भगवान के परम व्यक्तित्व, कृष्ण, साक्षात प्रकट हुए और समस्त मानव समाज के लाभ के लिए अपने निर्देश छोड़ गए, किंतु मूर्ख और दुष्ट दुर्भाग्यवश उन्हें सामान्य मानव समझते हैं और अपनी इंद्रियों की संतुष्टि के लिए भगवद्-गीता के निर्देशों में तोड़-मरोड़ करते हैं. व्यावहारिक रूप से हर कोई भगवद-गीता पर टिप्पणी करता है, उसकी व्याख्या इन्द्रियतृप्ति के लिए करता है. आधुनिक विद्वानों और राजनेताओं के लिए भगवद गीता की व्याख्या करना विशेष रूप से फैशनेबल हो गया है जैसे कि यह कोई काल्पनिक वस्तु हो, और अपनी गलत व्याख्याओं से वे अपने स्वयं की जीवनवृत्ति और दूसरों की जीवनवृ्त्ति की क्षति कर रहे हैं. कृष्ण भावनामृत आंदोलन, यद्यपि, कृष्ण को एक काल्पनिक व्यक्ति के रूप में मानने और यह मान्यता कि कुरुक्षेत्र की कोई लड़ाई नहीं थी, कि सब कुछ प्रतीकात्मक है, और भगवद गीता में कुछ भी सच नहीं है, के इस सिद्धांत विरुद्ध लड़ रहा है. कुछ भी हो, यदि व्यक्ति सचमुच सफल होना चाहता है, तो वह यथा रूप में भगवद्-गीता के पाठ को पढ़ कर ऐसा कर सकता है. श्री चैतन्य महाप्रभु ने विशेष रूप से भगवद गीता के निर्देशों पर बल दिया: यारे देखा, तारे कहा ‘कृष्ण’-उपदेश. यदि व्यक्ति जीवन में सर्वोच्च सफलता प्राप्त करना चाहता है, तो उसे भगवान द्वारा कही गई भगवद्-गीता को स्वीकार करना चाहिए. इस प्रकार भगवद्-गीता को स्वीकार करने से समस्त मानव समाज दोषहीन और सुखी हो सकता है.

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), श्रीमद् भागवतम्, दसवाँ सर्ग, अध्याय 3 – पाठ 45

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