सर्वोच्च देव, ब्रम्हा के हृदय से सूक्ष्म स्पंदन पैदा हुआ, और इस ध्वनि के इस सूक्ष्म स्पंदन से तीन ध्वनियों से बना हुआ ऊँकार उभरा। ऊँकार में अदृश्य शक्तियाँ होती हैं और एक शुद्धीकृत हृदय में स्वतः प्रकट होता है। यह उनकी तीनों अवस्थाओं – परम व्यक्तित्व, परम आत्मा और परम अवैयक्तिक सत्य में पूर्ण सत्य का प्रतिनिधित्व होता है। यह ऊँकार, अंततः अभौतिक और अगोचर होता है, और परमात्मा द्वारा उसका श्रवण उनके शारीरिक कान या किसी अन्य शारीरिक इंद्रियों के बिना किया जाता है। वैदिक ध्वनि का संपूर्ण विस्तार ऊँकार द्वारा विस्तृत है, जो हृदय के आकाश के भीतर, आत्मा से प्रकट होता है। यह स्वतः उत्पन्न होने वाले परम सत्य, परमात्मा का प्रत्यक्ष पद है, और सभी वैदिक मंत्रों का गुप्त सार और शाश्वत बीज होता है। सोये हुए व्यक्ति की इन्द्रियाँ तब तक कार्य़ नहीं करती जब तक कि वह जाग न जाए। इसलिए, जब एक सोए हुए व्यक्ति को शोर से जगाया जाता है, तो कोई व्यक्ति ऐसा पूछ सकता है, “शोर किस व्यक्ति ने सुना?” इस श्लोक में सुप्तश्रोत्रे शब्द इंगित करते हैं कि ध्वनि को हृदय के भीतर रहने वाले परम भगवान सुनते हैं और सोए हुए जीवों को जगाते हैं। भगवान की ऐन्द्रिक गतिविधियाँ हमेशा उच्चतर स्तर पर कार्य करती हैं। अंतत: सभी ध्वनियाँ आकाश के भीतर कंपन करती हैं, और हृदय के आंतरिक क्षेत्र में एक प्रकार का आकाश होता है जो वैदिक ध्वनियों के कंपन के लिए अभीष्ट होता है। सभी वैदिक ध्वनियों का बीज, या स्रोत यह ऊँकार ही है। इसकी पुष्टि वैदिक कथन ॐ इत्येतद्ब्रह्मणो नेदिष्ठं नाम से होती है। वैदिक बीज ध्वनि का पूर्ण विस्तार श्रीमद-भागवतम, महानतम वैदिक साहित्य है। ऊँकार ने वर्णमाला की तीन मूल ध्वनियों – अ, उ और म को प्रदर्शित किया। ये तीनों, हे भृगु के सबसे प्रतिष्ठित वंशज, प्रकृति के तीन रूपों, ऋग, यजुर और साम वेदों के नाम, भूर, भुवर और स्वर ग्रह प्रणालियों के रूप में जाने जाने वाले लक्ष्यों सहित भौतिक अस्तित्व की सभी अलग-अलग तीन अवस्थाओं को, और तीन कार्यकारी स्तरों जिन्हें जागृत चेतना, निद्रा, और गहन निद्रा कहा जाता है, उन्हें बनाए रखते हैं। उस ऊँकार से भगवान ब्रह्मा ने वर्णमाला की सभी ध्वनियाँ – स्वर, व्यंजन, अर्ध स्वर, ऊष्म व्यंजनों और अन्य को निर्मित किया – जिन्हें लंबी और छोटी मात्राओं द्वार अलग-अलग पहचाना जाता है। सर्वशक्तिमान ब्रह्मा ने ध्वनि के इस संग्रह का उपयोग अपने चार मुखों से चार वेदों को उत्पन्न करने के लिए किया, जो पवित्र ऊँकार और सात व्याहृति आह्वानों के साथ प्रकट हुए। उनका मंतव्य चार वेदों में से प्रत्येक के पुजारियों द्वारा किए गए विभिन्न कार्यों के अनुसार वैदिक यज्ञ की प्रक्रिया का प्रचार करना था। ब्रह्मा ने इन वेदों की शिक्षा अपने पुत्रों को प्रदान की, जो ब्राह्मणों के बीच महान संत थे और वैदिक वाचन की कला में विशेषज्ञ थे। बदले में उन्होंने आचार्य की भूमिका निभाई और वेदों को अपने स्वयं के पुत्र मरीचि और अन्य को प्रदान किया, जो सभी ब्राह्मण समुदाय के अग्रणी संत थे। इस प्रकार, चारों युगों के चक्र में, पीढ़ी दर पीढ़ी शिष्यों ने – जो सभी अपने आध्यात्मिक व्रतों में दृढ़ता से स्थापित थे – इन वेदों को शिष्य परंपरा में प्राप्त किया है। प्रत्येक द्वापर-युग के अंत में प्रख्यात ऋषियों द्वारा वेदों को भिन्न-भिन्न विभागों में संपादित किया जाता है। यह देखते हुए कि समय के प्रभाव से सामान्य रूप से लोगों के जीवन काल, बल और बुद्धि में कमी आई है, महान संतों ने अपने हृदय के भीतर बैठे भगवान के व्यक्तित्व से प्रेरणा ली और व्यवस्थित रूप से वेदों को विभाजित किया। हे ब्राह्मण, वैवस्वत मनु के वर्तमान युग में, ब्रह्मा और शिव के नेतृत्व में, ब्रम्हांड के अग्रणियों ने समस्त संसारों के रक्षक, भगवान के परम व्यक्तित्व से धर्म के सिद्धांतों की रक्षा करने का अनुरोध किया। हे परम सौभाग्यशाली शौनक, सर्वशक्तिमान भगवान, अपने समग्र के एक भाग की दिव्य सजीवता का प्रदर्शन करते हुए, सत्यवती के गर्भ में पराशर के पुत्र के रूप में प्रकट हुए। कृष्ण द्वैपायन व्यास नाम से, इस रूप में, उन्होंने एक वेद को चार में विभाजित किया। जब भगवान ब्रह्मा ने अपने चार मुखों से चार वेदों का उच्चारण किया, तो मंत्र रत्नों के विभिन्न प्रकारों के अनसुलझे संग्रह के समान एक दूसरे से मिल गए। श्रील व्यादेव ने वैदिक मंत्रों को चार भागों (संहिताओं) में विभाजित किया, जो इस प्रकार ऋग, अथर्व, यजुर् और साम वेदों के रूप में पहचानने योग्य बन गए। हे ब्राह्मण, सबसे शक्तिशाली और बुद्धिमान व्यासदेव ने अपने चार शिष्यों को बुलाया, और प्रत्येक को चारों में से एक संहिता प्रदान की। श्रील व्यासदेव ने पैल को प्रथम संहिता, ऋग्वेद की शिक्षा दी और इस संग्रह को बहवृच नाम दिया। ऋषि वैशम्पायन को उन्होंने निगड़ नाम के यजुर मंत्रों के संग्रह के बारे में बताया। उन्होंने जैमिनी को चंडोग-संहिता के रूप में नामित सामवेद मंत्रों की शिक्षा दी, और उन्होंने अपने प्रिय शिष्य सुमंतु को अथर्ववेद सुनाया।

स्रोत – अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद भागवतम”, बारहवाँ सर्ग, अध्याय 6 – परिचय, पाठ 39 से 53.

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