शास्त्रों का आदेश है कि यदि किसी के पास धन हो तो उसने जो भी संग्रह किया हो उसे पाँच भागों में बाँट लेना चाहिए–एक भाग धर्म के लिए, एक भाग प्रतिष्ठा के लिए, एक भाग वैभव के लिए, एक भाग इंद्रिय तुष्टि के लिए और एक भाग अपने परिवार के पालन के लिए. वर्तमान में, यद्यपि, चूँकि लोग ज्ञान से संपूर्ण रूप से रहित हैं, वे अपना सारा धन उनके परिवार के लिए व्यय कर देते हैं. श्रील रूप गोस्वामी ने अपनी अर्जित संपत्ति का पचास प्रतिशत का उपयोग कृष्ण के लिए, पच्चीस प्रतिशत स्वयं के लिए, और पच्चीस प्रतिशत अपने परिवार के लिए उपयोग करते हुए, स्वयं अपने उदाहरण से हमें शिक्षा दी है. व्यक्ति का प्रमुख उद्देश्य कृष्ण चेतना में प्रगति करना होना चाहिए. जिसमें धर्म, अर्थ और काम सम्मिलित रहेगा. यद्यपि, चूँकि व्यक्ति के परिवार के सदस्य कुछ लाभ की आशा करते हैं, व्यक्ति को अपनी अर्जित संपत्ति का कुछ भाग उन्हें देकर उन्हें भी संतुष्ट करना चाहिए. यही शास्त्रीय आदेश है.

स्रोत – अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद् भागवतम्” , आठवाँ सर्ग, अध्याय 19, पाठ 37

(Visited 19 times, 1 visits today)
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •