हमें यह निश्चित ही जानना चाहिए कि अभी हम जिस स्थिति में स्थापित हैं वह अतीत में हमारे अपने कृत्यों के अनुसार परम की व्यवस्था है. परम भगवान प्रत्येक जीव के हृदय में स्थानीयकृत परमात्मा के रूप में उपस्थित हैं, जैसा कि भगवद्-गीता (13.23) में कहा गया है, और इसलिए वे हमारे जीवन की प्रत्येक अवस्था में हमारे कर्मों के बारे में सबकुछ जानते हैं. वे हमारे कर्मों का फल हमें विशिष्ट स्थान में रख कर देते हैं. एक धनाड्य व्यक्ति का पुत्र मुंह में चांदी का चम्मच लेकर जन्म लेता है, लेकिन जो बालक धनाड्य व्यक्ति के पुत्र के रूप में आया वह उस स्थान के योग्य था, और इसलिए उसे उस स्थिति में भगवान की इच्छा से रखा गया है. और किसी विशेष क्षण में जब बालक को उस स्थान से हटाना होगा, तब भी उसे भगवान की इच्छा से ही किया जाएगा, चाहे बालक और पिता उस प्रसन्न संबंध से अलग नहीं होना चाहते हों. इसी प्रकार किसी निर्धन व्यक्ति के संदर्भ में भी होता है. जीवों के मिलने और बिछुड़ने पर ना तो धनाड्य व्यक्ति और ना ही निर्धन पुरुष का कोई नियंत्रण होता है. खेलने वाले और उसके खेल के उदाहरण को समझने में त्रुटि नहीं करनी चाहिए. कोई यह तर्क कर सकता है कि चूँकि भगवान हमारे कर्मों का फल प्रदान करने के लिए बाध्य हैं, तो खेल खेलने वाले का उदाहरण नहीं लागू किया जा सकता. लेकिन ऐसा नहीं है. हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि भगवान ही सर्वोच्च इच्छा हैं, और वे किसी नियम से नहीं बंधे हैं. समान्यतः कर्म का नियम वही होता है जो हमारे अपने कर्मों के परिणाम स्वरूप दिया जाता है, लेकिन विशिष्ट प्रकरणों में, भगवान की इच्छा द्वारा, ऐसे कर्मफल बदल भी जाते हैं. लेकिन यह बदलाव केवल भगवान की इच्छा से ही प्रभावित हो सकता है, और किसी अन्य द्वारा नहीं. इसलिए, इस ऋचा में उद्धृत खेलने वाले का उदाहरण बिलकुल उपयुक्त है, क्योंकि परम इच्छा वह सब करने के लिए स्वतंत्र है जो वह चाहती है, क्योंकि वे परम-श्रेष्ठ हैं, उनकी किसी भी गतिविधि या प्रतिक्रिया में कोई भी त्रुटि नहीं है. जब कोई विशुद्ध भक्त का प्रकरण हो तो परिणामी फल के इन परिवर्तनों को विशेष रूप से भगवान द्वारा रचा जाता है. भगवद-गीता (9.30-31) में यह आश्वासन दिया गया है कि भगवान एसे विशुद्ध भक्त को बचाते हैं, जो पापों की सभी प्रकार की प्रतिक्रियाओं के प्रति बिना पूर्वग्रह के उनके समक्ष समर्पण कर चुका है, और इसमें कोई संदेह नहीं है. संसार के इतिहास में भगवान द्वारा बदले गए कर्मफलों के सैकड़ों उदाहरण हैं. यदि भगवान किसी के पिछले कर्मों की प्रतिक्रियाओं को बदलने में सक्षम है, तो निश्चित रूप से वे स्वयं अपने कर्मों की क्रिया या प्रतिक्रिया से बाध्य नहीं हैं. वे सभी नियमों के लिए परिपूर्ण और पारलौकिक हैं.

अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी) “श्रीमद् भागवतम्”, प्रथम सर्ग, खंड 13 – पाठ 43

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