सामान्य जीव विष्णु (कृष्ण) जितने महान नहीं होते, जो इस भौतिक रचना से बाहर हैं. चूँकि विष्णु और सामान्य जीव दोनों ही भौतिक रचना के नहीं होते, किसेी न किसी का प्रश्न हो सकता है, “आत्मा के सूक्ष्म कणों की रचना की ही क्यों गई थी?” उत्तर यह है कि परम संपूर्ण सत्य उनकी प्रवीणता में पूर्ण है जब वह अनंत और अतिसूक्ष्म दोनों है. यदि वे अनंत और अतिसूक्ष्म नहीं हैं, तो वे संपूर्ण नहीं हैं. अनंत भाग भगवान का विष्णु-तत्व या परम व्यक्तित्व है, और अतिसूक्ष्म भाग जीव है.

भगवान के परम व्यक्तित्व की अनंत इच्छाओं के कारण, आध्यात्मिक जगत में अस्तित्व है, और अतिसूक्ष्म इच्छाओं के कारण, भौतिक जगत में अस्तित्व है. जब अतिसूक्ष्म जीव भौतिक सुख की उनकी अतिसूक्ष्म इच्छाओं में लिप्त होते हैं, तब वे जीव शक्ति कहलाते हैं, लेकिन जब वे अनंत से सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं, तब वे मुक्त आत्माएँ कहलाते हैं. इसलिए यह पूछने की आवश्यकता नहीं है, कि भगवान ने अतिसूक्ष्म हिस्सों की रचना क्यों की, वे बस परम के पूरक भाग हैं. अनंत के लिए अतिसूक्ष्म भागों का होना आवश्यक है जो परम आत्मा के अविभाज्य भाग हैं. चूँकि जीव परम के ही भाग हैं, इसलिए अनंत और अतिसूक्ष्म के बीच भावनाओं की परस्परता है. यदि कोई भी अतिसूक्ष्म जीव न होते, तो परम भगवान निष्क्रिय होते, और आध्यात्मि जीवन में कोई विभिन्नताएँ नहीं होतीं. एक राजा का कोई अर्थ नहीं होगा यदि कोई प्रजा नहीं हों, और परम भगवान का कोई अर्थ नहीं होगा यदि कोई अतिसूक्ष्म जीव नहीं हों. भगवान शब्द का कोई अर्थ कैसे होगा यदि आधिपत्य के लिए कोई भी न हो? निष्कर्ष यह है कि जीव को परम भगवान की ऊर्जा का विस्तार ही माना जाता है, और परम भगवान, भगवान का व्यक्तित्व, कृष्ण, ही ऊर्जामय हैं.

साधारण शब्दों में, भगवान ने हमारी रचना उसी विधि से की है जैसे कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को स्वीकारता है. यदि कोई व्यक्ति पत्नी को अंगीकार करता है, तो उसे संतानों की प्राप्ति होती है. कोई पुरुष पत्नी और संतानों के भरण-पोषण का दायित्व इसलिए लेता है क्योंकि वह सोचता है कि वह उनके माध्यम से जीवन का सुख प्राप्त करेगा. भौतिक संसार में, हम देखते हैं कि पुरुष संध्या काल में अपनी पत्नी, बच्चों, और मित्रों के साथ आनंद प्राप्त करने का प्रयास करता है. इसलिए वह विभिन्न प्रकार के कई दायित्व लेता है. इसे आनंद (सुख) होना चाहिए, लेकिन चूँकि यह भौतिक जगत में घटित होता है, तो आनंद किसी अरुचिकर वस्तु में बदल जाता है. हालाँकि, हम इस आनंद का सुख परम पिता, कृष्ण के साथ होकर ले सकते हैं, हम परम पिता श्रीकृष्ण की संतानें हैं, उन्होंने हमें अपने आनंद के लिए बनाया है, न कि पीड़ा उपजाने के लिए. हालाँकि हम कृष्ण की संतानें हैं, हमने अपने परम पिता का त्याग कर दिया है क्योंकि हम मुक्त रह कर अपने आप आनंद लेना चाहते हैं. परिणामस्वरूप, हम पीड़ा भोग रहे हैं. यदि किसी संपन्न व्यक्ति का पुत्र अपना घर स्वतंत्र रहकर आनंद लेने के लिए छोड़ देता है, तो वह बस कष्ट भोगता है. घर लौटना, वापस परम भगवान की ओर लौटना, हमारे वास्तविक पिता, कृष्ण के साथ आनंद भोगना हमारे लिए लाभकारी होता है. इससे हमें प्रसन्नता मिलेगी. कृष्ण एश्वर्य से भरे हुए हैं. वे संपूर्णता में संपत्ति, शक्ति, सौंदर्य, कीर्ति, ज्ञान और आत्मत्याग पर स्वामित्व रखते हैं. उनके पास हर वस्तु असीमित मात्रा में है. यदि हम अपने वास्तविक पिता के पास लौटेंगे, तो हम उनके साथ असीमित सुख का भोग कर सकते हैं. हम कृष्ण से स्वतंत्र रह कर आनंद नहीं भोग सकते. ना ही हम यह कह सकते हैं कि आनंद प्राप्त करने के लिए हमें कृष्ण से एकाकार करना होगा. भौतिक संसार में, हमारे पिता हमें जन्म देते हैं, और हम उनसे स्वतंत्र जीव हैं. यदि हम पीड़ा भोग रहे हैं, तो क्या हम यह कहते हैं, “मेरे प्रिय पिता, मुझे पीड़ा हो रही है. क्या आप मेरा आपके साथ एकाकार फिर से कर लेंगे?” क्या ये बहुत अच्छा प्रस्ताव है? एक पिता कहता है, “मैंने तुम्हें स्वतंत्र रूप में प्राप्त किया है, ताकि तुम आनंद भोग सको. तुम स्वतंत्र रहोगे, और मैं स्वतंत्र रहूंगा, और हम इस प्रकार से ही सुख भोगेंगे. अब तुम मेरे साथ एक होने के लिए कह रहे हो. यह क्या मूर्खता है?”

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2012 संस्करण, अंग्रेजी), “भगवान चैतन्य की शिक्षाएँ, स्वर्ण अवतार”, पृष्ठ 202 और 203
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