“यह तर्क दिया जा सकता है कि यदि कोई जीव उसके पिछले कर्मों के परिणाम के अधीन हो तो स्वतंत्र इच्छा के लिए कोई स्थान नहीं होगा; एक बार कोई पापमय कर्म कर चुकने पर, जीव हमेशा के लिए पिछले प्रतिक्रियाओं के अधीन रहते हुए, पीड़ा की एक अंतहीन श्रृंखला में बँधा रहेगा। इस अनुमान के अनुसार एक न्यायपूर्ण और सर्वज्ञ ईश्वर नहीं हो सकता, क्योंकि जीव अपने पिछले कर्मों के फल के कारण पापमय कर्म करने के लिए बाध्य होता है, जो तब भी पिछले कर्मों के प्रतिफल ही थे। चूंकि एक साधारण सज्जन भी किसी निर्दोष व्यक्ति को अनुचित रूप से दंडित नहीं करेगा, तो ऐसा कोई भगवान कैसे हो सकता है जो इस संसार में बद्ध आत्माओं की असहाय पीड़ा को देख सके?

इस मूर्खतापूर्ण तर्क का खंडन एक व्यावहारिक उदाहरण द्वारा सरलता से किया जा सकता है। यदि मैं हवाई जहाज की एक उड़ान के लिए टिकट खरीदूँ, जहाज में चढ़ जाऊँ और उड़ान चालू हो जाए, तो जहाज के उड़ान भरने पर जहाज में चढ़ने का मेरा निर्णय तब तक उड़ान जारी रखने के लिए बाध्य करता है जब तक कि जहाज नीचे न उतर जाए। लेकिन यद्यपि मैं इस निर्णय की प्रतिक्रिया को स्वीकार करने के लिए बाध्य हूँ, लेकिन जहाज में रहते हुए मेरे पास लेने के लिए कई निर्णय हैं। मैं परिचारिका द्वारा दिए जाने वाले भोजन और पेय स्वीकार या नकार सकता हूँ, मैं कोई पत्रिका या अखबार पढ़ सकता हूँ, मैं सो सकता हूँ, जहाज में चल-फिर सकता हूँ, दूसरे यात्रियों से बातचीत कर सकता हूँ, इत्यादि। दूसरे शब्दों में, सामान्य संदर्भ -किसी अन्य शहर की उड़ान भरना- जहाज में चढ़ने के मेरे पिछले निर्णय की प्रतिक्रिया के रूप में मुझ पर बलपूर्वक लादा गया है, बल्कि उस स्थिति में भी मैं लगातार नए निर्णय ले रहा हूँ और नई प्रतिक्रियाएँ निर्मित कर रहा हूँ। उदाहरण के लिए, यदि मैं जहाज में व्यवधान पैदा करूँ तो जहाज के उतरने पर मुझे बंदी बनाया जा सकता है। दूसरी ओर, यदि मैं अपने पास बैठे किसी व्यवसायी से मित्रता कर लूँ, तो ऐसे संपर्क के कारण भविष्य में कोई अनुकूल व्यावसायिक लेनदेन हो सकता है।

इसी प्रकार, यद्यपि जीव को कर्म के नियम द्वारा किसी विशिष्ट शरीर को स्वीकारने के लिए बाध्य होना पड़ता है, किंतु जीवन के मानव रूप में स्वतंत्र इच्छा और निर्णय लेने की संभावना हमेशा होती है। इसलिए जीव द्वारा उसके पिछले कर्म की प्रतिक्रिया में सम्मिलित होते हुए भी जीव को उसकी वर्तमान गतिविधियों के लिए उत्तरदायी ठहराने के लिए भगवान के परम व्यक्तित्व को अन्याय करने वाला नहीं माना जा सकता।”

स्रोत – अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद भागवतम”, ग्यारहवाँ सर्ग, अध्याय 3 – पाठ 6.

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