मनु-संहिता जैसे धर्म-शास्त्रों में कहा गया है कि हत्या करने वाले व्यक्ति को फाँसी दी जानी चाहिए और उसका जीवन प्रायश्चित में बलिदान कर देना चाहिए. पूर्व में पूरे संसार में इस प्रणाली का पालन किया जाता था, लेकिन चूँकि लोग नास्तिक बन रहे हैं, वे मृत्युदंड को रोक रहे हैं. यह बुद्धिमानी नहीं है. यहाँ कहा गया है कि कोई चिकित्सक जो किसी रोग का निदान करना जानता है, वह उसी के अनुसार दवा निर्धारित करता है. यदि रोग बहुत गंभीर है, तो दवा शक्तिशाली होनी चाहिए. किसी हत्यारे का पाप का भार बहुत बड़ा होता है, और इसलिए मनु-संहिता के अनुसार हत्यारे को मारा जाना चाहिए. हत्यारे को मृत्यु देकर सरकार उस पर दया करती है क्योंकि यदि इस जीवन में हत्यारा नहीं मारा जाता है, तो भविष्य में उसे कई बार मरने और पीड़ित होने के लिए विवश होना पड़ेगा. चूँकि लोग आगामी जीवन और प्रकृति की जटिल कार्यप्रणाली के बारे में नहीं जानते हैं, वे अपने स्वयं के नियमों का निर्माण कर लेते हैं, लेकिन उन्हें शास्त्रों के स्थापित निषेधों से परामर्श लेना चाहिए और उनके अनुसार व्यवहार करना चाहिए. भारत में आज भी हिंदू समुदाय अक्सर पापमयी गतिविधियों का प्रतिकार करने के बारे में विशेषज्ञ विद्वानों से परामर्श लेता है. ईसाई धर्म में भी पाप- स्वीकरण और प्रायश्चित की एक प्रक्रिया है. इसलिए प्रायश्चित की आवश्यकता रहती है, और प्रायश्चित व्यक्ति के पाप कृत्यों के गंभीरता के अनुसार ही होना चाहिए.

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, छठा सर्ग, अध्याय 1 – पाठ 8

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