“सामान्य रूप से ओम् का जाप करने का सुझाव दिया जाता है क्योंकि शुरुआत में व्यक्ति भगवान के परम व्यक्तित्व को नहीं समझ पाता. जैसा कि श्रीमद्-भागवतम् (1.2.11) में बताया गया है:

वदन्ति तत् तत्व-विदस तत्वम यज ज्ञानम अद्वयम
ब्रम्हति परमात्मेति भगवान इति सब्द्यते

“अनुभवी पारलौकिकतावादी जो परम सत्य जानते हैं वे इस अद्वैत तत्व को ब्रम्हन्, परमात्मा या भगवान कहते हैं.” जब तक व्यक्ति भगवान के परम व्यक्तित्व को पूरी तरह से नहीं मानता, तब तक उसकी प्रवृत्ति अपने हृदय के केंद्र में परम भगवान को खोजने वाले अवैयक्तिकतावादी योगी बनने की होती है (ध्यानावस्थिता-तद्-गतेन मनसा पश्यंति यम योगिनः). यहाँ ओंकार के जाप का सुझाव दिया जाता है क्योंकि पारलौकिक अनुभव के प्रारंभ में, हरे कृष्ण महा-मंत्र का जाप करने के स्थान पर, वयक्ति ओंकार (प्रणव) का जाप कर सकता है. हरे कृष्ण महामंत्र और ओंकार में कोई अंतर नहीं होता क्योंकि दोनों ही भगवान के परम व्यक्तित्व के ध्वनिक प्रतिनिधित्व होते हैं. प्रणवः सर्व-वेदेषु. सभी वैदिक साहित्य में, ध्वनि आवर्तन ओंकार ही प्रारंभ होता है. ओम नमो भगवते वासुदेवाय. ओंकार और हरे कृष्ण मंत्र के जाप में यह अंतर है कि हरे कृष्ण मंत्र का जाप भगवद्- गीता (6.11) में सुझाए गए स्थान या आसन व्यवस्था का विचार किए बिना किया जा सकता है:

सुचौ देशे प्रतिस्थाप्य स्थिरम् आसनम आत्मनः
नत्य-उच्चारितम नतिनिचम् चैलाजिन-कुशोत्तरम

“योग का अभ्यास करने के लिए, व्यक्ति को एकांत स्थान में जाकर कुशा को धरती बर बिछाना चाहिए और फिर उसे मृगछाल और मृदु कपड़े से ढँकना चाहिए. आसन न तो बहुत ऊँचा न ही बहुत नीचा होना चाहिए और पवित्र स्थान में स्थित होना चाहिए.” हरे कृष्ण मंत्र का जाप सभी के द्वारा बिना स्थान या किस प्रकार बैठना है का विचार किए बिना किया जा सकता है. श्री चैतन्य महाप्रभु ने सपष्ट रूप से घोषित किया है, नियमितः स्मरणे न कालाः. हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करने में व्यक्ति के बैठने के स्थान के संबंध में कोई विशेष आदेश नहीं होते. नियमितः स्मरणे न कालाः के निर्देश में देश, काल और पात्र–स्थान, समय और व्यक्ति शामिल होते हैं.

इसलिए हरे कृष्ण मंत्र का जाप कोई भी कर सकता है, समय और स्थान का विचार किए बिना. विशेषकर इस काल, कलि-युग में, भगवद्-गीता के अनुसार सुझाया गया उपयुक्त स्थान ढूँढना बहुत कठिन है. यद्यपि, हरे कृष्ण महा मंत्र का जाप किसी भी स्थान पर किसी भी समय किया जा सकता है, और इसका परिणाम बहुत शीघ्रता से मिलता है. फिर भी हरे कृष्ण मंत्र का जाप करते समय व्यक्ति नियामक सिद्धांतों का पालन कर सकता है. अतः बैठे हुए और जाप करते समय व्यक्ति अपना शरीर सीधा रख सकता है, और इससे जाप की प्रक्रिया में सहायता मिलेगी; अन्यथा व्यक्ति उनींदा हो सकता है. ”

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 15- पाठ 31

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