एक-पत्नी-व्रत, केवल एक पत्नी को स्वीकार करना, भगवान रामचंद्र द्वारा प्रस्तुत किया गया अनोखा उदाहरण था. व्यक्ति को एक पत्नी से अधिक स्वीकार नहीं करना चाहिए. उन दिनों में, निस्संदेह, लोग एक से अधिक पत्नियों से विवाह रचते थे. बल्कि भगवान रामचंद्र के पिता की भी एक से अधिक पत्नियाँ थीं. किंतु भगवान रामचंद्र ने एक आदर्श राजा के रूप में, केवल एक पत्नी रखना स्वीकार किया. जब माँ सीता का अपहरण रावण और राक्षसों द्वारा कर लिया गया, तब भगवान रामचंद्र, भगवान के परम व्यक्तित्व होने के नाते, सैकड़ों- सहस्त्रों सीताओं से विवाह कर सकते थे, किंतु हमें यह शिक्षा देने के लिए कि वे कितने पतिव्रता थे, उन्होंने रावण से युद्ध किया और अंततः उसका वध कर दिया. भगवान ने मनुष्यों को यह निर्देश देने के लिए रावण को दंड दिया और अपनी पत्नी को छुड़ाया कि पुरुषों को केवल एक पत्नी रखना चाहिए. भगवान रामचंद्र ने केवल एक पत्नी स्वीकार की और उदात्त चरित्र का प्रदर्शन किया, और इस प्रकार गृहस्थों के लिए उदाहरण प्रस्तुत किया. गृहस्थ को भगवान रामचंद्र के आदर्श के अनुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए, जिन्होंने दिखाया कि एक श्रेष्ठ व्यक्ति कैसे बनें. एक गृहस्थ होने या एक पत्नी और बच्चों के साथ जीवन यापन करने की कभी भर्त्सना नहीं की गई है, यदि व्यक्ति वर्णाश्रम-धर्म के सिद्धांतों के अनुसार जीवन यापन करे. जो लोग इन सिद्धांतों के अनुसार जीवन जीते हैं, भले ही गृहस्थ, ब्रम्हचारी या वानप्रस्थ के रूप में, वे समान रूप से महत्वपूर्ण हैं.

स्रोत – अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद् भागवतम्” , नवाँ सर्ग, अध्याय 10 – पाठ 54

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