श्रीमद्-भागवतम् के अनुसार, बारह महाजन, या महान आत्मा होते हैं, और वे: 1) ब्रम्हा, 2) भगवान शिव, 3) नारद, 4) वैवस्वत मनु, 5) कपिल (नास्तिक नहीं, मूल कपिल), 6) कुमार, 7) प्रह्लाद, 8) भीष्म, 9) जनक, 10) बाली, 11) शुकदेव गोस्वामी और 12) यमराज. महाभारत के अनुसार, परम सत्य के बारे में तर्क करने का कोई लाभ नहीं है क्योंकि इतने सारे वैदिक ग्रंथ और दार्शनिक ज्ञप्तियाँ हैं कि कोई भी दार्शनिक किसी दूसरे से सहमत नहीं हो सकता. चूँकि हर को अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करना और अन्य का ठुकराना चाहता है, इसलिए धार्मिक सिद्धांतों की आवश्यकता को समझना बड़ा कठिन है. इसलिए महान महाजनों, महान आत्माओं के पदचिन्हों का अनुसरण करना बेहतर है; फिर व्यक्ति मनचाही सफलता प्राप्त कर सकता है. सर्वोत्त्म यह है कि इस मार्ग को अपनाया जाए और इसका पालन किया जाए.

<span style=”color: #00CCFF;”>अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2012 संस्करण, अंग्रेजी), “भगवान चैतन्य, स्वर्ण अवतार की शिक्षाएँ”, पृ. 264</span>

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