जंगल की आग लकड़ी के दो टुकड़ों में घर्षण होने पर आरंभ होती है, जो पवन द्वारा उत्तेजित किए जाते हैं. वास्तव में, जबकि, अग्नि का संबंध न तो लकड़ी से और न ही पवन से होता है; वह हमेशा दोनों से ही भिन्न है. उसी प्रकार, जीव की जीवन शक्ति–आत्मा–मानव के डिंब और वीर्य से भिन्न होती है. यद्यपि बद्ध आत्मा का पुरुष और स्त्री की प्रजननीय कोशिकाओं से कोई संबंध नहीं होता, उसे उचित अवस्था में उसके कार्य के कारण रखा जाता है (कर्मणा दैव-नेत्रेण). तथापि जीवन दो निस्सारणों का उत्पाद नहीं है, बल्कि सभी भौतिक तत्वों से स्वतंत्र है. जैसा कि भगवद्-गीता में संपूर्णता में वर्णित किया गया है, जीव किसी भी भौतिक प्रतिक्रिया के अधीन नहीं होता. उसे न ही अग्नि से जलाया जा सकता है, न ही तीखे शस्त्रों से काटा जा सकता है, न ही जल से गीला किया जा सकता है, न ही पवन से सुखाया जा सकता है. वह भौतिक तत्वों से संपूर्ण रूप से भिन्न है, किंतु एक उच्चतर व्यवस्था द्वारा उसे इन भौतिक तत्वों में रखा जाता है. वह हमेशा भौतिक संपर्क से विलग होता है (असंगो हि अयम् पुरुषः) किंतु चूँकि उसे एक भौतिक अवस्था में रखा जाता है, वह प्रकृति की भौतिक अवस्थाओं की प्रतिक्रियाओं को भोगता है.

स्रोत – अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद् भागवतम्” , आठवाँ सर्ग, अध्याय 17 – पाठ 23

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