“पूर्व में, वर्णाश्र्म धर्म प्रमुख था, और प्रत्येक व्यक्ति का समाज में अपनी स्थिति के अनुसार एक विशिष्ट कर्तव्य था. अब कार्य कर्तव्य विस्तृत हो गए हैं, लेकिन अब इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि कोई इंजीनियर है, डॉक्टर या जो कुछ भी है. बस कार्य के परिणाम द्वारा कृष्ण की सेवा करने का प्रयास करें. वही भक्ति है. कृष्ण चेतना आंदोलन का दर्शन यह नहीं है कि लोगों को उनकी गतिविधियों से दूर कर दिया जाए. व्यक्ति को अपने व्यवसाय में भाग लेना चाहिए, लेकिन उसे कृष्ण को कभी नहीं भूलना चाहिए. कृष्ण हमें हमेशा कृष्ण चैतन्य रहने की राय देते हैं, और हमें हमेशा विचार करना चाहिए कि हम कृष्ण के लिए कर्मरत हैं. वास्तव में हम कृष्ण या उनके प्रतिनिधि के आदेश पर कार्य करते हैं, मनमाने ढंग से नहीं. यदि हम कोई मूर्खता भरा कर्म करें और सोचें, “मैं यह कृष्ण के लिए कर रहा हूँ,” तो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा. वह कार्य कृष्ण की स्वीकृति या कृष्ण के प्रतिनिधि की स्वीकृति से सत्यापित होना चाहिए.” यदि हम व्यवसाय करते हैं और पैसा कमाते हैं, तो हमें उसे कृष्ण के लिए खर्च करना चाहिए. यह भक्ति का एक रूप है. एक और विविध उदाहरण अर्जुन हैं, जो एक योद्धा थे. युद्ध द्वारा वे भक्त बन गए. वे हरे कृष्णा का जाप करके भक्त नहीं बने, बल्कि कुरुक्षेत्र का युद्ध लड़ कर बने. कृष्ण ने उन्हें युद्ध करने का सुझाव दिया था, लेकिन चूँकि अर्जुन एक वैष्णव थे, इसलिए शुरुआत में वे ऐसा करना नहीं चाहते थे. एक वैष्णव किसी की भी हत्या करना पसंद नहीं करता, लेकिन यदि कृष्ण उसे आदेश दें, तो उसे युद्ध करना ही चाहिए. वह अपनी इच्छा से नहीं लड़ता, क्योंकि एक वैष्णव की सहज वृत्ति किसी को भी हानि पहुँचाने की नहीं होती है, वह स्वयं अपने विचारों की चिंता नहीं करता है. कुछ भी हो, सभी व्यक्तियों के कुछ विशिष्ट कर्तव्य, उपजीविका होते हैं. यदि हम कृष्ण की पूजा में हमारी उपजीविका का निर्वाह करते हैं, तो हमारा जीवन परिपूर्ण होगा. ऐसा निर्देश श्रीमद्भागवतम् (1.2.13) में भी दिया गया है: अतः पुम्भिर् द्विज-श्रेष्ठ वर्णाश्रम-विभागसः, स्वानुस्थितस्य धर्मस्य सम्सिद्धिर् हरि-तोषणम् “हे द्विजों में श्रेष्ठ, इस प्रकार यह निष्कर्ष निकलता है कि व्यक्ति जाति विभाजन और जीवन के क्रम के अनुसार स्वयं के लिए बताए गए कर्तव्यों निर्वाह करके उच्चतम श्रेष्ठता प्राप्त कर सकता है, जो भगवान के परम व्यक्तित्व को प्रसन्न करने के लिए होता है.”

अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2007 संस्करण, अंग्रेजी) “देवाहुति पुत्र, भगवान कपिल की शिक्षाएँ”, पृष्ठ 151

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