कि उन्होंने बाली महाराज को दर्शा दिया कि ब्रम्हांड में उपस्थित सभी वस्तुएँ पहले से ही उनके शरीर में विद्यमान हैं. वास्तव में कोई भी भगवान के परम व्यक्तित्व को कुछ भी नहीं दे सकता, क्योंकि वे सभी वस्तुओं में परिपूर्ण हैं. कई बार हम किसी भक्त को गंगा को ही गंगाजल अर्पित करते देखते हैं. गंगा में स्नान करने के बाद, श्रद्धालु अंजलि भर जल लेता है और उसे वापस गंगा को अर्पित करता है. वास्तव में, जब कोई गंगा से अंजलि भर जल लेता है, तो गंगा की कोई हानि नहीं होती, और उसी समान यदि कोई श्रद्धालु अंजलि भर जल गंगा को अर्पित करता है, तो गंगा का किसी भी स्तर पर विस्तार नहीं होता. किंतु ऐसे चढ़ावे द्वारा, श्रद्धालु माँ गंगा के एक भक्त के रूप में यश प्राप्त करता है. उसी प्रकार, जब हम समर्पण और श्रद्धा के साथ कुछ अर्पण करते हैं, तो हम जो अर्पण करते हैं वह हमारा नहीं होता, ना ही वह भगवान के परम व्यक्तित्व के एश्वर्य को बढ़ाता है. किंतु यदि व्यक्ति अपने स्वामित्व का जो कुछ भी अर्पित करता है, तो वह भक्त के रूप में पहचाना जाता है. इस संबंध में, उदाहरण दिया गया है कि जब व्यक्ति के मुख को हार और चंदन के लेप से सजाया जाता है, तो दर्पण में व्यक्ति का मुख स्वतः ही सुंदर बन जाता है. समस्त वस्तुओं का मूल स्रोत भगवान का परम व्यक्तित्व ही है, जो कि हमारा भी मूल स्रोत है. इसलिए जब भगवान के परम व्यक्तित्व का श्रंगार किया जाता है, तो भक्त और सारे जीवों का श्रंगार स्वतः ही हो जाता है.

स्रोत – अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद् भागवतम्” , आठवाँ सर्ग, अध्याय 20 – पाठ 21

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