धर्म के सिदंधांतों, जैसे तप, स्वच्छता, दया और सत्य का पालन किसी भी धर्म के अनुयायी द्वारा किया जा सकता है. हिंदू से मुस्लिम, ईसाई या किसी अन्य पंथ में परिवर्तन करने और इस प्रकार स्वधर्मत्यागी बनने और धर्म के सिद्धांतों का उल्लंघन करने की आवश्यकता नहीं है. भागवतम् धर्म, धर्म के सिद्धांतों का पालन करने पर बल देता है. धर्म के सिद्धांत किसी निश्चित पंथ के सिद्धांत या नियामक सिद्धांत नहीं हैं. विशिष्ट समय और स्थान के संदर्भ में इस तरह के नियामक सिद्धांत भिन्न हो सकते हैं. यह देखना चाहिए कि धर्म के उद्देश्य प्राप्त हुए हैं या नहीं. वास्तविक सिद्धांतों को प्राप्त किए बिना हठधर्मिता और सूत्रों से चिपके रहना अच्छा नहीं है. एक धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी विशेष प्रकार के पंथ के प्रति निष्पक्ष हो सकता है, लेकिन राज्य ऊपर वर्णित धार्मिक सिद्धांतों के प्रति उदासीन नहीं रह सकता. किंतु कलियुग में राज्य के अधिकारी ऐसे धार्मिक सिद्धांतों के प्रति उदासीन होंगे, और इसलिए उनके संरक्षण में धार्मिक सिद्धांतों के विरोधी, जैसे लोभ, असत्य, छल और चोरी, स्वाभाविक रूप से पनपेंगे, और इसलिए राज्य में भ्रष्टाचार रोकने के भ्रामक प्रचार का कोई अर्थ नहीं होगा.

इसलिए राज्य को श्रेणीगत रूप से समस्त जुआ, मद्यपान, वेश्यावृत्ति और असत्य को रोकना चाहिए. जो राज्य भ्रष्टाचार को बड़े स्तर पर मिटाना चाहते हैं वे निम्नलिखित विधियों से धर्म के सिद्धांतों को लागू कर सकते हैं:

1 यदि अधिक नहीं तो, महीने में दो अनिवार्य उपवास. आर्थिक दृष्टि से भी राज्य में महीने में दो दिन के उपवास से टनों भोजन बचेगा, और यह प्रणाली नागरिकों के सामान्य स्वास्थ्य पर भी बहुत अनुकूल प्रभाव डालेगी.

2. चौबीस वर्षों के युवा और सोलह वर्षीय आयु की युवतियों का विवाह अनिवार्य रूप से हो जाना चाहिए. विद्यालयों और महाविद्यालयों में संयुक्त शिक्षा में कोई हानि नहीं है, बशर्ते युवक और युवतियों का विवाह हो चुका हो, और यदि प्रसंगवश किसी पुरुष और स्त्री छात्र में कोई अंतरंग संबंध हो, तो अनैतिक संबंध के बिना उचित विधि से उनका विवाह हो जाना चाहिए. तलाक नियम वेश्यावृत्ति को बढ़ावा दे रहा है, और इसे समाप्त करना चाहिए.

3. राज्य के नागरिकों को राज्य या मानव समाज में आध्यात्मिक वातावरण बनाने के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से अपनी आय का पचास प्रतिशत तक दान में देना चाहिए. उन्हें निम्न द्वारा भागवतम् के सिद्धांतों का उपदेश देना चाहिए (अ) कर्म-योग, या हर कर्म भगवान की संतुष्टि के लिए करना, (ब) विद्वत जनों या आत्म ज्ञानियों से श्रीमद्-भागवतम् सुनना चाहिए, (स) घर या पूजा स्थलों पर प्रभु की महिमा का जाप करना, (द) श्रीमद्-भागवतम् के उपदेश में रत सभी भागवतों की सभी प्रकार से सेवा करना और (ई) ऐसे निवास में रहना जहाँ का वातावरण भगवान की चेतना से परिपूर्ण हो. यदि राज्य उपरोक्त प्रक्रिया द्वारा संचालित हो, तो स्वाभाविक रूप से वहाँ सभी ओर भगवान की चेतना व्याप्त होगी.

सभी प्रकार का जुआ, चाहे वह लाभ के व्यापार का उद्यम हो, उसे असम्मानजनक माना जाता है, और जब किसी राज्य में जुआ प्रोत्साहित किया जाता है, तो वहाँ सत्य पूरी तरह से अदृश्य हो जाता है. युवक युवतियों को ऊपर वर्णित आयु से अधिक अविवाहित रहने की अनुमति देना और सभी प्रकार की पशु वधशालाओं को लायसेंस देना तुरंत प्रतिबंधित होना चाहिए. मांसाहारियों को शास्त्रों के अनुसार मांस लेने की अनुमति दी जा सकती है, अन्यथा नहीं. सभी प्रकार का नशा–चाहे सिगरेट पीना, तमाखू खाना या चाय पीना–प्रतिबंधित किया जाना चाहिए.

स्रोत:अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, प्रथम सर्ग, अध्याय 17 - पाठ 32 और 38
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