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iandkrsna_user
3419 items
साधना-सिद्ध और कृपा-सिद्ध भक्तों में क्या अंतर होता है?
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चूँकि शरीर चिर काल तक नहीं रह सकता, व्यक्ति को शरीर का उपयोग आध्यात्मिक यात्रा में प्रगति के लिए करना चाहिए.
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एक शुद्ध भक्त सदैव ही भगवान की पारलौकिक प्रसन्नता को बढ़ाने में लगा होता है.
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एकांत स्थान भी सुरक्षित नहीं होता है जब तक कि अच्छी संगति न हो.
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यदि स्त्री का पति आध्यात्मि रूप से उन्नत हो तो उसे आध्यात्मिक संसार में प्रवेश करने का अवसर स्वतः मिल जाएगा.
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वृंदावन में रहने के योग्य कौन होता है?
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व्यक्ति को मुक्त व्यक्तित्वों द्वारा कृष्ण-कथा का श्रवण करना चाहिए.
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भक्त को पहले उस विशेष ब्रह्मांड में स्थानांतरित किया जाता है जहाँ भगवान की लीलाएं वर्तमान में होती हैं.
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एक भक्त को कृष्ण के उद्देश्य की सेवा करने का भरसक प्रयास करना चाहिए.
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अनुकूल रूप से विकसित कृष्णभावनामृत व्यक्ति को पूर्णतः सुखी बनाता है.
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