श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इस संबंध में कहते हैं कि जब एक राष्ट्रपति या राजा अपने सिंहासन पर बैठा हो, तो उसे अपनी सभा में आने वाले हर व्यक्ति को सम्मान विदित करने की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन उसे अपने से उच्चतर लोगों जैसे उसके आध्यात्मिक गुरु, ब्राम्हणों और वैष्णवों का आदर करना होता है. उसे कैसा व्यवहार करना चाहिए इसके कई उदाहरण हैं. जब भगवान कृष्ण अपने सिंहासन पर विराजमान थे और सौभाग्य से नारद उनकी सभा में आए, तब स्वयं भगवान कृष्ण भी नारद के प्रति सम्मान ज्ञापित करने के लिए अपने अधिकारियों और मंत्रियों सहित तुरंत उठ खड़े हुए. नारद जानते थे कि कृष्ण भगवान के परम व्यक्तित्व हैं, और कृष्ण जानते थे कि नारद उनके भक्त थे, लेकिन यद्यपि कृष्ण परम भगवान हैं और नारद भगवान के भक्त हैं, तब भी भगवान ने धार्मिक शिष्टाचार का पालन किया. चूँकि नारद एक ब्रह्मचारी, एक ब्राह्मण और एक अनन्य भक्त थे, इसलिए कृष्ण ने राजा की भूमिका में होते हुए भी, नारद के प्रति अपना सम्मानजनक व्यवहार प्रस्तुत किया. वैदिक सभ्यता में ऐसा आचरण दिखाई देता है. एक सभ्यता जिसमें लोगों को यह नहीं पता है कि नारद और कृष्ण के प्रतिनिधि का सम्मान कैसे किया जाना चाहिए, समाज का गठन कैसे किया जाना चाहिए और किस तरह से कृष्ण चेतना में आगे बढ़ना चाहिए-हर साल केवल नई कारों और नई गगनचुंबी इमारतों के निर्माण और फिर उन्हें तोड़ने और नए बनाने के लिए चिंतित एक समाज – तकनीकी रूप से उन्नत हो सकता है, लेकिन यह एक मानव सभ्यता नहीं है. किसी मानव सभ्यता की उन्नति तब होती है जब उसके लोग चतुर्वर्ण प्रणाली, जीवन की चार व्यवस्थाओं की प्रणाली का पालन करते हैं. प्रथम श्रेणी के व्यक्ति सलाहकारों के रूप में कार्य करने के लिए, द्वितीय श्रेणी के व्यक्ति प्रशासकों के रूप में, तृतीय श्रेणी के व्यक्ति भोजन का उत्पादन करने और गौवंश की रक्षा करने हेतु और समाज की तीन उच्च श्रेणियों का आज्ञापालन करने वाले चौथी श्रेणी के व्यक्ति होने चाहिए. जो समाज की मानक प्रणाली का पालन नहीं करता है, उसे पाँचवी श्रेणी का व्यक्ति माना जाना चाहिए. वैदिक नियमों के बिना एक समाज मानवता के लिए बहुत उपयोगी नहीं होगा. जैसा कि इस श्लोक में कहा गया है, धर्मम् ते न परम विदुः ऐसे समाज को जीवन का उद्देश्य और धर्म का सर्वोच्च सिद्धांत नहीं पता होता है.

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, छठा सर्ग, अध्याय 7- पाठ 13

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