व्यक्ति को ऐस नहीं सोचना चाहिए कि वह भगवान की उपासना में यांत्रिक रूप से संलग्न होकर कृष्ण के संपूर्ण पारलौकिक ज्ञान को अर्जित कर सकता है। यहाँ भगवान कृष्ण कहते हैं कि व्यक्ति को अपने चित्त में भगवान को निरंतर रखने का प्रयास करना चाहिए। अनुस्मरतः, या निरंतर स्मरण, ऐसे व्यक्ति के लिए संभव है जो सदैव भगवान की कृष्ण की महिमाओं का जाप और श्रवण करता है। इसलिए कहा गया है, श्रवणम, कीर्तनम, स्मरणम: भक्ति सेवा की प्रक्रिया सुनने (श्रवणम) और जाप (कीर्तनम) से प्रारंभ होती है, जिससे स्मरण (स्मरणम) विकसित होता है। जो व्यक्ति भौतिक संतुष्टि की वस्तुओं के बारे में लगातार विचार करता है वह उनसे आसक्त हो जाता है; उसी प्रकार, भगवान को निरंतर अपने चित्त में रखने वाला व्यक्ति भगवान की पारलौकिक प्रकृति में लीन हो जाता है और इर प्रकार भगवान के स्वयं के धाम में उनकी व्यक्तिगत सेवा को निष्पादित करने के योग्य बन जाता है।

स्रोत – अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद भागवतम”, ग्यारहवाँ सर्ग, अध्याय 14 – पाठ 27

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