“जो व्यक्ति आध्यात्मिक ज्ञान में प्रगति करना चाहता है उसे सामान्य साहित्य को पढ़ने से बचने के लिए बहुत सावधान रहना चाहिए. संसार साधारण साहित्य से भरा पड़ा है जो मन में अनावश्यक व्यग्रता पैदा करता है. ऐसा साहित्य, जिसमें अखबार, नाटक, उपन्यास और पत्रिकाएँ होते हैं, वास्तविक रूप से आध्यात्मिक उन्नति के लिए अभीष्ट नहीं होता. निस्संदेह, उसका वर्णन कौवों की आनंद स्थली के रूप में किया गया है (तद् वयसम तीर्थम्). जो भी आध्यात्मिक ज्ञान में प्रगति कर रहे हों उन्हें ऐसे साहित्य का तिरस्कार करना चाहिए. इसके अतिरिक्त, व्यक्ति को विभिन्न तर्कशास्त्रियों अथवा दार्शनिकों के निष्कर्षों की चिंता नहीं करनी चाहिए. निश्चित ही, जो उपदेश करते हैं उन्हें कभी-कभी विरोधी के तर्कों का प्रतिकार करना होता है, लेकिन जितना भी हो सके व्यक्ति को इस संबंध में विवादपूर्ण प्रवृत्ति से बचना चाहिए, श्रील माधवाचार्य कहते हैं:
अप्रयोजन-पक्षम् न समश्रयेत नप्रयोजन-पक्षी ष्याण न वृथ शिष्य-बंध-कृत नचोदसिनः शास्त्राणि
न विरुद्धाणि चभयसेत न व्याख्यायोपजीवेत न निसिद्धान समाचारेत एवं-भूतो यतिर्यति तद्-एक-शरणो हरिं

“अनावश्यक साहित्य शरण लेने की या स्वयं को बहुत से तथाकथित दार्शनिकों की चिंता में लगाने की कोई आवश्यकता नहीं, जो आध्यात्मिक प्रगति में अनुपयोगी होते हैं. न ही व्यक्ति को फ़ैशन या लोकप्रियता के निमित्त किसी शिष्य को स्वीकार ही करना चाहिए. व्यक्ति तो इन तथाकथित शास्त्रों के प्रति असंवेदनशील होना चाहिए, न तो उनका विरोध करें न ही पक्ष लें, और व्यक्ति को शास्त्र की व्याख्या के लिए धन लेकर अपनी जीविका नहीं कमानी चाहिए. एक सन्यासी को हमेशा तटस्थ रहना चाहिए और भगवान के चरण कमलों में संपूर्ण रूप से शरण लेकर आध्यात्मिक जीवन में प्रगति के साधन ढूँढने चाहिए.” ”

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 13 – पाठ 7

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