चार युग भौतिक प्रकृति की विभिन्न अवस्थाओं के प्रकटन हैं। सत्य का युग, सत्य-युग, भौतिक अच्छाई के प्रभुत्व को व्यक्त करता है, औऱ कलि-युग अज्ञान के प्रभुत्व को व्यक्त करता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, प्रत्येक युग के भीतर समय-समय पर शेष तीन युग भी उप-युग के रूप में प्रकट होते हैं। इस प्रकार सत्य-युग में भी कोई राक्षस अज्ञान के रूप में प्रकट हो सकता है, और कलि के युग में उच्चतम धार्मिक सिद्धांत कुछ समय के लिए फल-फूल सकते हैं। जैसा कि श्रीमद-भागवतम में वर्णित किया गया है, प्रकृति की तीन अवस्थाएँ (गुण) सभी स्थानों और सभी वस्तुओं में उपस्थित रहती हैं, लेकिन प्रभुत्वधारी अवस्था, या गुणों का मिश्रण, किसी भी भौतिक परिघटना का सामान्य स्वभाव निर्धारित करता है। इसलिए, प्रत्येक युग में तीनों अवस्थाएं विभिन्न परिमाणों में उपस्थित रहती हैं। अच्छाई (सत्य), वासना (त्रेता), वासना और अज्ञानता (द्वापर) या अज्ञानता (कलि) के द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाने वाला विशिष्ट युग एक उप-कारक के रूप में अन्य प्रत्येक युग के भीतर उपस्थित रहता है।

स्रोत – अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद भागवतम”, बारहवाँ सर्ग, अध्याय 3 – पाठ 26

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