वैदिक आनुष्ठानिक गतिविधियाँ करके, धन दान करने और तप द्वारा व्यक्ति अस्थाई रूप से पापमय कर्मों की प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो सकता है, लेकिन अगले ही क्षण वह फिर से पापमय गतिविधियों में लग जाता है. उदाहरण के लिए, यौन जीवन में अत्यधिक लिप्तता के कारण यौन रोग से पीड़ित व्यक्ति को चिकित्सा उपचार में कुछ गंभीर दर्द से गुजरना पड़ता है, और वह कुछ समय के लिए ठीक हो जाता है. लेकिन चूँकि वह अपने हृदय से कामेच्छा को नहीं निकाल सका है, वह उन्हीं बातों में दोबारा लिप्त होगा और समान रोग से पीड़ित होगा. तो चिकित्सा उपचार से इस तरह के यौन रोग के संकट से अस्थायी राहत मिल सकती है, लेकिन जब तक व्यक्ति यह समझने के लिए प्रशिक्षित नहीं होगा कि यौन जीवन घृणित है, इस तरह के बार-बार होने वाले संकट से बचाया जाना असंभव है. उसी प्रकार वेदों में अनुमोदित अनुष्ठान, दान, और तप व्यक्ति को अस्थायी रूप से पापमय गतिविधियाँ करने से रोक सकते हैं, लेकिन जब तक हृदय निर्मल नहीं होता, वयक्ति को पापमय कर्म बार-बार दोहराना पड़ेंगे. पापमय कामना के इस बीज को केवल कृष्ण चेतना अर्जित करके ही हटाया जा सकता है. और ऐसा महामंत्र, या हरे कृष्णा मंत्र का जाप करके बड़ी सरलता से किया जा सकता है. दूसरे शब्दों में, जब तक व्यक्ति आध्यात्मिक सेवा का पथ नहीं अपनाता, वह पापमय कर्मों की प्रतिक्रियाओं से सौ प्रतिशत निर्मल नहीं होता.

अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2011 संस्करण, अंग्रेजी), “भक्ति का अमृत”, पृ. 6

(Visited 149 times, 1 visits today)
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •