Śrīmad-Bhāgvatam – Canto 3

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भगवान कृष्ण की नित्य लीलाएँ बिना अंत के चली आ रही हैं.

सूर्य के साथ कृष्ण की तुलना बड़ी उचित है. जैसे ही सूर्य अस्त होता है, अंधेरा स्वतः ही हो जाता है. लेकिन सामान्य व्यक्ति के द्वारा अनुभव किए जाना वाला अंधकार सूर्योदय या सूर्यास्त के समय पर सूर्य पर कोई प्रभाव नहीं डालता. भगवान कृष्ण की उपस्थिति और अनुपस्थिति भी सूर्य के समान है. वे असंख्य ब्रम्हांडों में उपस्थित और अनुपस्थित होते रहते हैं, और जब तक वे किसी विशिष्ट ब्रह्मांड में उपस्थित हैं उस ब्रम्हांड में पारलौकिक प्रकाश विद्यमान होता है, लेकिन जिस ब्रम्हांड से वे चले जाते हैं वहाँ अंधेरा हो जाता है. यद्यपि उनकी लीलाएँ सर्वकालिक हैं. भगवान किसी न किसी ब्रम्हांड मे हमेशा उपस्थित रहते हैं, वैसे ही जैसे सूर्य पूर्वी या पश्चिमी गोलार्द्ध में उपस्थित रहता है. सूर्य भारत या अमेरिका में हमेशा विद्यमान होता है, लेकिन जब सूर्य भारत में होता है, तो अमेरिकी भूमि अंधेरे में होती है, औऱ जब सूर्य अमेरिका में उपस्थित होता है, तब भारतीय गोलार्द्ध अंधेरे में होता है. जैसा कि सूर्य भोर में दिखाई देता है और मध्याह्न तक धीरे-धीरे उगता है और फिर एक साथ एक गोलार्ध में उगते हुए दूसरे गोलार्ध में अस्त होता है, अतः भगवान कृष्ण का एक ब्रह्मांड में लुप्त होना और दूसरे में उनके अलग-अलग लीलाओं की शुरुआत एक साथ होती है. जैसे ही एक लीला यहाँ समाप्त होती है, वह दूसरे ब्रम्हांड में घटने लगती है. इसलिए उनकी नित्य-लीला या शाश्वत लीलाएँ बिना अंत के चली जा रही हैं. जैसे सूर्योदय चौबीस घंटे में एक बार होता है, उसी प्रकार भगवान कृष्ण की लीलाएँ ब्रम्हा के एक दिन में एक बार घटित होती हैं, जिसकी गणना भगवद-गीता में 4,300,000,000 सौर वर्षों के रूप में दिया गया है. लेकिन जहाँ भी भगवान उपस्थित होते हैं, प्रकट ग्रंथों में वर्णित उनकी सभी विभिन्न लीलाएँ नियमित अंतराल पर घटित होती रहती हैं. जैसे सूर्यास्त के समय साँप शक्तिशाली हो जाते हैं, चोर उत्साहित हो जाते हैं, भूत सक्रिय होते हैं, कमल झर जाता है और चक्रवाकी विलाप करता है, वैसे ही भगवान कृष्ण की अनुपस्थिति में, नास्तिक अनुप्राणित अनुभव करते हैं, और भक्त उदास हो जाते हैं.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी) “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 02- पाठ 07

भगवान ने स्वयं के शरीर में ही प्रस्थान किया.

वैदिक ऋचाओँ (नित्यो नित्यनाम चेतनस चेतनानाम्) के अनुरूप, भौतिक जगत के सभी ब्रह्मांडों के भीतर भगवान का व्यक्तित्व अन्य सभी जीवित प्राणियों की तुलना में अधिक उत्कृष्ट है. वे सभी जीवित प्राणियों के प्रमुख हैं; कोई भी संपत्ति, शक्ति, प्रसिद्धि, सौंदर्य, ज्ञान या त्याग में उनसे बड़ा या उनके समकक्ष नहीं हो सकता. जब भगवान कृष्ण इस ब्रह्माण्ड में थे, तो वे एक मानव के रूप में प्रतीत होते थे क्योंकि वे नश्वर संसार में अपनी लीलाओं के लिए उपयुक्त रूप में प्रकट हुए थे. वे अपने वैकुंठ रूप में चार भुजाओं के साथ मानव समाज में दिखाई नहीं दिए क्योंकि यह उनकी लीलाओँ के लिए उपयुक्त नहीं होता. लेकिन एक मानव रूप में दिखाई देने पर भी, कोई भी छः विभिन्न एश्वर्यों में से किसी में भी उनके समकक्ष नहीं था या है. इस संसार में हर कोई अपने एश्वर्य पर न्यूनाधिक गर्वित है, लेकिन जब भगवान कृष्ण मानव समाज में थे, तो वे ब्रम्हांड में अपने सभी समकालीनों से आगे थे. जब भगवान की लीलएँ मानव नेत्रों के लिए दृष्टिगोचर होती हैं, तब वे प्रकट कहलाती हैं, और जब वे दिखाई नहीं देती, तो वे अप्रकट कहलाती हैं. वास्तव में, भगवान की लीलाएँ कभी नहीं रुकती, जैसे सूर्य आकाश को कभी नहीं छोड़ता. सूर्य आकाश में हमेशा अपनी सही कक्षा में होता है, लेकिन हमारी सीमित दृष्टि में वह कभी दृष्टिगोचर होता है कभी नहीं होता. उसी समान, भगवान की लीलाएँ एक या दूसरे ब्रम्हांड में हमेशा जारी रहती हैं, और जब भगवान कृष्ण द्वारका के पारलौकिक धाम से प्रस्थान कर गए, तब वह वहाँ के लोगों की दृष्टि में बस एक अनुपस्थिति भर थी. ऐसा समझने की त्रुटि नहीं करनी चाहिए कि उनका पारलौकिक शरीर, जो मृत्युलोक में लीलाओँ के लिए उपयुक्त है, किसी भी रूप में वैकुंठलोकों में उनके विभिन्न विस्तारों से कमतर है. भौतिक संसार में उनके शरीर का प्रकटन इस अर्थ में सर्वोत्कृष्ट रूप से पारलौकिक है कि नश्वर संसार में उनकी लीलाएँ वैकुंठलोक में प्रदर्शित उनकी दया से श्रेष्ठ हैं. वैकुंठलोक में भगवान मुक्त या नित्य-मुक्त जीवों के प्रति दयालु हैं, लेकिन मृत्युलोक में उनकी लीलाओं में वे पतित आत्माओं के प्रति भी दयालु हैं जो हमेशा के लिए नित्य-बद्ध हैं. छः उत्तम एश्वर्य जो उन्होंने अपनी आंतरिक ऊर्जा, योग-माया के माध्यम से मृत्युलोक में प्रदर्शित किए थे, वैकुंठलोक में भी दुर्लभ हैं. उनकी सभी लीलाएँ भौतिक ऊर्जा से नहीं बल्कि उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा से प्रकट हुई थीं. वृंदावन में उनकी रास-लीला और सोलह हज़ार पत्नियों के साथ उनके गृहस्थ जीवन की उत्कृष्टता वैकुंठ में नारायण के लिए भी अद्भुत है और निश्चित ही इस नश्वर संसार में अन्य जीवों के लिए भी. उनकी लीलाएँ भगवान के अन्य अवतारों, जैसे श्रीराम, नृसिंह और वराह के लिए भी अद्भुत हैं. उनका एश्वर्य इतना उत्कृष्ट था कि उनकी लीलाओं की प्रशंसा वैकुंठ के भगवान द्वारा भी की जाती थी, जो स्वयं भगवान कृष्ण से भिन्न नहीं हैं. जब भगवान उपस्थित थे, वे लोग जो उन्हें सही दृष्टिकोण में देख कर अपनी भौतिक उत्कंठा को संतुष्ट करने योग्य थे वे उनके साथ उनके राज्य में वापस जाने में समर्थ हैं. जब भगवान सभी लोगों की दृष्टि से ओझल हो गए, तब उन्होंने ऐसा अपने मूल शाश्वत रूप में किया था. भगवान ने स्वयं अपने शरीर में प्रस्थान किया था; उन्होंने अपना शरीर नहीं छोड़ा था जैसा कि बद्ध आत्माएँ त्रुटिवश समझती हैं. यह कथन विश्वासहीन अ-भक्तों के झूठे प्रचार को परास्त करता है कि भगवान का अवसान किसी साधारण बद्ध आत्मा जैसे हुआ था. भगवान संसार को अविश्वासी असुरों के अनुचित बोझ से मुक्त करने के लिए प्रकट हुए थे; और ऐसा करने के बाद; वे संसार की आँखों से ओझल हो गए.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी) “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 02- पाठ 11 व 12

जनसंख्या में वृद्धि के कारण पृथ्वी पर कभी भी अधिक भार नहीं पड़ा है.

यह एक गलत सिद्धांत है कि जनसंख्या में वृद्धि के कारण संसार पर अत्यधिक भार पड़ता है और इसलिए युद्ध और अन्य विनाशकारी प्रक्रियाएँ होती हैं. पृथ्वी पर कभी भी अधिक भार नहीं पड़ता है. पृथ्वी की सतह पर सबसे भारी पर्वतों और महासागरों में मानव जीवों की तुलना में अन्य जीव अधिक होते हैं, और उन पर अतिरिक्त भार नहीं पड़ता. यदि पृथ्वी की सतह पर सभी जीवेम की जनगणना की गई, तो निश्चित रूप से यह पाया जाएगा कि मनुष्यों की संख्या कुल जीवों की संख्या का पाँच प्रतिशत भी नहीं है. यदि मनुष्य की जन्मदर बढ़ रही है, तो अन्य जीवों की जन्मदर भी आनुपातिक रूप से बढ़ रही है. निम्नतर प्राणियों – पशुओं, जलीय जीवों, पक्षियों, आदि की जन्मदर – मनुष्य की तुलना में कहीं अधिक है. परम भगवान की व्यवस्था से पृथ्वी पर सभी जीवों के लिए भोजन की पर्याप्त व्यवस्था है, और यदि वास्तव में जीवित प्राणियों की अनुपातहीन वृद्धि हो तो वे और अधिक की व्यवस्था भी कर सकते हैं. इसलिए, जनसंख्या में वृद्धि के कारण कोई बोझ नहीं है. धर्म-ग्लानि, या भगवान की इच्छा के अनियमित निर्वहन के कारण पृथ्वी बोझिल हो गई है. भगवान जनसंख्या में वृद्धि के कारण नहीं बल्कि दुष्टों की वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए पृथ्वी पर प्रकट हुए थे, जैसा कि सांसारिक अर्थशास्त्रियों द्वारा त्रुटिपूर्ण ढंग से बताया जाता है. जब भगवान कृष्ण प्रकट हुए, तब दुष्टों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि हुई थी जिन्होंने प्रभु की इच्छा का उल्लंघन किया था. भौतिक सृष्टि भगवान की इच्छा को पूरा करने के लिए है, और उनकी इच्छा यह है कि जो बद्ध आत्माएँ भगवान के राज्य में प्रवेश करने के लिए अयोग्य हैं, उन्हें प्रवेश करने के लिए अपनी स्थितियों में सुधार करने का अवसर मिले. ब्रह्मांडीय व्यवस्था की पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य केवल बद्ध आत्माओं को भगवान के राज्य में प्रवेश करने का अवसर देना है, और भगवान की प्रकृति द्वारा उनके पालन की पर्याप्त व्यवस्था है. इसलिए, यद्यपि पृथ्वी की सतह पर जनसंख्या में भारी वृद्धि हो सकती है, यदि लोग सटीक रूप से ईश्वर चेतना के अनुरूप रहें और दुराचारी नहीं हों, तो पृथ्वी पर इस तरह का बोझ उसके लिए प्रसन्नता का एक स्रोत है. दो तरह के बोझ होते हैं. एक पशु का बोझ है और प्रेम का बोझ है. पशु का बोझ असहनीय है, लेकिन प्रेम का बोझ प्रसन्नता का एक स्रोत होता है. श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती प्रेम के बोझ का बहुत व्यावहारिक रूप से वर्णन करते हैं. उनका कहना है कि युवा पत्नी पर पति का बोझ, माँ की गोद में बच्चे का बोझ और व्यवसायी पर धन का बोझ, हालाँकि वास्तव में भारीपन के दृष्टिकोण से बोझ, आनंद के स्रोत होते हैं, और ऐसी बोझिल वस्तुओं की अनुपस्थिति में, व्यक्ति को अलगाव का बोझ अनुभव हो सकता है, जो प्रेम के वास्तविक बोझ से अधिक भारी होता है. जब भगवान कृष्ण ने पृथ्वी पर यदु वंश के बोझ का उल्लेख किया, तो उन्होंने पशु के बोझ से कुछ भिन्न का उल्लेख किया. भगवान कृष्ण से उत्पन्न हुए परिवार के सदस्यों की बड़ी संख्या कुछ लाखों तक थी और निश्चित रूप से पृथ्वी की जनसंख्या में काफी वृद्धि हुई थी, लेकिन चूँकि वे सभी उनके पारलौकिक पूर्ण विस्तार द्वारा स्वयं भगवान के विस्तार थे, इसलिए वे पृथ्वी के लिए बहुत प्रसन्नता का स्रोत थे. जब भगवान ने उन्हें पृथ्वी पर बोझ के संबंध में संदर्भित किया, तो उनके मन में पृथ्वी से उनके अनुपस्थित हो जाने की निकटता का ध्यान था. भगवान कृष्ण के परिवार के सभी सदस्य विभिन्न देवताओं के अवतार थे, और उन्हें भगवान के साथ पृथ्वी की सतह से अनुपस्थित हो जाना था. जब उन्होंने यदु वंश के संबंध में पृथ्वी पर असहनीय भारीपन का उल्लेख किया, तो वे उनके अलगाव के बोझ का उल्लेख कर रहे थे. श्रील जीव गोस्वामी इस निषकर्ष की पुष्टि करते हैं.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” तीसरा सर्ग, अध्याय 03 – पाठ 14

भगवान और उनके सहयोगी भगवान की इच्छा से प्रकट और अप्रकट होते हैं.

भगवान और उनके सहयोगी भगवान की इच्छा से प्रकट और अप्रकट होते हैं. वे भौतिक प्रकृति के नियमों के अधीन नहीं है. इसलिए उनके प्रस्थान के लिए एकमात्र साधन स्वयं उनके बीच एक लड़ाई दिखाना था, जैसे वे मदिरापान के कारण नशे में लड़ रहे हों. वह तथा-कथित लड़ाई भी भगवान की इच्छा से ही घटित होगी, अन्यथा उनकी लड़ाई के लिए कोई हेतु नहीं होगा. जैसे अर्जुन को पारिवारिक स्नेह के भ्रम में डाला गया था और उस प्रकार भगवद्-गीता कही गई थी, ताकि भक्त और भगवान के सहयोगी पूर्ण रूप से आत्मा को समर्पित कर दें. अतः वे भगवान के हाथों के पारलौकिक यंत्र हैं और भगवान की इच्छा से किसी भी विधि से प्रयोग में लाए जा सकते हैं. विशुद्ध भक्त भी भगवान की ऐसी लीलाओं का आनंद लेते हैं क्योंकि वे उन्हें प्रसन्न देखना चाहते हैं. भगवान के भक्त कभी भी स्वतंत्र व्यक्तित्व का दावा नहीं करते; इसके विपरीत, वे अपनी वैयक्तिकता का उपयोग भगवान की इच्छा की पूर्ति के लिए करते हैं, और भगवान के साथ भक्तों का यह सहयोग भगवान की लीलाओँ के लिए एक सटीक दृश्य बनाता है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी) “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 03- पाठ 15

भगवद्-गीता और श्रीमद्-भागवतम् जैसे आध्यात्मिक साहित्य का सौंदर्य यह है कि वे कभी पुराने नहीं होते.

दो बार जन्म लेने वाले सभ्य पुरुषों, गौ और देवताओं की सुरक्षा के लिए भगवान की क्रीड़ा सदैव पारलौकिक है. एक मनुष्य अच्छे किस्सों और कहानियों को सुनने के लिए इच्छुक रहता है, और इसलिए विकसित आत्मा की रुचियों को संतुष्ट करने के लिए बाज़ार में बहुत सारी किताबें, पत्रिकाएं और समाचार पत्र होते हैं. किंतु एक बार पढ़ लेने के बाद, इस तरह के साहित्य का आनंद बासी हो जाता है, और लोग ऐसे साहित्य को बार-बार पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं लेते हैं. वास्तव में, समाचार पत्रों को एक घंटे से भी कम समय के लिए पढ़ा जाता है और फिर कूड़ेदान में कचरे के रूप में डाल दिया जाता है. सभी साधारण साहित्य के साथ यही होता है. लेकिन भागवद्-गीता और श्रीमद्-भागवतम् जैसे साहित्य का यह सौंदर्य है कि वह कभी पुराना नहीं पड़ता. उन्हें पिछले पाँच हज़ार वर्षों से पूरे संसार में सभ्य मनुष्यों द्वारा पढ़ा जा रहा है, और वे कभी पुराने नहीं हुए. वद्वान और भक्तों के लिए वे सदैव नए हैं, भागवद्-गीता और श्रीमद्-भागवतम् के श्लोकों का प्रतिदिन वाचन करने के बाद भी, विदुर जैसे भक्त तृप्त नहीं होते. विदुर ने शायद मैत्रेय से मिलने से पहले कई बार प्रभु के अतीत के किस्से सुने होंगे, लेकिन फिर भी वे चाहते थे कि उन्हीं आख्यानों को दोहराया जाए क्योंकि उन्हें सुनकर वह कभी भी तृप्त नहीं हुए। विदुर ने मैत्रेय से मिलने से पहले भी कई बार भगवान की लीलाएँ सुनी होंगी, लेकिन फिर भी वे चाहते थे कि उन कथाओं को दोहराया जाए क्योंकि वे उन्हें सुनकर उनका मन नहीं भरता था.

अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 5 – पाठ 7

भौतिक विज्ञान की कोई भी वैज्ञानिक उन्नति कभी भी जीव को उत्पन्न नहीं कर सकती है.

किसी भी जीव की संतान तब जन्म लेती है जब पित वीर्य से माँ का गर्भाधान कर देता है, और पिता के वीर्य में तैरती जैव उपस्थिति माँ के रूप का आकार लेती है. इसी प्रकार, माँ भौतिक प्रकृति अपने भौतिक तत्वों से किसी भी जीव को उत्पन्न नहीं कर सकती है जब तक कि वह स्वयं भगवान द्वारा जीवों से गर्भवती न बनाई जाए. यह जीवों की संतति का रहस्य है. यग गर्भाधान प्रक्रिया पहले पुरुष अवतार, करनार्णवासयी विष्णु द्वारा की जाती है. भौतिक प्रकृति पर उनकी दृष्टि मात्र से, संपूर्ण तत्व निष्पादित हो जाता है. हमें भगवान के परम व्यक्तित्व द्वारा गर्भाधान की प्रक्रिया को हमारी संभोग की अवधारणा के संदर्भ से नहीं समझना चाहिए. सर्वशक्तिमान भगवान केवल अपनी आँखों से गर्भाधान कर सकते हैं, और इसलिए उन्हें सर्व शक्तिशाली कहा जाता है. ब्रह्म-संहिता (5.32) में इसकी पुष्टि की गई है: अंगनि यस्य सकलेन्द्रिय-वृत्तिमन्ति. भागवद गीता (14.3) में भी, इसी सिद्धांत की पुष्टि की गई है: मम योनीर महद-ब्रह्म तस्मिन गर्भम दधाम्य अहम्. जब लौकिक सृष्टि प्रकट होती है, तो जीवों को सीधे भगवान द्वारा आपूर्ति की जाती है; वे कभी भी भौतिक प्रकृति के उत्पाद नहीं होते हैं. इस प्रकार, भौतिक विज्ञान की कोई भी वैज्ञानिक उन्नति कभी भी जीवों को उत्पन्न नहीं कर सकती है. वही भौतिक रचना का संपूर्ण रहस्य है. जीव पदार्थ के लिए विजातीय हैं, और इस प्रकार वे तब तक प्रसन्न नहीं रह सकते जब तक कि वे भगवान के समान आध्यात्मिक जीवन में स्थित न हों. जीवन की इस मूल स्थिति को भूल जाने के कारण त्रुटिपूर्ण जीव, भौतिक संसार में प्रसन्न रहने का प्रयास करते हुए अनावश्यक रूप से समय नष्ट करता है. पूरी वैदिक प्रक्रिया जीवन की विशेषताओं में से इस को याद दिलाने के लिए है. भगवान बद्ध आत्मा को उसके तथाकथित भोग के लिए भौतिक शरीर प्रदान करते हैं, लेकिन अगर कोई चेतना में नहीं आता है और आध्यात्मिक चेतना में प्रवेश नहीं करता है, तो भगवान उसे फिर से अव्यक्त स्थिति में डाल देते हैं जैसाकि वह सृष्टि के प्रारंभ में अस्तित्वमान था. भगवान का वर्णन यहाँ वीर्यवान, या सबसे बड़े शक्तिशाली के रूप में किया जाता है, क्योंकि वे भौतिक प्रकृति को असंख्य जीवों के साथ गर्भवान करते हैं जो अनादि काल से बद्ध हैं.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” तीसरा सर्ग, अध्याय 05 – पाठ 26

महत्-तत्व विशुद्ध चेतना की परछाईं है जहाँ से जीवों के मिथ्या अहंकार का जन्म होता है.

महत्-तत्व पूर्ण चेतना है क्योंकि इसके एक भाग का प्रतिनिधित्व हर एक प्राणी में बु्द्धि के रूप में होता है. महत्-तत्व परम जीव की परम चेतना से सीधे जुड़ा होता है, लेकिन फिर भी वह पदार्थ लगता है. महत्-तत्व, या विशुद्ध चेतना की परछाई, समस्त रचना का अंकुरण स्थान है. वह कामना की स्थिति के किंचित मिश्रण के साथ शुद्ध अच्छाई है, और इस प्रकार कर्म इस बिंदु से पैदा होता है.

महत्-तत्व विशुद्ध आत्मा और भौतिक अस्तित्व के बीच का माध्यम है. वह पदार्थ और आत्मा के बीच का जुड़ाव है जहाँ से जीव का मिथ्या अहंकार उपजता है. सभी जीव परम भगवान के व्यक्तित्व के अलग-अलग हिस्से हैं. मिथ्या अहंकार के दबाव में, सीमित आत्माएँ, परम भगवान के व्यक्तित्व का हिस्सा होकर भी, स्वयं को भौतिक प्रकृति का भोक्ता समझती हैं. यह मिथ्या अहंकार भौतिक अस्तित्व को बांधने वाली शक्ति है. भगवान बारंबार किंकर्तव्यविमूढ़ सीमित आत्माओं को मिथ्या अहंकार से मुक्त होने का अवसर देते हैं, और इसीलिए अंतराल से भौतिक रचना होती रहती है. वे सीमित आत्माओं को मिथ्या अहंकार की गतिविधियों को ठीक करने के लिए सभी सुविधाएँ प्रदान करते हैं, लेकिन वे भगवान के भाग के रूप में उनकी लघु स्वतंत्रता में व्यवधान नहीं करते.

अपने मूल आध्यात्मिक अस्तित्व में शुद्ध जीव भगवान के सेवक के रूप में अपनी प्राकृतिक स्थिति के प्रति पूर्ण सचेत होता है. ऐसी शुद्ध चेतना में स्थित सभी आत्माएँ मुक्त हो जाती हैं, और इस प्रकार वे आध्यात्मिक आकाश के विभिन्न वैकुंठ ग्रहों में आनंद और ज्ञान के साथ सदैव रहती हैं. जब भौतिक रचना का प्रकटन होता है, तो वह उनके लिए नहीं होता. हमेशा के लिए मुक्त आत्माओं को नित्य-मुक्त कहा जाता है, और उनका भौतिक रचना के साथ कोई संबंध नहीं होता. भौतिक रचना विद्रोही आत्माओं के लिए है जो भगवान की छत्रछाया में समर्पण स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होती हैं. झूठे स्वामित्व की भावना को मिथ्या अहंकार कहा जाता है. यह भौतिक प्रकृति के तीन प्रकारों में प्रकट होता है, और यह केवल मानसिक अटकलों में अस्तित्व मान होता है. जो लोग भलाई की अवस्था में होते हैं, वे सोचते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति भगवान है, और इस प्रकार वे विशुद्ध भक्तों पर हंसते हैं, जो प्रभु की पारलौकिक प्रेममयी सेवा में संलग्न होने का प्रयास करते हैं. जो लोग उत्कंठा से भरे होते हैं वे इसे विभिन्न तरीकों से भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व देने का प्रयास करते हैं. उनमें से कुछ परोपकारी गतिविधियों में संलग्न होते हैं जैसे कि वे उनकी मानसिक अटकल भरी योजनाओं द्वारा दूसरों का भला करने के लिए नियुक्त किए गए भगवान के प्रतिनिधि हों. ऐसे पुरुष सांसारिक परोपकार के मानक तरीकों को स्वीकार करते हैं, लेकिन उनकी योजनाएँ मिथ्या अहंकार के आधार पर बनाई जाती है. यह मिथ्या अहंकार प्रभु के साथ एक होने की सीमा तक फैल जाता है. अहंकारी सीमित आत्माओं के अंतिम वर्ग को–जो अज्ञानता की अवस्था में होती हैं–स्थूल शरीर के साथ आत्म की पहचान द्वारा पथभ्रष्ट किया जाता है. इस प्रकार, उनकी सभी गतिविधियाँ केवल शरीर के आसपास केंद्रित होती हैं. इन सभी व्यक्तियों को मिथ्या अहंकारी विचारों के साथ खेलने का मौका दिया जाता है, लेकिन साथ ही भगवान इतने दयालु होते हैं कि वे उन्हें भागवद्-गीता और श्रीमद्-भागवतम् जैसे ग्रंथों से सहायता लेने का अवसर देते हैं ताकि वे कृष्ण के विज्ञान के समझ सकें और इस प्रकार अपने जीवन को सफल बना सकें. इसलिए समस्त भौतिक रचना, भौतिक प्रकृति की अवस्था में विभिन्न भ्रमों के अधीन मानसिक धरातल पर मंडरा रहे मिथ्या अहंकारमयी जीवों के लिए है.

भौतिक प्रकृति की विभिन्न प्रकारों से व्यवहार करने वाला मिथ्या अहंकार प्रकट संसार में विद्यमान सभी भौतिक पदार्थों का स्रोत है. मिथ्या अहंकार का प्रमुख कार्य भगवानविहीनता है. जब कोई व्यक्ति परम भगवान के व्यक्तित्व के स्थायी रूप से गौण भाग के रूप में अपनी प्राकृतिक स्थिति को भूल जाता है, तब वह दो प्रमुख तरह का व्यवहार करता है. पहले वह व्यक्तिगत लाभ या इंद्रिय सुख के लिए चोर समान कर्म करता है, और पर्याप्त समयावधि तक इस तरह के कर्म करने का प्रयास करने के बाद, जब वह निराश हो जाता है तब वह दार्शनिक रूप से सोचने लगता है और स्वयं को भगवान के स्तर का समझने लगता है. भगवान के साथ एकाकार करने का यह झूठा विचार भ्रामक ऊर्जा का अंतिम प्रलोभन होता है, जो किसी जीव को मिथ्या अहंकार की माया के अधीन विस्मृति की दासता में जकड़ लेता है. मिथ्या अहंकार के पंजे से मुक्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन है कि परम सत्य के संबंध में दार्शनिक अटकलों की आदत को छोड़ दिया जाए. व्यक्ति को निश्चित रूप से ज्ञात होना चाहिए कि परम सत्य का अनुभव कभी भी अहंकारी व्यक्ति की अपूर्ण दार्शनिक अटकलों द्वारा नहीं होता है. परम सत्य, या भगवान के परम व्यक्तित्व का अनुभव संपूर्ण समर्पण और प्रेम के साथ किसी प्रामाणिक विशेषज्ञ द्वारा सुनने पर होता है जो श्रीमद्-भागवतम् में वर्णित बारह महान विशेषज्ञों का प्रतिनिधि हो. केवल ऐसे प्रयास से ही कोई भगवान की मायावी ऊर्जा पर विजय पा सकता है, यद्यपि दूसरों के लिए वह अजेय है, जैसा कि भागवद्-गीता (7.14) में पुष्ट किया गया है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण – अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 5 – पाठ 27 से 31

मिथ्या अहंकार जीवों को किस प्रकार विस्मृति के बंधन में फ़ंसा लेता है.

मिथ्या अहंकार का प्रमुख कार्य नास्तिकता है. जब कोई व्यक्ति भगवान के परम व्यक्तित्व के नित्य उप अंश के रूप में अपनी मूल स्थिति को भूल जाता है और स्वतंत्र रूप से प्रसन्नता चाहता है, तो वह मुख्य रूप से दो तरह से व्यवहार करता है. पहले तो वह व्यक्तिगत लाभ या इंद्रिय सुख के लिए चोरी छिपे कर्म करने का प्रयास करता है, जब वो निराश हो जाता है तो वह एक दार्शनिक कल्पना करने वाला बन जाता है और स्वयं के बारे में सोचता है कि वह भगवान के समान स्तर पर है. भगवान के साथ एक हो जाने का यह झूठा विचार छलकारी ऊर्जा का अंतिम प्रलोभन होता है, जो किसी भी जीव को मिथ्या अहंकार के भ्रमजाल के प्रभाव में विस्मृति के बंधन में फ़ंसा लेती है.

मिथ्या अहंकार के चंगुल से मुक्ति का सबसे अच्छा साधन पूर्ण सत्य के बारे में दार्शनिक अटकलों की आदत को छोड़ना है. यह निश्चित रूप से जानना चाहिए कि परम सत्य को कभी भी अपूर्ण अहंकारी व्यक्ति की दार्शनिक कल्पनाओं द्वारा महसूस नहीं किया जाता है. परम सत्य, या भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का अनुभव, संपूर्ण समर्पण और प्रेम के साथ ऐसे विशेषज्ञ से उनके बारे में सुनने से होता है जो श्रीमद-भागवतम् में वर्णित बारह महान अधिकारियों का प्रतिनिधि हो. केवल ऐसे प्रयास से ही भगवान की मायावी ऊर्जा पर विजय पाई जा सकती है, हालाँकि अन्य के लिए वह सर्वोत्कृष्ट है, जैसा कि भगवद्-गीता (7.14) में पुष्टि की गई है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 5 – पाठ 31

भगवान की दृष्टि के बिना कोई भी भौतिक रचना नहीं हो सकती.

सूक्ष्म से स्थूल तक सभी भौतिक रचनाएँ घटित होती हैं. संपूर्ण ब्रम्हांड इसी विधि से विकसित हुआ है. आकाश से स्पर्श बोध विकसित हुआ, जो बाह्य समय, परम भगवान के व्यक्तित्व की बाह्य ऊर्जा और दृष्टि का एक मिश्रण है. स्पर्श बोध आकाश में वायु के अंतर्गत विकसित हुआ. इसी समान, अन्य सभी स्थूल पदार्थ भी सूक्ष्म से स्थूल में विकसित हुए: ध्वनि आकाश में विकसित हुई, स्पर्श वायु में, रूप अग्नि में विकसित हुआ, स्वाद जल में विकसित हुआ, और गंध पृथ्वी में विकसित हुई.

उसके बाद अत्यंत बलशाली वायु ने, आकाश से संवाद करके, इंद्रिय बोध का रूप पैदा किया, और रूप बोध विद्युत में परिवर्तित हुआ, वह प्रकाश जिससे संसार को देखा जा सके. जब विद्युत वायु में अधिभारित की गई और परम भगवान द्वारा उस पर दृष्टिपात किया गया, उस समय, शाश्वत समय और बाह्य ऊर्जा के मिश्रण द्वारा, जल और स्वाद की रचना हुई.

उसके बाद विद्युत से उत्पन्न जल पर परम भगवान के सर्वोत्तम व्यक्तित्व द्वारा दृष्टि डाली गई और उसे शाश्वत समय और बाह्य ऊर्जा से मिलाया गया. इस प्रकार वह पृथ्वी में रूपांतरित हो गया, जो मुख्य रूप से गंध के गुण से संपन्न होती है.

उपरोक्त छंदों में किए गए भौतिक तत्वों के वर्णन से, यह स्पष्ट है कि सभी चरणों में अन्य परिवर्धनों और परिवर्तनों के साथ सर्वोच्च की दृष्टि की आवश्यकता होती है. प्रत्येक रूपांतरण में, अंतिम परिष्करण स्पर्श प्रभु की झलक होती है, जिनकी भूमिका एक चित्रकार जैसी होती है जब वह विभिन्न रंगों को मिलाकर कोई विशिष्ट रंग बनाता है. जब एक तत्व किसी अन्य तत्व के साथ मिलता है, तब उसके गुणों में वृद्धि हो जाती है. उदाहरण के लिए, आकाश वायु का कारण है. आकाश का केवल एक गुण होता है, जो है ध्वनि, परंतु आकाश के भगवान की दृष्टि से संवाद, और शाश्वत समय और बाह्य प्रकृति से उसके मिश्रण से, वायु उत्पन्न होती है, जिसके दो गुण, ध्वनि और स्पर्श होते हैं. उसी प्रकार, वायु की उत्पत्ति के बाद, समय और भगवान की बाह्य ऊर्जा से मिश्रित आकाश और वायु का संवाद, विद्युत का निर्माण करता है. और समय के साथ मिश्रित विद्युत का वायु और आकाश, उन पर भगवान की दृष्टि और बाह्य ऊर्जा के साथ संगम से, जल का निर्माण होता है. आकाश के अंतिम चरण में एक गुण होता है, अर्थात ध्वनि; वायु में दो गुण, ध्वनि और स्पर्श; विद्युत में तीन गुण, अर्थात् ध्वनि, स्पर्श और रूप; जल में चार गुण, ध्वनि, स्पर्श, रूप और स्वाद; और भौतिक विकास के अंतिम चरण का परिणाम पृथ्वी होता है, जिसमें सभी पाँच गुण–ध्वनि, स्पर्श, रूप, स्वाद और गंध होते हैं. हालाँकि वे विभिन्न सामगियों के विभिन्न मिश्रण होते हैं, ऐसे मिश्रण अपने आप नहीं घटित होते, उसी तरह जैसे रंगों का मिश्रण बिना जीवित चित्रकार के स्पर्श के नहीं घटित होता. स्वचालित प्रणाली वास्तव में प्रभु की दृष्टि के स्पर्श से सक्रिय हो जाती है.जीवित चेतना सभी भौतिक परिवर्तनों में अंतिम है. इस तथ्य का उल्लेख भगवद-गीता (9.10) में इस प्रकार किया गया है:

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते

उपसंहार यही है कि साधारण दृष्टि से देखने पर भौतिक तत्व आश्चर्यजनक रूप से कार्य करते होंगे,लेकिन उनका कार्य कर पाना वास्तव में भगवान की देख-रेख में होता है. वे जो केवल भौतिक तत्वों के परिवर्तन को ही देख पाते हैं और उनके पीछे भगवान के छिपे हुए हाथों को नहीं देख पाते, वे निश्चित ही अल्प बुद्धि वाले हैं, यद्यपि हो सकता है उनकी प्रसिद्धि महान भौतिक वैज्ञानिकों के रूप में हो.

स्रोत:अभय भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), श्रीमद भागवतम्, तृतीय सर्ग, अध्याय 5 – पाठ 33 से 36.

ब्रम्हांड के विघटन के बाद भिन्न-भिन्न आत्माओं का क्या होता है?

उत्पत्ति के विघटन के बाद प्रत्येक आत्मा अचेत बनी रहती है और इस प्रकार अपनी भौतिक ऊर्जा के साथ भगवान में प्रविष्ट हो जाती है. ये भिन्न-भिन्न आत्माएँ हमेशा के लिए बद्ध आत्माएँ होती हैं, लेकिन प्रत्येक भौतिक रचना में उन्हें स्वयं को मुक्त करने और स्वतंत्र आत्मा बन जाने का अवसर दिया जाता है. उन सभी को वैदिक ज्ञान का लाभ उठाने और यह जानने का अवसर दिया जाता है कि परम भगवान के साथ उनका क्या संबंध है, वे मुक्त कैसे हो सकती हैं, और एसी मुक्ति में परम लाभ क्या है. वेदों का सही ढंग से अध्ययन करने से व्यक्ति अपनी स्थिति के प्रति सचेत हो जाता है और इस प्रकार भगवान की पारलौकिक भक्तिमय सेवा में लग जाता है और धीरे-धीरे उसे आध्यात्मिक आकाश में उन्नत किया जाता है. भौतिक दुनिया में भिन्न-भिन्न आत्माएं अपनी पिछली अधूरी इच्छाओं के अनुसार विभिन्न गतिविधियों में संलग्न होती हैं. किसी विशिष्ट शरीर के विघटन के बाद, वह आत्मा सब कुछ भूल जाती है, लेकिन परम-दयालु भगवान, जो सभी के हृदय में साक्षी, परमात्मा के रूप में विराजमान होते हैं, उसे जगाते हैं और उसकी पिछली इच्छाओं का स्मरण दिलाते हैं, और इस प्रकार वह अपने अगले जन्म में उसी अनुसार कर्म करना शुरू कर देता है. इस अनदेखे मार्गदर्शन को भाग्य रूप में वर्णित किया जाता है, और एक बुद्धिमान व्यक्ति समझ सकता है कि इस प्रकार प्रकृति की तीन विधियों से उसका भौतिक बंधन जारी रहता है.

सृजन के आंशिक या संपूर्ण विघटन के ठीक बाद जीव की अचेतन नींद की अवस्था को कुछ कम बुद्धिमान दार्शनिकों द्वारा गलत ढंग से जीवन के अंतिम चरण के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है. आंशिक भौतिक शरीर के विघटन के बाद, जीव कुछ महीनों के लिए ही मूर्च्छित रहता है, और भौतिक रचना के संपूर्ण विनाश के बाद, वह कई लाख वर्षों के लिए अचेत रहता है. लेकिन जब सृष्टि फिर से जीवित हो जाती है, तो उसे प्रभु द्वारा अपने कार्य के लिए जागृत किया जाता है. जीव शाश्वत है, और गतिविधियों से प्रकट होने वाली, उसकी चेतना की जागृत स्थिति, उसके जीवन की प्राकृतिक स्थिति है. वह जागृत अवस्था मे कर्म करना नहीं रोक सकता, और इस प्रकार वह अपनी विभिन्न इच्छाओं के अनुसार कर्म करता है. जब उसकी लालसाओं को भगवान की पारलौकिक सेवा की शिक्षा दी जाती है, तब उसका जीवन परिपूर्ण हो जाता है, और उसे अमर जागृत जीवन का आनंद लेने के लिए आध्यात्मिक आकाश में पदोन्नत कर दिया जाता है.

स्रोत: अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण – अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तीसरा सर्ग, अध्याय 06 – पाठ 03

इंद्रियाँ शरीर के भीतर की दस प्रकार की वायुओं से बल पाती हैं.

भगवद-गीता (7.4-5) में कहा गया है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और मिध्या अहंकार के सभी आठ तत्व भगवान की हीन ऊर्जा के उत्पाद हैं, जबकि जीव, जिन्हें हीन ऊर्जा का उपयोग करते देखा जाता है, मूल रूप से उच्चतर ऊर्जा, भगवान की आंतरिक शक्ति से संबंध रखते हैं. आठ हीन ऊर्जाएँ स्थूल और सूक्ष्म रूप से कार्य करती हैं, जबकि उच्चतर ऊर्जा केंद्रीय सृजन शक्ति के रूप में कार्य करती है. इसका अनुभव मानव शरीर में होता है. स्थूल तत्व, अर्थात्, पृथ्वी, आदि, बाहरी स्थूल शरीर का निर्माण करते हैं और एक आवरण जैसे होते हैं, जबकि सूक्ष्म चित्त और मिथ्या अहंकार शरीर के आंतरिक वस्त्रों के जैसे कार्य करते हैं. शरीर की हलचलें पहले हृदय से उत्पन्न होती हैं, और शरीर की सभी गतिविधियों को, शरीर के भीतर दस प्रकार की वायु द्वारा संचालित इंद्रियों के द्वारा संभव बनाया जाता है. दस प्रकार की वायु को निम्नानुसार वर्णित किया जाता है: श्वास में नाक से गुजरने वाली मुख्य वायु को प्राण कहा जाता है. जो वायु जो मलाशय से होकर निकलती है, उसे अपान कहा जाता है. वह वायु जो पेट के भीतर खाद्य पदार्थों को समायोजित करती है और जिसे कभी-कभी पेट फूलने जैसा लगता है उसे समान कहते हैं. जो वायु गले से होकर गुजरती है और जिसके रुकने से घुटन होती है, उसे उडान वायु कहते हैं. और संपूर्ण वायु जो पूरे शरीर में भ्रमण करती है, उसे व्यान वायु कहा जाता है. इन पाँच वायुओं से सूक्ष्मतर, अन्य भी होती हैं. जो आँखों, मुँह आदि को खोलने में सुविधा प्रदान करती है, वह नाग वायु कहलाती है. जिस वायु से भूख बढ़ती है उसे क्रकर वायु कहते हैं. संकुचन में सहायता करने वाली वायु को कूर्म वायु कहते हैं. वह वायु जो मुंह को चौड़ा करके (जम्हाई में) खोल कर आराम पाने में सहायता करती है, वह देवदत्त वायु कहलाती है, निर्वाह में सहायता करने वाली वायु को धनंजय वायु कहते हैं. ये सभी वायु हृदय के केंद्र से उत्पन्न होती हैं, जो केवल एक है. यह केंद्रीय ऊर्जा भगवान की उच्चतर ऊर्जा है, जो शरीर की आत्मा के साथ हृदय के भीतर स्थित होती है, और भगवान के मार्गदर्शन में कार्य करती है. इसे भगवद-गीता (15.15) में इस प्रकार समझाया गया है: सर्वस्य चहम् हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानम् अपोहनम् च वेदैस च सर्वैर अहम् एव वेद्यो वेदांत-कृद वेद-विद एव चहम् संपूर्ण केंद्रीय बल भगवान द्वारा हृदय से उत्पन्न किया जाता है, जो वहाँ स्थित हैं और जो बद्ध आत्मा को स्मरण और विस्मरण में सहायता करते हैं. बद्ध स्थिति आत्मा के भगवान के प्रति अधीनता के उसके संबंध की विस्मृति के कारण होती है. वह जो भगवान को निरंतर भूलता रहना चाहता है भगवान उनके विस्मरण में उसकी सहायता जन्म-जन्मांतरों तक करते हैं, लेकिन जो भगवान के भक्त के साथ संगति के सामर्थ्य से उनका स्मरण रखता है, उन्हें भगवान का स्मरण और भी अधिक करने के लिए सहायता मिलती है. इस प्रकार बद्ध आत्मा अंततः वापस घर, परम भगवान तक लौट सकती है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” तीसरा सर्ग, अध्याय 06 – पाठ 09

एक विशुद्ध भक्त कभी भी भौतिक सांसारिक प्रसंगों में नहीं उलझता है.

कोई प्रश्न कर सकता है कि व्यक्ति कैसे हमेशा भगवान का विचार उनके नाम, प्रसिद्धि, गुण इत्यादि के संदर्भ में कर सकता है, यदि वह पारिवारिक प्रसंगों के विचारों द्वारा लज्जित हो. भौतिक संसार में हर व्यक्ति इन विचारों से भरा होता है कि परिवार का पालन कैसे करें, अपनी संपत्ति की रक्षा कैसे करें, कैसे मित्रों और संबंधियों से तारतम्य रख सकें, इत्यादि. इस प्रकार वह हमेशा डर और शोक में रहता है, यथास्थिति बनाए रखने का प्रयास कर रहा होता है. इस प्रश्न के उत्तर में, ब्रम्हा द्वारा कहा गया यह श्लोक बहुत उचित है. भगवान का एक विशुद्ध भक्त कभी भी स्वयं को अपने घर का स्वामी नहीं समझता. वह सभी चीज़ों को भगवान के परम नियंत्रण में समर्पित कर देता है, और इस प्रकार उसे अपने परिवार के पालन या परिवार के हितों की रक्षा करने का कोई भय नहीं होता. उसके समर्पण के कारण, उसे संपत्ति के लिए अब कोई मोह नहीं रहता. भले ही संपत्ति के लिए आकर्षण हो भी, तो वह इंद्रिय भोग के लिए नहीं होता, बल्कि भगवान की सेवा के लिए होता है. एक विशुद्ध भक्त, किसी सामान्य व्यक्ति के समान संपत्ति संचय के प्रति आकर्षित हो सकता है, लेकिन अंतर यह है कि एक भक्त भगवान की सेवा के लिए धन संचय करता है, जबकि सामान्य व्यक्ति अपने इंद्रिय भोग के लिए संपत्ति संचय करता है. इस प्रकार एक भक्त द्वारा धन का अधिग्रहण चिंताओं का स्रोत नहीं है, जैसा कि एक सांसारिक व्यक्ति के लिए होता है. और चूंकि एक विशुद्ध भक्त सभी कुछ को भगवान की सेवा करने के अर्थ में स्वीकार करता है, धन अधिग्रहण के विषैले दाँत निकल जाते हैं. यदि किसी साँप के विष निकाल दिया जाए और वह किसी व्यक्ति को काट ले, तो उसका कोई भी प्राणघातक प्रभाव नहीं होगा. एक विशुद्ध भक्त कभी भी भौतिक सांसारिक प्रसंगों में नहीं उलझता भले ही वह सामान्य मानव के समान संसार में ही रहा आए.

स्रोत: अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 9- पाठ 6

अन्य ग्रहों पर जीवन की अवधि

ब्रह्मा के दिन के अंत में होने वाले ब्रह्मांड का आंशिक विघटन सभी ग्रह प्रणालियों को प्रभावित नहीं करता है. ऋषि सनक और भृग जैसे उच्च ज्ञानी जीवों के ग्रह सहस्राब्दियों के विघटन से प्रभावित नहीं होते हैं. सभी ग्रह भिन्न प्रकार के हैं, और प्रत्येक का नियंत्रण एक भिन्न काल-चक्र, या शाश्वत समय के क्रम द्वारा किया जाता है. पृथ्वी ग्रह का समय अन्य, अधिक उच्च ग्रहों पर आरोपित नहीं होता है.

चार सहस्त्राब्दियाँ (युग) के नाम सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि युग हैं. इन सभी के संयुक्त वर्षों की कुल संख्या देवताओं के बारह हज़ार वर्षों के बराबर है. देवताओं के वर्ष मानव जाति के 360 वर्षों के बराबर होते हैं. जैसा कि बाद के छंदों में स्पष्ट होगा, युग-संंध्या कहे जाने वाले संक्रमण काल सहित, देवताओं के 12,000 वर्षों में, उक्त चार सहस्त्राब्दियों का योग शामिल होता है. इस प्रकार उक्त चार सहस्राब्दियों का कुल योग 4,320,000 वर्ष है. सत्य सहस्त्राब्दि की अवधि देवताओं के वर्षों के 4,800 वर्षों के बराबर होती है; त्रेता युग की अवधि 3,600 वर्ष होती है; द्वापर युग 2,400 वर्षों के बराबर होता है; और कलि-युग देवताओं के 1,200 वर्षों के बराबर होता है. उपर्युक्त अनुसार, देवताओँ का एक वर्ष मानव के 360 वर्षों के बराबर होता है. इसलिए सत्य-युग की अवधि 4,800 x 360, या 1,728,000 वर्षों की होती है. त्रेता-युग की अवधि 3,600 x 360, या 1,296,000 वर्ष है. द्वापर-युग की अवधि 2,400 x 360, या 864,000 वर्ष है. और अंतिम, कलियुग, 1,200 x 360, या 432,000 वर्ष का है.

प्रत्येक सहस्त्राब्दि के पहले और बाद के संक्रमण काल, जो पहले बताए गए अनुसार कुछ सौ वर्षों के होते हैं, अनुभवी खगोलविदों के अनुसार वे युग-संध्या, या दो सहस्त्राब्दियों की संधि कहलाते हैं. उन अवधियों में सब प्रकार की धार्मिक गतिविधियाँ की जाती हैं. सत्य सहस्राब्दी में, धार्मिक सिद्धांतों का पूर्ण निष्पादन प्रबल रहा. धीरे-धीरे, बाद के प्रत्येक युग में धर्म के सिद्धांत एक-एक करके घटते गए. दूसरे शब्दों में, वर्तमान में एक भाग धर्म है और तीन भाग अधर्म. इसलिए इस युग में लोग बहुत प्रसन्न नहीं हैं. तीन ग्रह प्रणालियों (स्वर्ग, मर्त्य और पाताल) के बाहर, एक सहस्त्र गुणा चार युगों में ब्रम्हा के ग्रह का एक दिन सम्मिलित होता है. इसके समान अवधि में ही ब्रम्हा की एक रात्रि होती है, जिसमें ब्रम्हांड के रचियता सोने चले जाते हैं. जब ब्रम्हा उनके रात्रि काल में सोने चले जाते हैं, तब ब्रम्हलोक के नीचे के तीनों ग्रह मण्डल विनाश के जल में डूब जाते हैं. अपनी सोई अवस्था में, ब्रम्हा गर्भोदकशायी विष्णु के बारे में स्वप्न देखते हैं और विनष्ट हुए अवकाश के क्षेत्र के पुनर्वासन के लिए भगवान से निर्देश लेते हैं.

ब्रम्हा की रात्रि के अंत के बाद, तीनों लोकों की रचना ब्रम्हा के दिन में फिर से आरंभ होती है, और वे एक के बाद एक चौदह मनुओं, या मानवजाति के पितृों के जीवन काल की अवधि तक अस्तित्व में बने रहते हैं. प्रत्येक मनु के जीवन के अंत में छोटे विघटन भी घटित होते हैं. मनु के जीवन काल में विष्णु पुराण में वर्णित चार सहस्राब्दियों के इकहत्तर समूह शामिल होते हैं. एक मनु के जीवन काल की अवधि देवताओं की गणना में लगभग 852,000 वर्ष होती है, या, मानवों की गणना में 306,720,000 वर्षों की होती है. प्रत्येक मनु के विघटन के बाद, अगला मनु अपने वंशजों के साथ आता है, जो विभिन्न ग्रहों पर शासन करते हैं; लेकिन सात प्रसिद्ध संत, और इंद्र जैसे देवता और गंधर्वों जैसे उनके अनुयायी, भी मनु के साथ-साथ प्रकट होते हैं. ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं, और उनमें से प्रत्येक के भिन्न-भिन्न वंशज होते हैं. सृष्टि में, ब्रह्मा दिवस के दौरान, तीन ग्रह प्रणालियां- स्वर्ग, मर्त्य और पाताल – घूमती हैं, और वहां के निवासी, जिनमें निचले स्तर के प्राणी, मानव, देवता और पिता शामिल होते हैं, अपनी गतिविधियों के फल के अनुसार प्रकट होते हैं और विलीन हो जाते हैं. मनु के प्रत्येक परिवर्तन में, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व अपनी आंतरिक शक्ति को प्रकट करके मनु और अन्य जैसे विभिन्न अवतारों का रूप लेता है. इस प्रकार वह खोज की शक्ति द्वारा ब्रह्मांड को बनाए रखता है. दिन के अंत में, तीनों संसारों का विघटन अंधकार के अवतार, रुद्र, से प्रभावित होता है, जिनका प्रतिनिधित्व अनंत काल की अग्नि करती है जो तीनों लोकों में व्याप्त है. इन तीनों लोकों को भुः, भुवः और स्वः (पाताल, मर्त्य और स्वर्ग) के नाम से जाना जाता है. असंख्य जीवित प्राणी उस विघटन में विलीन हो जाते हैं, जो सर्वोच्च भगवान की ऊर्जा के दृश्य के पटाक्षेप जैसा लगता है, और इस प्रकार सब कुछ शांत हो जाता है. ऐसा माना जाता है कि तीनों लोकों से सूर्य और चंद्रमा की चमक मिट जाती है, लेकिन स्वयं सूर्य और चंद्रमा नहीं मिटते. वे ब्रह्मांड के शेष भाग में दिखाई देते हैं, जो तीनों लोकों के क्षेत्र से परे है. विघटन वाला भाग सूर्यकिरणों या चंद्रमा की कांति से रहित होता है. वह सब अंधकारमय और जलप्लावित रहता है, और वहाँ अथक वायु प्रवाह बना रहता है. विघटन संकर्षण के मुख से निकलने वाली अग्नि के कारण घटित होता है, और इसलिए, नीचे तीनों लोकों में भभक रही अग्नि के ताप से व्याकुल होकर, भृगु जैसे महान ऋषि और महार्लोक के अन्य निवासी स्वयं को जनलोक में स्थानांतरित कर लेते हैं. एसा कहा जाता है कि संकर्षण के मुख से भभक रही अग्नि देवताओं के एक सौ वर्षों, या मानव के 36,000 वर्षों तक प्रज्ज्वल रहती है. फिर अगले 36,000 वर्षों तक मूसलाधार वर्षा होती है, जिसके साथ प्रचंड हवा और लहरें आती हैं, और सागर और महासागर उफनने लगते हैं. लोग इस सारे विऩाश को भूल जाते हैं और सभ्यता की भौतिक प्रगति में स्वयं को खुशहाल मानने लगते हैं. इसे ही माया कहा जाता है, “वह जो नहीं है.” समय के संदर्भ में प्रत्येक प्राणी विभिन्न ग्रहों में विभिन्न प्राणियों के लिए एक सौ वर्षों के लिए जीवित रहता है. जीवन के ये एक सौ वर्ष प्रत्येक प्रसंग में समान नहीं होते. एक सौ वर्षों की सबसे लंबी अवधि ब्रम्हा की होती है, लेकिन ब्रम्हा के बहुत लंबे जीवन के बावजूद, वह समय के साथ समाप्त हो जाता है. ब्रम्हा को भी अपनी मृत्यु से भय लगता है, और इसलिए वे स्वयं को मायावी शक्ति के चंगुल से छुड़ाने के लिए भगवान की आध्यात्मिक सेवा करते हैं. पशुओं को निश्चित ही उत्तरदायित्व का बोध नहीं होता, लेकिन मनुष्य भी, जो भगवान की आध्यात्मिक सेवा में रत हुए बिना अपने अमूल्य समय को गँवा कर, उत्तरदायित्व का बोध विकसित कर चुके हैं; वे आसन्न मृत्यु से डरे बिना प्रसन्न होकर जीते हैं. यह मानव समाज का पागलपन है. किसी विक्षिप्त के लिए जीवन में कोई उत्तरदायित्व नहीं होता. उसी प्रकार, कोई मनुष्य जो अपनी मृत्यु से पहले उत्तरदायित्व का बोध विकसित नहीं करता, वह उस विक्षिप्त मनुष्य से श्रेष्ठ नहीं है जो भविष्य की चिंता किए बिना प्रसन्न होकर भौतिक जीवन का आनंद लेने का प्रयास करता है. यह आवश्यक है कि स्वयं को आगामी जीवन के लिए तैयार करने हेतु प्रत्येक मनुष्य उत्तरदायी बने, भले ही उसका जीवन काल ब्रम्हांड के महानतम जीवित प्राणी ब्रम्हा जितना लंबा हो.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2012 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवत” तृतीय सर्ग, अध्याय 11 – पाठ 16-33.

भगवान के व्यक्तिगत रूप का बोध योग का उच्चतम आदर्श चरण है.

भगवान के व्यक्तिगत रूप का बोध योग का उच्चतम आदर्श चरण है. भगवद-गीता के छठे अध्याय में, जहाँ योग अभ्यास का वर्णन किया जाता है, भगवान के व्यक्तिगत रूप के इस बोध को योग की पूर्णता कहा जाता है. प्रणाली के बैठने के आसन और अन्य नियामक सिद्धांतों का अभ्यास करने के बाद, एक अंत में समाधि के चरण तक पहुँच जाता है – परम में अवशोषण. समाधि अवस्था में भगवान के परम व्यक्तित्व को उनके आंशिक रूप में परमात्मा के रूप में या जैसे वे हैं, देखा जा सकता है, पतंजलि-सूत्र जैसे आधिकारिक योग शास्त्रों में समाधि का वर्णन पारलौकिक सुख के रूप में किया गया है. पतंजलि की पुस्तकों में वर्णित योग प्रणाली प्रामाणिक है, और आधुनिक तथाकथित योगी जिन्होंने विशेषज्ञों से परामर्श किए बिना स्वयं अपनी प्रणाली बना ली है, वे हास्यास्पद हैं. पतंजलि योग प्रणाली को अष्टांग-योग कहा जाता है. कभी-कभी अवैयक्तिकतावादी पतंजलि योग प्रणाली को प्रदूषित करते हैं क्योंकि वे अद्वैतवादी होते हैं. पतंजलि वर्णन करते हैं कि आत्मा को परमात्मा से मिलने पर पारलौकिक सुख मिलता है. यदि परमात्मा और मानव के अस्तित्व को स्वीकार किया जाता है, तो अद्वैतवाद का अवैयक्तिक सिद्धांत शून्य हो जाता है. इसलिए कुछ अवैयक्तिकतावीदी और शून्य दार्शनिक पतंजलि प्रणाली को अपने तरीके से तोड़ते-मरोड़ते हैं और संपूर्ण योग प्रक्रिया को प्रदूषित करते हैं. पतंजलि के अनुसार, जब कोई व्यक्ति अपनी वास्तविक, पारलौकिक स्थिति को प्राप्त करता है, तो वह सभी भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाता है, और उस अवस्था की प्राप्ति के बोध को आध्यात्मिक शक्ति कहा जाता है. भौतिक गतिविधियों में व्यक्ति भौतिक प्रकृति की रीतयों में संलग्न हो जाता है. ऐसे लोगों की आकांक्षाएं (1) धार्मिक बनना, (2) आर्थिक रूप से समृद्ध होना, (3) इंद्रियों को तृप्त करने में सक्षम होना और, अंतिम (4) परम के साथ एकाकार होना होती है. अद्वैतवादियों के अनुसार, जब योगी परम के साथ एकाकार हो जाता है और अपना व्यक्तिगत अस्तित्व खो देता है, तो वह उच्चतम अवस्था को प्राप्त करता है, जिसे कैवल्य कहा जाता है. परंतु वास्तव में, भगवान के परम व्यक्तित्व के बोध का चरण कैवल्य होता है. समझ का यह ऐक्य कि परम भगवान संपूर्ण आध्यात्मिक हैं और संपूर्ण आध्यात्मिक बोध में व्यक्ति समझ सकता है कि वे –भगवान का परम व्यक्तित्व– क्या हैं, उसे कैवल्य कहते हैं, या, पतंजलि की भाषा में, आध्यात्मिक शक्ति का बोध. उनका प्रस्ताव यह है कि जब कोई भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाता है और आत्म और परमात्मा के आध्यात्मिक बोध में स्थिर हो जाता है, तो उसे चित्-शक्ति कहते हैं. पूर्ण आध्यात्मिक बोध में आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति होती है, और उस आनंद को भगवद गीता में सर्वोच्च आनंद के रूप में वर्णित किया गया है, जो भौतिक इंद्रियों से परे है. भाव-समाधि का वर्णन दो प्रकार से किया जाता है, संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात, या मानसिक अटकलें और आत्म-साक्षात्कार. समाधि या असंप्रज्ञात में, व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक इंद्रियों द्वारा, भगवान के आध्यात्मिक स्वरूप को अनुभव कर सकता है. यही आध्यात्मिक बोध का परम लक्ष्य है. पतंजलि के अनुसार, जब कोई भगवान के परम रूप के निरंतर बोध में स्थिर हो जाता है, तो व्यक्ति को संपूर्ण अवस्था प्राप्त हो जाती है, जैसा कि कर्दम मुनि ने अर्जित की थी. जब तक कोई पूर्णता के इस चरण को प्राप्त नहीं करता है – योग प्रणाली के प्रारंभिक चरणों की पूर्णता से परे – तब तक परम बोध नहीं होता. अष्टांग-योग प्रणाली में आठ सिद्धियाँ हैं. जो उन्हें अर्जित कर लेता है वह सबसे हल्के से हल्का और सबसे महान से महान बन सकता है, और वह जो भी चाहे वह प्राप्त कर सकता है. लेकिन योग में ऐसी भौतिक सफलता हासिल करना भी पूर्णता या अंतिम लक्ष्य नहीं है. अंतिम लक्ष्य यहाँ वर्णित है: कर्दम मुनि ने अपने अनन्त रूप में भगवान के परम व्यक्तित्व को देखा. भक्ति सेवा व्यक्तिगत आत्मा और परम आत्मा या कृष्ण और कृष्ण के भक्तों के संबंध से प्रारंभ होती है, और जब कोई इसे अर्जित कर लेता है तो नीचे गिरने का कोई प्रश्न ही नहीं होता है. यदि, योग प्रणाली के माध्यम से, कोई व्यक्ति भगवान के परम व्यक्तित्व को देख सकने की अवस्था को प्राप्त करना चाहता है, लेकिन उसके स्थान पर किंचित भौतिक शक्ति पा जाने के प्रति आकर्षित होता है, तो फिर उसे आगे बढ़ने से रोक लिया जाता है. भौतिक भोग का आध्यात्मिक सुख के पारलौकिक बोध से कोई लेना-देना नहीं है, जैसा कि छद्म योगियों द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है. भक्ति-योग के वास्तविक भक्त जीवन की केवल उन भौतिक आवश्यकताओं को स्वीकार करते हैं, जो शरीर और आत्मा को एक साथ बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक हों; वे सभी अतिरंजित भौतिक इंद्रिय तुष्टि से परहेज करते हैं. वे सभी प्रकार के कष्ट से गुजरने के लिए तैयार होते हैं, बशर्ते वे भगवान के परम व्यक्तित्व के अनुभव की प्राप्ति में प्रगति कर सकें.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” तीसरा सर्ग, अध्याय 12 – पाठ 21

ब्रम्हांड में आबादी कैसे हुई?

“ब्रम्हा का पद ब्रम्हांड में सर्वोच्च उत्तरदायित्व का पद है, और यह पद ब्रम्हांड के सबसे योग्य व्यक्तित्व को सौंपा जाता है. कभी-कभी भगवान के परम व्यक्तित्व को ही ब्रम्हा बनना पड़ता है जब इस पद को धारण करने वाला कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं होता. भौतिक संसार में, ब्रम्हा भगवान के परम व्यक्तित्व के पूर्ण प्रतिनिधि हैं, और अतींद्रिय ध्वनि, प्रणव, उनसे ही आती है. इसलिए उन्हें विविध ऊर्जाओं के साथ निवेशित किया जाता है, जहाँ से इंद्र, चंद्र और वरुण जैसे सभी देवता प्रकट होते हैं. उनके अनुभवातीत मूल्य को कम नहीं किया जाना चाहिए, भले ही उन्होंने स्वयं अपनी पुत्री का भोग करने की प्रवृत्ति प्रदर्शित की हो. ब्रम्हा द्वारा ऐसी प्रवृत्ति प्रदर्शित करने का कोई उद्देश्य है, और उन्हें एक सामान्य जीव की तरह दोष नहीं दिया जाना चाहिए.

बलवान इंद्रिय-ग्रामो विध्वंसम् अपि कर्षति (भागवतम् 9.19.17).

ऐसा कहा गया है कि इंद्रियाँ इतनी उग्र और बलवान होती हैं कि वे सबसे समझदार और विद्वान व्यक्ति को भी भटका सकती हैं. इसलिए समझाया जाता है कि अपनी माँ, बहन या बेटी तक के साथ भी अकेला नहीं रहना चाहिए. विध्वंसम् अपि कर्षति का अर्थ है कि सबसे विद्वान लोग भी भोग की कामना के वश में आ जाते हैं. मैत्रेय ने ब्रह्मा की ओर से इस विसंगति को बताने में संकोच किया, जो अपनी ही पुत्री के प्रति कामाकर्षित थे, लेकिन फिर भी उन्होंने इसका उल्लेख किया है क्योंकि कभी-कभी ऐसा होता है, और स्वयं ब्रम्हा इसके जीवंत उदाहरण हैं, हालाँकि वे आदिकालीन जीव हैं और समस्त ब्रम्हांड में सबसे ज्ञानवान हैं. यदि ब्रम्हा काम के वश में आ सकते हैं, तो फिर दूसरों का क्या, जो कई सांसारिक दुर्बलताओं की ओर उन्मुख होते हैं? ब्रम्हा की इस असाधारण अमरता का होना किसी विशेष कल्प में सुना गया था. लेकिन यह उस कल्प में नहीं हो सकता था जिसमें ब्रह्मा ने भगवान से सीधे श्रीमद-भागवतम के चार आवश्यक श्लोकों को सुना क्योंकि, भागवतम् पर शिक्षा देने के बाद, भगवान ने ब्रह्मा को वर दिया, कि वे किसी भी कल्प में कभी भी किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं होंगे. इससे पता लगता है कि श्रीमद्-भागवतम् सुनने से पहले हो सकता है कि वे ऐसी विषयासक्ति के अधीन हो गये होंगे, लेकिन स्वयं भगवान से श्रीमद्-भागवतम् को सुनने के बाद, ऐसी किसी भी विफलता की कोई संभावना नहीं थी.

हालांकि, इस प्रसंग का गंभीर संज्ञान लेना चाहिए. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और विपरीत लिंग के साथ उसका अप्रतिबंधित मेल-जोल पतन की ओर ले जाता है. पुरुष और महिलाओं की ऐसी सामाजिक स्वतंत्रता, विशेषकर युवाओं के बीच, निश्चित ही आध्यात्मिक प्रगति के पथ में बड़ी रुकावट है. भौतिक बंधन केवल यौन बंधन के कारण होता है, और इसलिए स्त्री और पुरुष का अप्रतिबंधित मेल-जोल निश्चित रूप से एक महान बाधा है. मैत्रेय ने ब्रम्हा की ओर से यह उदाहरण हमारा ध्यान इस महान खतरे की ओर ले जाने के लिए ही किया है.

मरीचि जैसे ऋषि गणों द्वारा अपने महान पिताओं के कार्यकलापों का विरोध करना बिलकुल अनुचित नहीं था. वे अच्छी तरह से जानते थे कि भले ही उनके पिता ने गलती की थी, ऐसा होने के पीछे अवश्य कोई बड़ा उद्देश्य होगा, अन्यथा ऐसे महान व्यक्ति ऐसी गलती कभी नहीं करते. ऐसा संभव है कि ब्रम्हा अपने अधीनों को स्त्रियों से उनके व्यवहार में मानवीय दुर्बलताओं के प्रति सचेत करना चाहते हों. यह उन व्यक्तियों के लिए बहुत हानिकारक होता है जो आत्म-ज्ञान के पथ पर हैं. इसलिए, ब्रम्हा जैसे महान व्यक्तित्व को उनकी त्रुटि होने पर भी उपेक्षित नहीं करना चाहिए, ना ही मरीचि के नेतृत्व में महान ऋषियों ने उनके असामान्य व्यवहार के लिए कोई असम्मान किया.

ब्रम्हा का पद ब्रम्हांड में सर्वोच्च है, और लगता है कि हम जिस ब्रम्हांड में हैं उसके अतिरिक्त भी कई ब्रम्हा और कई ब्रम्हांड हैं. जो भी इस पद की पूर्ति करता है वह अवश्य ही अपने व्यवहार में आदर्श होगा, क्योंकि ब्रम्हा समस्त जीवों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. ब्रम्हा, वह जीव जो सबसे पवित्र और आध्यात्मिक रूप से उन्नत हैं, को भगवान के व्यक्तित्व के समकक्ष एक पद सौंपा गया है. संभोग के लिए वासना इतनी प्रबल है कि यहाँ ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रह्मा को मरीचि जैसे अपने बड़े पुत्रों द्वारा अनुरोध किए जाने के बावजूद अपने दृढ़ निश्चय से विमुख नहीं किया जा सकता था. इसलिए, महान पुत्रों ने ब्रम्हा की सद्बुद्धि के लिए परम भगवान की प्रार्थना प्रारंभ कर दी. यह केवल परमपिता परमात्मा की कृपा ही है कि किसी को वासनायुक्त भौतिक इच्छाओं के प्रलोभन से बचाया जा सके. प्रभु उन भक्तों को सुरक्षा प्रदान करते हैं जो हमेशा उनकी पारलौकिक प्रेममयी सेवा में लगे रहते हैं, और उनकी असीम दया के कारण वे दुर्घटनावश हुए भक्त के पतन को क्षमा कर देते हैं. इसलिए, मरीचि जैसे ऋषियों ने प्रभु की दया के लिए प्रार्थना की, और उनकी प्रार्थना फलदायी थी. पापपूर्ण कार्यों की भरपाई करने का सबसे अच्छा तरीका है, एक बार में अपना शरीर छोड़ देना, और समस्त जीवों के प्रमुख ब्रह्मा ने इसे अपने व्यक्तिगत उदाहरण से दिखाया. ब्रम्हा के जीवन की असाधारण अवधि है, लेकिन उन्हें अपने भयंकर पाप के कारण अपनी काया छोड़ना पड़ी, भले ही उन्होंने वास्तव में ऐसा किए बिना केवल अपने मन में इसका विचार किया था.

यह उन जीवित प्राणियों के लिए एक शिक्षा है, जहाँ बताया गया है कि अबाधित यौन जीवन में लिप्त रहना कितना पापपूर्ण है. यहां तक कि घृणित यौन जीवन के बारे में सोचना भी पापपूर्ण है, और इस तरह के कृत्यों की भरपाई के लिए, व्यक्ति को अपना शरीर त्यागना होगा. दूसरे शब्दों में, व्यक्ति के जीवन की अवधि, कृपा, एश्वर्य, इत्यादि पापपूर्ण कृत्यों से कम हो जाती है, और पाप कृत्यों का सबसे हानिकारक प्रकार अप्रतिबंधित यौन कर्म है. अज्ञान पापमय जीवन का कारण है, या पापमय जीवन सकल अज्ञानता का कारण है. अज्ञान की विशेषता अंधकार या कोहरा है. अंधेरा या कोहरा अभी भी पूरे ब्रह्मांड को समेटे हुए है, और सूर्य ही एकमात्र प्रतिरोधी सिद्धांत है. जो भगवान का आश्रय लेता है, वह सदा प्रकाश में रहता है, उसे कोहरे या अज्ञान के अंधकार में विलीन होने का कोई भय नहीं है.

जैसे अग्नि प्रदूषित हुए बिना प्रत्येक वस्तु का उपभोग कर सकती है, उसी तरह, भगवान की कृपा से, ब्रम्हा के महान गुणों की अग्नि ने अपनी ही पुत्री के साथ यौन संबंध की उनकी इच्छा को समाप्त कर दिया. वेद समस्त ज्ञान के स्रोत हैं, और उन्हें पहली बार भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की दया से ब्रह्मा के सामने प्रकट किया गया था, जबकि ब्रह्मा भौतिक संसार की पुनर्रचना के बारे में विचार कर रहे थे. भगवान के प्रति अपनी आध्यात्मिक सेवा के प्रभाव से ब्रह्मा शक्तिशाली हैं, और यदि वह संयोग से भक्ति सेवा के महान मार्ग से विचलित हो जाए तो भगवान हमेशा अपने भक्त को क्षमा करने के लिए तैयार रहते हैं. श्रीमद्-भागवतम् (11.5.42) इसकी पुष्टि इस प्रकार करता है:

स्व-पाद-मूलम भजतः प्रियस्य त्यक्तवन्य-भावस्य हरिः पारेषः
विक्रम याच चोत्पत्तितम कथन-चिद्धुनोति सर्वम् हृदि सन्विष्टः

“कोई भी व्यक्ति जो भगवान के चरण कमलो में, प्रभु की पारलौकिक प्रेममयी सेवा में सौ प्रतिशत लगा हुआ है, वह भगवान् हरि के व्यक्तित्व को बहुत प्रिय है, और भक्त के हृदय में स्थित होने के कारण, भगवान, संयोगवश किए गए सभी प्रकार के पापों को क्षमा कर देते हैं.” कभी भी ऐसी आशा नहीं की गई थी कि ब्रह्मा जैसा महान व्यक्तित्व कभी अपनी बेटी के साथ यौन-संबंध के बारे में विचार कर सकता है. ब्रम्हा द्वारा दर्शाया गया उदाहरण केवल यह बताता है कि भौतिक प्रकृति का बल इतना अधिक होता है कि वह ब्रम्हा सहित किसी पर भी प्रभाव डाल सकता है. ब्रम्हा को भगवान की दया से थोड़े दंड के साथ क्षमा कर दिया गया, लेकिन भगवान की कृपा से महान ब्रम्हा के रूप में उनकी प्रतिष्ठा की क्षति नहीं हुई.

उनके पिछले शरीर में, जो अलौकिक थी, यौन जीवन के प्रति आकर्षण पर प्रतिबंध था, और इसलिए ब्रम्हा को यौन कर्म से जुड़ने के लिए एक अन्य शरीर को स्वीकारना पड़ा. इस प्रकार उन्होंने खुद को सृजन के विष्य में व्यस्त कर लिया. उनका पिछला शरीर कोहरे में परिवर्तित हो गया.

ओ कुरुओं के पुत्र, जब ब्रम्हा ने देखा कि महान क्षमता वाले ऋषियों की उपस्थिति के बावजूद जनसंख्या में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हो रही थी, तो वे जनसंख्या बढ़ाने की विधि के बारे में गंभीरता से विचार करने लगे.

ब्रम्हा ने विचार किया: आह, यह आश्चर्यजनक है कि मेरे चारों ओर व्याप्त होने के बावजूद, समस्त ब्रह्मांड में अभी भी जनसंख्या अपर्याप्त है. इस दुर्भाग्य का कोई और कारण नहीं है बल्कि नियति है.जब वे इस प्रकार चिंतन में लीन थे और अलौकिक शक्ति का अवलोकन कर रहे थे, उनके शरीर से दो अन्य रूप उत्पन्न हुए. उन्हें अभी भी ब्रह्मा के शरीर के रूप में माना जाता है. ब्रम्हा के शरीर से दो शरीर बाहर आए. एक शरीर में मूँछें थीं और दूसरे शरीर में स्तन थे. उनकी उत्पत्ति के स्रोत को कोई नहीं समझा सकता, और इसीलिए आज तक भी उन्हें कायम्, या ब्रम्हा के शरीर, के रूप में जाना जाता है, उनके पुत्र या पुत्री के रूप में किसी भी संकेत के बिना.

नये अलग हुए दोनों शरीरों ने यौन संबंध बनाया. जिनमें से, जिसका रूप पुरुष था मनु कहलाए जिनका नाम स्वयंभुव था, और स्त्री सतरूपा, महात्मा मनु की रानी के रूप में जानी गईं. तत्पश्चात, भोग रत होकर, उन्होंने धीरे-धीरे एक के बाद एक पीढ़ियों की संख्या में वृद्धि की. ओ भरत पुत्र, कालांतर में मनु से सतरूपा को पाँच संतानें हुईं–दो पुत्र, प्रियव्रत और उत्तानपाद, और तीन पुत्रियाँ, अकुति, देवाहुति और प्रसूति. पिता, मनु ने अपनी पहली पुत्री, अकुति को ऋषि रुचि को दे दिया, बीच वाली पुत्री, देवाहुति को, ऋषि कर्दम को, और सबसे छोटी, प्रसूति को दक्ष को दे दिया. उनके माध्यम से, सारे संसार में जनसंख्या उत्पन्न हुई.

इसलिए, ब्रम्हा को सभी प्राणियों का पितामह के रूप में जाना जाता है, और ब्रम्हा के पिता होने के कारण भगवान के व्यक्तित्व को, सभी प्राणियों के प्रपितामह के रूप में जाना जाता है. इसकी पुष्टि भागवद्-गीता (11.39) में निम्न रूप से की गई है:

वायुर् यमो अग्निर् वरुणः सशंकाः प्रजापतिस् त्वम प्रपितामहश्च
नमो नमस ते स्तु सहर्ष-कृत्वः पुनश्च भुयोपि नमो नमस्ते

“आप ही वायु के स्वामी, परण न्याय यम, अग्नि, और वर्षा के स्वामी हैं. आप ही चंद्र हैं और आप प्रपितामह हैं. इसलिए मैं आपको बार-बार सम्मानजनक प्रणाम प्रस्तुत करता हूं.”

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), श्रीमद् भागवतम्, तीसरा सर्ग, अध्याय 12- पाठ 28 से 30, 32 से 34, 48 से 57.

मानव एक सामाजिक प्राणी है और रूपवान लिंग से उसका अप्रतिबंधित मेलजोल पतन की ओर ले जाता है

बलवान इंद्रिय-ग्रामो विध्वंसम् अपि कर्षति (भगी. 9.19.17). कहा जाता है कि इंद्रियां इतनी मतवाली और प्रबल होती हैं कि वे सबसे समझदार और विद्वान व्यक्ति को भी भटका सकती हैं. इसलिए यह सलाह दी जाती है कि किसी भी व्यक्ति को अपनी माँ, बहन या बेटी के साथ भी अकेले नहीं रहना चाहिए. विध्वंसम् अपि कर्षति का अर्थ है कि सबसे ज्ञानी व्यक्ति भी कामुक इच्छाओं के वशीभूत हो सकते हैं. मैत्रेय ने ब्रह्मा की ओर से इस विसंगति को बताने में संकोच किया, जो अपनी ही पुत्री पर यौन आसक्त थे, लेकिन फिर भी उन्होंने इसका उल्लेख किया क्योंकि कभी-कभी ऐसा होता है, और स्वयं ब्रह्मा जीवंत उदाहरण है, हालांकि वे आदिकालीन प्राणी हैं और पूरे ब्रम्हांड में सबसे ज्ञानी हैं. यदि स्वयं ब्रम्हा काम वासना के वशीभूत हो सकते हैं, तो अन्य का तो कहना ही क्या, जो इतने सारे सांसारिक संकटों से ग्रस्त हैं? ब्रम्हा की यह असाधारण अमरता किसी विशिष्ट कल्प में घटित मानी जाती है, किंतु ऐसा उस कल्प में नहीं हो सकता होगा जिसमें ब्रम्हा को भागवतम् पर शिक्षा देने के बाद स्वयं भगवान ने श्रीमद् भागवतम् के चार आवश्यक श्लोक कहे थे, और उन्हें वर दिया था कि वे किसी भी कल्प में आसक्ति के वशीभूत नहीं होंगे. यह इंगित करता है कि श्रीमद-भागवतम् का श्रवण करने से पहले ऐसा संभव है कि वे इस तरह की कामुकता का शिकार हो गए होंगे, लेकिन श्रीमद-भागवतम् को सीधे भगवान से सुन लेने के बाद, ऐसी असफलताओं की संभावना नहीं थी.

हालाँकि, व्यक्ति को ऐसी घटना का गंभीर संज्ञान लेना चाहिए. मानव सामाजिक प्राणी है, और रूपवान लिंग से उसका अप्रतिबंधित मेलजोल पतन की ओर ले जाता है. पुरुष और स्त्रियों की सामाजिक स्वतंत्रता, विशेष रूप से युवा वर्ग के बीच, निश्चित रूप से आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग में एक बड़ी बाधा है. भौतिक बंधन केवल यौन दासता के कारण होता है, और इसलिए स्त्री और पुरुष का अप्रतिबंधित मेलजोल निश्चित रूप से एक महान बाधा है. मैत्रेय ने ब्रह्मा के संदर्भ में यह उदाहरण देते हुए कहा कि यह बहुत बड़ा खतरा है.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), "श्रीमद् भागवतम्", तृतीय सर्ग, अध्याय 12 - पाठ 28

यदि कोई भक्ति सेवा में रत हो, तो हो सकता है उसे वर्णाश्रम-धर्म की प्रणाली से नहीं गुज़रना होगा.

ब्रम्हा द्वारा भौतिक रचना का उद्देश्य यहाँ स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया है. प्रत्येक मानव को भगवान के परम व्यक्तित्व की भक्ति सेवा में त्याग के उद्देश्य के लिए अपनी पत्नी के गर्भ में अच्छे बच्चों को पाना चाहिए. विष्णु पुराण (3.8.9) में यह कहा गया है: वर्णाश्रमचरवत पुरुषेण परः पुमन् विष्णुर् अराध्यते पंथः नन्यात् तत-तोष-कारणम् “व्यक्ति भगवान के परम व्यक्तित्व, विष्णु की पूजा, वर्ण और आश्रम के सिद्धांतों के उचित निष्पादन द्वारा कर सकता है. वर्णाश्रम प्रणाली के सिद्धांतों के निष्पादन द्वारा भगवान को संतुष्ट करने का कोई विकल्प नहीं है.” विष्णु की पूजा करना मानव जीवन का परम लक्ष्य है. वे जो वैवाहिक जीवन की अनुमति इंद्रिय सुख के लिए लेते हैं उन्हें भगवान के परम व्यक्तित्व, विष्णु को संतुष्ट करने का उत्तरदायित्व भी लेना चाहिए, और पहला सोपान वर्णाश्रम-धर्म प्रणाली है. वर्णाश्रम-धर्म विष्णु की पूजा में प्रगति करने के लिए व्यवस्थित संस्था है. यद्यपि, यदि कोई भगवान के परम व्यक्तित्व के प्रति भक्ति सेवा की प्रक्रिया में सीधे रत हो जाता है, तो हो सकता है कि वर्णाश्रम-धर्म की अनुशासन प्रणाली को भोगना आवश्यक न हो.

स्रोत: अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 13- पाठ 11

मनु-संहिता समस्त मानव समाज के लिए नियमों की पुस्तक है.

पूरी प्रशासकीय प्रणाली की व्यवस्था वापस घर, परम भगवान तक जाने के उद्धेश्य के लिए की गई है. ब्रह्मा परम भगवान के व्यक्तित्व के प्रतिनिधि हैं, और मनु ब्रह्मा के प्रतिनिधि हैं. इसी प्रकार ब्रह्मांड के विभिन्न ग्रहों पर अन्य राजा मनु के प्रतिनिधि हैं. समस्त मानव समाज के लिए मनु-संहिता नियम पुस्तिका है, जो समस्त कर्मों को भगवान की आध्यात्मिक सेवा की ओर अग्रसर करती है. इसलिए, राजाओं को भी जानना चाहिए कि प्रशासन में उनकी जिम्मेदारी केवल नागरिकों से कर वसूलना नहीं बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर यह देखना है कि उसके अधीन नागरिक विष्णु-उपासना में शिक्षित हो रहे हैं. सभी को विष्णु उपासना में शिक्षित होना चाहिए और हृषिकेश, इंद्रियों के स्वामी की आध्यात्मिक सेवा में रत होना चाहिए. बाध्य आत्माओं का उद्देश्य अपनी भौतिक इंद्रियों की संतुष्टि नहीं बल्कि परम भगवान के व्यक्तित्व, हृषिकेश की इंद्रियों को संतुष्ट करना होता है. समस्त प्रशासकीय व्यवस्था का यही उद्देश्य है. जो भी ब्रह्मा के संस्करण का यह रहस्य जानता है, वह प्रशासन का संपूर्ण प्रमुख होता है. जो यह नहीं जानता वह बस नाम मात्र का प्रशासक है. नागरिकों को भगवान की आध्यात्मिक सेवा में प्रशिक्षित करके, राज्य का प्रमुख अपने कर्तव्यों में मुक्त हो सकता है; अन्यथा वह उसे सौंपे गए कर्तव्यों में असफल हो जाएगा और इस प्रकार सर्वोच्च अधिकारी द्वारा दंडनीय होगा. प्रशासनिक कर्तव्य के निर्वहन में कोई दूसरा विकल्प नहीं है.

अभय भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 13 – पाठ 12

भगवान किसी भी जीव की भूमिका पूर्णता से निभा सकते हैं.

हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि यद्यपि किसी वराह का शरीर भौतिक होता है, भगवान का वराह रूप भौतिक रूप से दूषित नहीं था. पृथ्वी के किसी वराह के लिए सत्यलोक से प्रारंभ होकर आकाश तक फैला महा-आकार लेना संभव नहीं था. उनका शरीर सभी परिस्थितियों में हमेशा पारलौकिक होता है; इसलिए, वराह का रूप लेना उनकी केवल लीला है. उनका शरीर समस्त वेद, या पारलौकिक है. लेकिन चूँकि उन्होंने वराह का रूप लिया था, उन्होंने पृथ्वी पर सूंघ कर खोज शुरू की, ठीक एक वराह क जैसे. भगवान किसी भी जीव की भूमिका अचूक निभा सकते हैं. वराह का महाविशाल रूप सभी अ-भक्तों के लिए निश्चित ही डरावना था, लेकिन भगवान के विशुद्ध भक्तों के लिए वह बिलकुल डरावना नहीं था; इसके विपरीत, वे अपने भक्तों की ओर प्रसन्नता से देख रहे थे और उन सभी ने पारलौकिक प्रसन्नता का अनुभव किया.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी) “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 13- पाठ 28

भगवान शिव कौन हैं?

भगवान शिव एक सामान्य प्राणी नहीं हैं, न ही वे विष्णु या भगवान के परम व्यक्तित्व की श्रेणी में हैं. वे ब्रम्हा के स्तर तक किसी भी जीव से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं, फिर भी वे विष्णु के समान स्तर पर नहीं हैं. चूँकि वे भगवान विष्णु के लगभग समान हैं, शिव भूत, वर्तमान और भविष्य देख सकते हैं. उनकी एक आँख सूर्य के समान है, तो दूसरी चंद्रमा के समान, और उनकी तीसरी आँख, जो उनके भ्रूमध्य में है, वह अग्नि के समान है. वे अपने तीसरे नेत्र से अग्नि पैदा कर सकते हैं, और वे ब्रम्हा सहित, किसी भी शक्तिशाली जीव का विनाश कर सकते हैं, तब भी वे वैभवपूर्ण रूप से किसी महल इत्यादि में नहीं रहते, न ही उनके पास कोई भौतिक संपत्ति है, यद्यपि वे भौतिक संसार के स्वामी हैं. वे अधिकतर श्मशान में रहते हैं, जहाँ मृत शरीरों को जलाया जाता है, और श्मशान की उड़ने वाली भस्म उनका अंगवस्त्र है. वे भौतिक प्रदूषण से अछूते हैं. भगवान शिव किसी से भी नहीं जुड़े हैं, ना ही कोई उनका शत्रु है. चूँकि वे ब्रह्मांडीय व्यवस्था के तीन नियंत्रकों में से एक हैं, वे प्रत्येक के समकक्ष हैं. उनकी महानता अतुलनीय है क्योंकि वे भगवान के परम व्यक्तित्व के एक महान उपासक हैं. कहा जाता है कि भगवान के व्यक्तित्व के सभी भक्तों में भगवान शिव महानतम हैं. इसलिए उनके द्वारा छोड़ा गया भोजन अन्य भक्तों द्वारा महा-प्रसाद, या महान आध्यात्मिक भोजन के रूप में स्वीकार किया जाता है. भगवान को अर्पित किया गए भोजन में से बचने वाले भोजन को प्रसाद कहा जाता है, लेकिन जब वही प्रसाद भगवान शिव जैसे किसी महान भक्त द्वारा खाया जाता है, तो उसे महा-प्रसाद कहा जाता है. भगवान शिव इतने महान हैं कि वे भौतिक समृद्धि की चिंता नहीं करते जिसके प्रति हम सब इतने उत्सुक रहते हैं. पार्वती, जो शक्तिशाली भौतिक प्रकृति का प्रतीक रूप हैं, उनके संपूर्ण नियंत्रण में हैं, तब भी वे उनका उपयोग निवास योग्य घर बनाने के लिए भी नहीं करते. वे अनिकेतन ही रहना पसंद करते हैं, और उनकी महान पत्नी भी विनम्रतापूर्वक उनके साथ रहना स्वीकार करती हैं. सामान्यतः लोग देवी दुर्गा, भगवान शिव की पत्नी की पूजा, भौतिक समृद्धि के लिए करते है, लेकिन भगवान शिव उन्हें अपनी सेवा में बिना भौतिक इच्छाओं के रखते हैं. वे बस अपनी महान पत्नी को यही सुझाव देते हैं कि सभी प्रकार की पूजाओँ में विष्णु की पूजा ही उच्चतम है, और उससे भी उच्चतर एक महान भक्त या विष्णु से संबंधित किसी भी वस्तु की पूजा है. भगवान शिव के असभ्य, दानवी लक्षण कभी भी घिनौने नहीं होते क्योंकि वे भगवान के भक्तों को सिखाते हैं कि भौतिक भोग से अलग रहने का अभ्यास कैसे किया जाता है. उन्हें महादेव, या देवताओं में महानतम का जाता है, और भौतिक संसार में कोई भी उनके समकक्ष या उच्चतर नहीं है. वे भगवान विष्णु के लगभग समकक्ष हैं. यद्यपि उनका संबंध माया, दुर्गा से भी है, वे भौतिक प्रकृति के तीन अवस्थाओं के प्रतिक्रियात्मक स्तर से ऊपर हैं, और यद्यपि वे अज्ञान की अवस्था में दानवी गुणों के अधीन होते हैं, वे ऐसे संबंध से अप्रभावित रहते हैं. भगवान शिव कभी भी विलासितापूर्ण परिधान, माला, गहने या लेप स्वीकार नहीं करते. लेकिन जो लोग शरीर की सजावट के अभ्यस्त हैं, जिसे अंततः कुत्तों द्वारा खा लिया जाता है, बहुत विलासिता से उसे आत्म की तरह बनाए रखते हैं. ऐसे लोग भगवान शिव को नहीं समझते हैं, लेकिन वे उनके पास विलासितापूर्ण भौतिक सुविधाओं के लिए जाते हैं. भगवान शिव के दो प्रकार के भक्त होते हैं. एक वर्ग स्थूल भौतिकवादियों का है जो भगवान शिव से केवल शारीरिक सुविधाएँ चाहता है, और दूसरा वर्ग उनके साथ एक होना चाहता है. वे अधिकतर अवैयक्तिकतावादी होते हैं और शिवो’हम् “मैं शिव हूँ” या “मुक्ति के बाद मैं शिव के साथ एक हो जाउंगा” का जाप करना पसंद करते हैं. दूसरे शब्दों में, कर्मी और ज्ञानी सामान्यतः भगवान शिव के उपासक होते हैं, लेकिन वे जीवन में उनका प्रयोजन ठीक से नहीं जानते. कभी-कभी भगवान शिव के तथाकथित भक्त जहरीले मादक पदार्थों का उपयोग करके उनकी नकल करते हैं. भगवान शिव ने एक बार विष से भरा महासागर पी लिया था, और इस प्रकार उनका गला नीला पड़ गया था. नकलची शिव विष पान करके उनका अनुकरण करने का प्रयास करते हैं, और फिर बर्बाद हो जाते हैं. भगवान शिव का मूल प्रयोजन परमात्मा, भगवान कृष्ण की सेवा करना है. उनकी यही अभिलाषा होती है कि बढ़िया परिधान, मालाएँ, आभूषण और प्रसाधन केवल भगवान कृष्ण को अर्पित किए जाएँ, क्योंकि कृष्ण ही वास्तविक भोगकर्ता हैं. वे ऐसी विलासी वस्तुओं को स्वीकार करने से स्वयं मना कर देते हैं क्योंकि वे केवल कृष्ण के लिए हैं. यद्यपि, चूँकि वे भगवान शिव के इस उद्देश्य को नहीं जानते, मूर्ख लोग या तो उन पर हंसते हैं या उनकी लाभहीन नकल करने का प्रयास करते हैं.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी) “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 14- पाठ 25 व 29

धार्मिक सिद्धांतों के अनुसार किया गया संभोग कृष्ण चेतना का प्रतिनिधित्व है.

समाज में अच्छी संतान होने की शर्तें यह हैं कि पति को धार्मिक और नियामक सिद्धांतों में अनुशासित होना चाहिए और पत्नी को पति की पारायण होना चाहिए. भगवद-गीता (7.11) में कहा गया है कि धार्मिक सिद्धांतों के अनुसार संभोग कृष्ण चेतना का प्रतिनिधित्व है. संभोग में संलग्न होने से पहले, पति और पत्नी दोनों को अपनी मानसिक स्थिति, विशेष समय, पति की दिशा, और देवताओं की आज्ञाकारिता पर विचार करना चाहिए. वैदिक समाज के अनुसार, यौन जीवन के लिए उपयुक्त शुभ मुहूर्त होता है, जिसे गर्भाधान का समय कहा जाता है. दिति (राक्षस हिरण्यकश्यपु की माता) ने शास्त्रार्थ निषेध के सभी सिद्धांतों की उपेक्षा की, और इसलिए, वह शुभ संतानों के लिए बहुत चिंतित थी, उन्हें सूचित किया गया था कि उनके बच्चे ब्राह्मण के पुत्र बनने के योग्य नहीं होंगे. यहाँ एक स्पष्ट संकेत है कि ब्राह्मण का पुत्र हमेशा ब्राह्मण नहीं होता है. रावण और हिरण्यकश्यप जैसे व्यक्तित्व वास्तव में ब्राह्मण की संतानें थीं, लेकिन उन्हें ब्राह्मण के रूप में स्वीकार नहीं किया गया था क्योंकि उनके पिताओं ने उनके जन्म के लिए नियामक सिद्धांतों का पालन नहीं किया था. ऐसे बच्चों को राक्षस कहा जाता है. पिछले युगों में अनुशासनात्मक विधियों की उपेक्षा के कारण, एक या दो ही राक्षस होते थे, लेकिन कलियुग में यौन जीवन में कोई अनुशासन नहीं है. फिर कैसे, कोई अच्छी संतानों की आकांक्षा कर सकता है? निश्चित ही अनचाहे बच्चे समाज में प्रसन्नता का स्रोत नहीं हो सकते, लेकिन कृष्ण चेतना आंदोलन के माध्यम से उन्हें भगवान के पवित्र नाम के जाप से मानव स्तर पर लाया जा सकता है. यह भगवान चैतन्य का मानव समाज को अनोखा योगदान है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), "श्रीमद् भागवतम्", तृतीय सर्ग, अध्याय 14 - पाठ 38

आध्यात्मिक संसार में कोई यौन संबंध नहीं होते.

भौतिक संसार में, भौतिकवादी व्यक्तियों द्वारा अपने परिश्रम से एश्वर्य प्राप्त किए जाते हैं. व्यक्ति भौतिक समृद्धि का आनंद तब तक नहीं ले सकता, जब तक वह इसे प्राप्त करने के लिए बहुत मेहनत नहीं करता. लेकिन भगवान के भक्त जो वैकुंठ के वासी हैं उन्हें रत्नों और माणिकों की अलौकिक दशा का आनंद लेने का अवसर मिलता है. रत्न गढ़े हुए सोने से बने आभूषणों को कड़े परिश्रम से नहीं बल्कि भगवान के आशीर्वाद से प्राप्त किया जाता है. दूसरे शब्दों में, वैकुंठ धाम में भक्त, या कि इस भौतिक संसार में भी, निर्धनता के शिकार नहीं होते, जैसा कि कई बार माना जाता है. उनके पास आनंद के लिए पर्याप्त एश्वर्य होते हैं, लेकिन उनको पाने के लिए उन्हें श्रम नहीं करना पड़ता. यह भी कहा जाता है कि वैकुंठ धाम में निवासियों के संघ, भौतिक संसार, बल्कि उच्चतर ग्रहों में भी हमें मिलने वाले संघों से बहुत, बहुत अधिक सुंदर होते हैं. विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि स्त्री के नितंब बहुत आकर्षक होते हैं और वे पुरुष की वासना को उत्तेजित करते हैं, लेकिन वैकुंठ की अद्भुत विशेषता यह है कि यद्यपि महिलाओं के बड़े नितंब और सुंदर चेहरे होते हैं और उन्हें रत्नों और गहने के गहनों से सजाया जाता है, तब भी पुरुष कृष्ण चेतना में इतने लीन रहते हैं कि स्त्रियों के सुंदर शरीर उन्हें आकर्षित नहीं करते. दूसरे शब्दों में, विपरीत लिंग से मेलजोल का आनंद तो है, लेकिन वहाँ कोई यौन संबंध नहीं है. वैकुंठ के निवासियों का आनंद का स्तर उच्च्तर है, इसलिए वहाँ यौन सुख की आवश्यकता नहीं है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 15 – पाठ 20

समान प्रवृत्ति के जीवनसाथी से विवाह करना क्यों आवश्यक है?

भौतिक लाभ के लिए भगवान के पास जाने वाले व्यक्तियों की निंदा के बावजूद, कर्दम मुनि ने यह कहकर भगवान के समक्ष अपनी भौतिक असमर्थता और इच्छा व्यक्त की थी, “यद्यपि मुझे पता है कि आपसे कुछ भी भौतिक वर नहीं माँगना चाहिए, फिर भी मैं समान प्रवृत्ति वाली कन्या से विवाह करना चाहता हूँ.” यह वाक्यांश “समान प्रवृत्ति” बहुत महत्वपूर्ण है. पूर्व में, समान प्रकृति के पुरुषों और कन्याओं का विवाह हुआ करता था; उन्हें प्रसन्न करने के लिए पुरुष और कन्या की समान प्रवृत्तियों को एकजुट किया जाता था. पच्चीस वर्षों से अधिक पहले नहीं, और शायद अब भी चालू है, कि माता-पिता वर और कन्या की कुंडलियाँ यह देखने के लिए जाँचते थे कि उनकी मनोवैज्ञानिक स्थितियों में तथ्यात्मक ऐक्य होगा या नहीं. इन बातों पर विचार करना बहुत महत्वपूर्ण है. आजकल शादी इस तरह के परामर्श के बिना होती है, और इसलिए, शादी के तुरंत बाद, तलाक और अलगाव होता है. पूर्व में पति-पत्नी जीवन भर शांतिपूर्वक साथ रह लेते थे, लेकिन आजकल ये एक कठिन चुनौती है.

कर्दम मुनि समान प्रवृत्ति वाली पत्नी इसलिए चाहते थे क्योंकि आध्यात्मिक और भौतिक विकास में सहयोग के लिए पत्नी का होना आवश्यक है. ऐसा कहा जाता है कि पत्नी धर्म, आर्थिक विकास और इंद्रिय-संतुष्टि की सभी इच्छाओं की पूर्ति करती है. यदि किसी की अच्छी पत्नी है तो उसे सबसे भाग्यशाली व्यक्ति मानना चाहिए. ज्योतिष में, उस व्यक्ति को भाग्यशाली माना जाता है जिसके पास बहुत सी संपत्ति, अच्छे पुत्र या एक बहुत अच्छी पत्नी हो. इन तीनों में, जिसकी बहुत अच्छी पत्नी हो उसे सबसे भाग्यशाली माना जाता है. विवाह से पहले, व्यक्ति को समान प्रवृत्ति की पत्नी चुनना चाहिए न कि तथाकथित सौंदर्य या इंद्रिय तुष्टि के लिए अन्य आकर्षक गुणों से प्रभावित होना चाहिए. भागवतम् के, बारहवें सर्ग में, कहा गया है कि कलियुग में विवाह यौन जीवन को ध्यान में रखते हुए होंगे; जैसे ही यौन जीवन में कोई कमी होगी, तलाक का प्रश्न खड़ा होगा.

कर्दम मुनि उमा से अपना कल्याण मांग सकते थे, क्योंकि पुराणों में बताया गया है कि यदि किसी को अच्छी पत्नी चाहिए, तो उसे उमा की पूजा करना चाहिए. लेकिन उन्होंने भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की पूजा करना पसंद किया क्योंकि भागवत में सुझाया गया है कि हर व्यक्ति को, चाहे वह इच्छाओं से भरा हो, उसकी कोई इच्छा न हो या उसकी कामना मुक्ति की हो, उसे सर्वोच्च भगवान की पूजा करनी चाहिए. पुरुषों के इन तीन वर्गों में से एक भौतिक इच्छाओं की पूर्ति करके खुश रहने का प्रयास करता है, दूसरा सर्वोच्च के साथ एक्य बनाकर प्रसन्न रहना चाहता है, और एक अन्य, पूर्ण पुरुष, एक भक्त होता है. वह भगवान के व्यक्तित्व से बदले में कुछ नहीं चाहता; वह केवल आलौकिक प्रेममय सेवा करते रहना चाहता है. कुछ भी हो, सभी को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि वह सभी की इच्छा को पूरा करेंगे. सर्वोच्च व्यक्तित्व की पूजा करने का लाभ यह है कि भले ही कोई व्यक्ति भौतिक भोग की इच्छा रखता हो, यदि वह कृष्ण की पूजा करता है, तो वह धीरे-धीरे एक शुद्ध भक्त बन जाएगा और उसे और भौतिक भटकाव नहीं होगा.

उदारण 2:
नौ प्रमुख ऋषि, या संत, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ और अथर्व हैं. ये सभी ऋषि सबसे महत्वपूर्ण हैं, और ब्रम्हा की कामना थी कि कर्दम मुनि की पहले ही जन्म ले चुकीं नौ पुत्रियों को उन्हें सौंप दी जाएँ. यहाँ दो शब्दों का उपयोग बहुत महत्वपूर्ण रूप से किया गया है–यथा-शीलम् और यथा-रुचि. पुत्रियों को संबंधित ऋषियों को सौंप दिया जाना चाहिए, बिना देखे नहीं, बल्कि चरित्र और रुचि के संयोजन के अनुसार. यह एख पुरुष और स्त्री के संयोजन की कला है. स्त्री और पुरुष का संगम केवल यौन जीवन के आधार पर नहीं करना चाहिए. कई अन्य बातों पर विचार किया जाता है, विशेष रूप से चरित्र और रुचि. यदि पुरुष और स्त्री के बीच रुचि और चरित्र भिन्न होते हैं, तो उनका संयोजन दुखकारी होगा. लगभग चालीस वर्ष पहले भी, भारतीय विवाहों में, वर और कन्या के रुचि और चरित्र का मिलान सबसे पहले किया जाता था, और फिर उन्हें विवाह करने की अनुमति दी जाती थी. यह उनके माता-पिता के निर्देशन में किया जाता था. माता-पित ज्योतिष के अनुसार वर और कन्या के चरित्र और रुचि का निर्धारण करते थे और जब वे संबंधित लगते, तब मिलान का चयन कर लिया जाता था: “यह कन्या और यह पुरुष बिलकुल उपयुक्त है, और इनका विवाह करना चाहिए.” अन्य विचार कम महत्व के थे. यही प्रणाली सृष्टि की रचना के आरंभ में ब्रम्हा द्वारा भी सुझाई गई थी: “तुम्हारी कन्याओं को रुचि और चरित्र के अनुसार ऋषियों को सौंपा जाना चाहिए.”

ज्योतिष गणना के अनुसार, किसी व्यक्ति को उसके भगवान अथवा दैत्य सदृश गुणों से संबंध के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है. इसी विधि से जीवन साथी का चुनाव किया जाता था. किसी ईश्वरीय गुण वाली कन्या को ईश्वरीय गुण वाले कुमार को ही सौंपा जाना चाहिए. दैत्य गुणों वाली कन्या को दैत्य गुणों वाले कुमार को सौंपा जाना चाहिए. तब वे प्रसन्न रहेंगे. लेकिन यदि कन्या दैत्य गुणों वाली है और कुमार दैवीय गुण वाला तब संयोजन बेमेल होगा; ऐसे विवाह में वे प्रसन्न नहीं रह सकते. वर्तमान में, चूँकि पुरुष और कन्या का विवाह रुचियों और चरित्र के अनुसार नहीं किया जा रहा, अधिकतर विवाह सुखी नहीं हैं, और तलाक होते हैं.

भागवतम के बारहवें सर्ग में यह भविष्यवाणी की गई है कि कलि के इस युग में विवाहित जीवन को केवल संभोग के विचार पर स्वीकार किया जाएगा; जब पुरुष और स्त्री संभोग में प्रसन्न होते हैं, तो वे विवाह कर लेते हैं, और जब संभोग में कमी होती है, तो वे अलग हो जाते हैं. यह वास्तविक विवाह नहीं है, बल्कि पुरुष और स्त्रियों का बिल्लियों और कुत्तों जैसा संयोजन है. इसलिए, आधुनिक युग में उत्पन्न बच्चे ठीक-ठीक मनुष्य नहीं हैं. मानव को दो बार पैदा होना चाहिए. एक शिशुपहली बार अच्छे माता और पिता से पैदा होता है, और फिर उसका जन्म आध्यात्मिक गुरू और वेदों द्वारा दोबारा होता है. पहले माता और पिता इस संसार में उसे जन्म देते हैं; फिर आध्यात्मिक गुरू और वेद उसके दूसरे पिता और माता बन जाते हैं. संतान प्राप्ति के लिए विवाह की वैदिक पद्धति के अनुसार, प्रत्येक पुरुष और स्त्री को आध्यात्मिक ज्ञान से प्रकाशित किया जाता था और संतान प्राप्ति के लिए उनके संगम के समय, सब कुछ छानबीन द्वारा और वैज्ञानिक रूप से किया जाता था.

स्रोत: अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), श्रीमद् भागवतम्, तीसरा सर्ग, अध्याय 15 – पाठ 24 और अध्याय 21 – पाठ 15

भगवान कभी-कभी अपनी युद्ध भावना को प्रकट करने के लिए एक अवतार के रूप में भौतिक संसार में आते हैं.

भगवान ने कहा है कि द्वारपाल जय और विजय को ऋषियों द्वारा दिया गया श्राप स्वयं भगवान द्वारा कल्पित था. बिना भगवान की स्वीकृति के कुछ नहीं हो सकता. ये समझना चाहिए कि वैकुंठ में भगवान के भक्तों को श्राप देने की एक योजना थी, और उनकी योजना को कई दिग्गज विद्वानों द्वारा समझाया गया है. भगवान कभी-कभी युद्ध करने की इच्छा करते हैं. परम भगवान में युद्ध भावना भी होती है, अन्यथा युद्ध कैसे प्रकट होता? चूँकि भगवान ही सब कुछ का स्रोत हैं, क्रोध और लड़ाई भी उनके व्यक्तित्व में निहित हैं. जब वे किसी से युद्ध के इच्छुक होते हैं, तो उन्हें एक शत्रु खोजना होता है, लेकिन वैकुंठ लोक में कोई शत्रु नहीं होता क्योंकि हर कोई पूर्णरूपेण उनकी सेवा में लगा हुआ है. इसलिए वे कभी-कभी भौतिक संसार में एक अवतार के रूप में अपनी युद्ध भावना को प्रकट करने के लिए आते हैं.

भगवद-गीता (4.8) में यह भी कहा गया है कि भगवान भक्तों को सुरक्षा देने और अ-भक्तों का सर्वनाश करने के लिए प्रकट होते हैं. अ-भक्त भौतिक जगत में पाए जाते हैं, न कि आध्यात्मिक जगत में; इसलिए भगवान जब युद्ध करना चाहते हैं, तो उन्हें इस संसार में आना पड़ता है. लेकिन परम भगवान के साथ कौन लड़ेगा? कोई भी उनसे लड़ने में सक्षम नहीं है! इसलिए, चूँकि भौतिक संसार में भगवान की लीलाओं को हमेशा उनके सहयोगियों के साथ निभाया जाता है, दूसरों के साथ नहीं, अतः उन्हें कुछ भक्त ढूंढने पड़ते हैं जो किसी शत्रु की भूमिका निभाएँ. भगवद-गीता में भगवान अर्जुन से कहते हैं, “मेरे प्रिय अर्जुन, तुम और मैं दोनों इस भौतिक संसार में कई बार प्रकट हुए हैं, लेकिन तुम भूल गए हो, जबकि मुझे याद है”. इस प्रकार, जय और विजय को भगवान द्वारा भौतिक संसार में उनके साथ लड़ने के लिए चुना गया था, और यही कारण था कि ऋषि उनसे मिलने आए और त्रुटिवश द्वारपाल को शाप दिया. यह भगवान की इच्छा थी कि उन्हें हमेशा के लिए नहीं बल्कि कुछ समय के लिए भौतिक संसार में भेजा जाए. इसलिए, जैसे किसी रंगमंच पर कोई व्यक्ति मंच के स्वामी के प्रति शत्रु की भूमिका लेता है, यद्यपि नाटक कुछ ही समय के लिए होता है और सेवक और स्वामी में कोई स्थायी शत्रुता नहीं होती, अतः सुर जनों (भक्तों) को ऋषियों द्वारा अ सुर जनों, या नास्तिक परिवारों के पास जाने का श्राप दिया गया. किसी भक्त का एक नास्तिक परिवार में आना आश्चर्य जनक है, लेकिन वह बस एक दिखावा है. अपना छद्म युद्ध समाप्त कर लेने के बाद, भक्त और भगवान दोनों आध्यात्मिक ग्रहों में दोबारा संबद्ध हो जाते हैं. इसे यहाँ बहुत स्पष्ट रूप से समझाया गया है. निष्कर्ष यह है कि कोई भी आध्यात्मिक दुनिया या वैकुंठ ग्रह से पतित नहीं होता है, क्योंकि वह शाश्वत निवास है. लेकिन कभी-कभी, भगवान की इच्छा के अनुसार, भक्त इस भौतिक संसार में धर्मोपदेशक या नास्तिक के रूप में आते हैं. प्रत्येक प्रसंग में हमें समझना चाहिए कि वह भगवान की कोई योजना है. उदाहरण के लिए, भगवान बुद्ध एक अवतार थे, फिर भी उन्होंने नास्तिकता का प्रचार किया: “कोई ईश्वर नहीं है.” लेकिन जैसा कि भागवतम् में बताया गया है, वह वास्तव में एक योजना थी.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी) “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 16- पाठ 26

एक भक्त कभी भी उलटफेर से व्याकुल नहीं होता, जब भगवान के परम व्यक्तित्व द्वारा कोई व्यवस्था की जाती है.

जब भगवान के परम व्यक्तित्व द्वारा कोई व्यवस्था की जाती है, तो व्यक्ति को उससे व्यथित नहीं होना चाहिए, भले ही व्यक्ति के अनुमान से यह उलटा लग रहा हो. उदाहरण के लिए, कभी-कभी हम देखते हैं कि कोई शक्तिशाली प्रचारक मारा गया हो, या कभी-कभी उसे कठिनाई में डाल दिया जाए, जैसे हरिदास ठाकुर के साथ हुआ था. वह एक महान भक्त थे जो इस भौतिक संसार में भगवान के वैभव के उपदेश द्वारा भगवान की इच्छा का निष्पादन करने आए थे. लेकिन हरिदास को काज़ी द्वारा बाईस बाज़ारों मंव दंड दिया गया था. उसी प्रकार, भगवान यीशु को सूली पर टांगा गया, और प्रह्लाद महाराज को दारुण दुख में रखा गया. पांडव, जो कृष्ण के प्रत्यक्ष मित्र थे, उन्होंने अपना राज्य खो दिया, उनकी पत्नी का अपमान हुआ, और उन्हें कई कष्टों का सामना करना पड़ा था. इन सभी विपरीतताओं को देखने से भक्तों पर प्रभाव पड़ता है, व्यक्ति को व्यथित नहीं होना चाहिए; व्यक्ति को बस यह समझना चाहिए कि इन प्रसंगों में भगवान के परम व्यक्तित्व की कोई योजना होगी. भागवतम् का निष्कर्ष यह है कि एक भक्त ऐसी विपरीतताओं से कभी व्यथित नहीं होता है. वह विपरीत परिस्थितियों को भी भगवान की कृपा के रूप में स्वीकार करता है. वह जो विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान की सेवा में लगा रहता है निश्चिंत होता है कि वह परम भगवान के पास, वैकुंठ ग्रह पर वापस जाएगा. भगवान ब्रम्हा ने देवताओं को निश्चिंत किया कि इस बारे में बात करना उपयोगी नहीं है कि अंधकार की विकट स्थिति किस प्रकार घटित हो रही थी, चूँकि वास्तविक तथ्य यह था कि इसका आदेश परम भगवान द्वारा किया गया था. ब्रम्हा यह जानते थे क्योंकि वे एक महान भक्त थे; उनके लिए भगवान की योजना को समझना संभव था.

स्रोत: अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 16- पाठ 37

 

आसुरी जनसंख्या की वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए गर्भाधान प्रक्रिया का पालन करना महत्वपूर्ण है.

पिछले दिनों में केवल दो ही राक्षस (हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष) थे–जो दिति से पैदा हुए थे–फिर भी बहुत सी बाधाएँ थीं. आज के दिन, विशेषकर कलियुग में, यह बाधाएँ हमेशा दृश्यमान हैं, जिससे पता चलता है कि आसुरी जनसंख्या निश्चित ही बढ़ी है. आसुरी जनसंख्या पर नियंत्रण पाने के लिए, वैदिक सभ्यता ने सामाजित जीवन के बहुत से नियम और कानून बनाए, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण अच्छी संतानें पाने के लिए गर्भाधान प्रक्रिया है. भगवद-गीता में अर्जुन ने कृष्ण को सूचित किया कि यदि अवांछित जनसंख्या (वर्ण-संकर) है, तो पूरा संसार नर्क बन जाएगा. लोग संसार में शांति के लिए बहुत चिंतित हैं, लेकिन, दिति से पैदा हुए दैत्यों की तरह, गर्भाधान समारोह के लाभ के बिना बहुत से अनचाहे बच्चे जन्म लेते हैं. दिति इतनी कामान्ध थी कि एक समय उसने अपने पति को संभोग के लिए विवश किया जो कि अशुभ था, और इसलिए व्यवधान पैदा करने के लिए दैत्य पैदा हुए. संतान पाने के लिए यौन जीवन जीने के लिए, व्यक्ति को अच्छी संतानें पाने की प्रक्रिया का पालन करना चाहिए; यदि प्रत्येक परिवार में, प्रत्येक गृहस्थ वैदिक प्रणाली का पालन करता है, तो फिर अच्छी संताने होंगी, दैत्य नहीं, और संसार में स्वतः ही शांति होगी. यदि हम सामाजिक शांति के लिए नियमों का पालन नहीं करते, तो हम शांति की आशा नहीं रख सकते. बल्कि, हमें प्राकृतिक नियमों की कठोर प्रतिक्रियाओं को झेलना पड़ेगा.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 17 – पाठ 15

माँ जुड़वाँ बच्चों को उल्टी अवस्था में जन्म देती है जैसे कि वे गर्भ में पहली बार आए थे.

एक प्रामाणिक वैदिक ग्र्ंथ है जिसे पिंड-सिद्धि कहा जाता है जिसमें गर्भावस्था की वैज्ञानिक समझ बहुत अच्छी तरह से वर्णित की गई है. कहा गया है कि जब पुरुष वीर्य दो अनुक्रमिक बूंदों में गर्भाशय के भीतर मासिक धर्म के प्रवाह में गर्भाशय में प्रवेश करता है, तो माँ अपनी कोख में दो भ्रूण विकसित करती है, और वह जुड़वाँ बच्चों को उल्टी अवस्था में जन्म देती है जैसे कि वे गर्भ में पहली बार आए थे; गर्भ में पहले धारित बच्चा बाद में जन्म लेता है, और बाद में गर्भ में आने वाला बच्चा पहले जन्मता है. गर्भ में पल रहा पहला बच्चा दूसरे बच्चे के पीछे रहता है, इसलिए जब जन्म होता है तो दूसरा बच्चा पहले प्रकट होता है, और पहला बच्चा दूसरे क्रम पर जन्म लेता है. इस प्रसंग में यह समझ आता है कि हिरण्याक्ष,  गर्भधारित दूसरा बच्चे का जन्म पहले हुआ था, जबकि हिरण्यकशिपु, वह बच्चा जो उसके पीछे था, जो गर्भ में पहले आया था, उसका जन्म दूसरे क्रम पर हुआ.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” तीसरा सर्ग, अध्याय 17 – पाठ 18

श्राद्ध क्या है? भगवान के भक्त को ऐसे कर्मकांड करने की आवश्यकता नहीं होती है.

श्राद्ध वेदों के अनुयायियों द्वारा मनाया जाने वाला एक कर्मकांड है. पंद्रह दिनों की अवधि का एक वार्षिक अवसर होता है जब कर्मकांडी धर्मवादी दिवंगत आत्माओं को हव्य भेंट करने के सिद्धांत का पालन करते हैं. इस प्रकार वे पिता और पूर्वज, जो प्रकृति के गुणों के कारण भौतिक भोग के लिए स्थूल शरीर नहीं धारण कर सकते, अपने वंशजों द्वारा श्राद्ध के तर्पण के कारण फिर से ऐसे शरीर प्राप्त कर सकते हैं. श्राद्ध का निष्पादन, या प्रसाद के साथ हव्य अर्पण करना, भारत में अभी भी मौजूद है, विशेषकर गया में, जहाँ हव्य एक प्रसिद्ध मंदिर में विष्णु के चरण कमलों पर अर्पित किए जाते हैं. चूँकि भगवान इस प्रकार वंशजों की भक्ति सेवा से प्रसन्न होते हैं, अपनी कृपा से वह उन पूर्वजों की दण्डित आत्माओं को मुक्त कर देते हैं जिनके पास स्थूल शरीर नहीं है, और वे उनकी आध्यात्मिक उन्नति के विकास के लिए फिर से एक स्थूल शरीर प्राप्त करने में उनका पक्ष लेते हैं. दुर्भाग्यवश, माया के प्रभाव से, बद्ध आत्मा प्राप्त किए हुए शरीर को इंद्रिय तुष्टि में संलग्न कर लेती है, यह भूलकर कि इस प्रकार के व्यवहार से उसे एक अदृश्य शरीर में वापस जाना पड़ सकता है. यद्यपि, भगवान के भक्त, या जो कृष्ण चेतना में है, उसे श्राद्ध के रूप में इस प्रकार के अनुष्ठान करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह हमेशा परम भगवान को प्रसन्न करता है; इसलिए उसके पिता और पूर्वज जो संकट में पड़ गए थे, उन्हें स्वयमेव कष्ट से मुक्ति मिल जाती है. एक विविध उदाहरण प्रह्लाद महाराज हैं. प्रह्लाद महाराजा ने भगवान नृसिंहदेव से अपने पापी पिता का उद्धार करने का अनुरोध किया, जिन्होंने कई बार भगवान के चरण कमलों का अपमान किया था. भगवान ने उत्तर दिया कि जिस परिवार में प्रह्लाद जैसे वैष्णव का जन्म हुआ है, न केवल उसके पिता बल्कि उनके पिता के पिता और उनके पिता – चौदहवें पिता तक – सभी का स्वतः ही कल्याण होगा. इसलिए, निष्कर्ष यह है कि कृष्ण चेतना परिवार के लिए, समाज के लिए और सभी जीवों के लिए समस्त अच्छे कार्यों का कुल योग है. चैतन्य-चरितामृत में लेखक कहता है कि कृष्ण चेतना में पूर्ण रूप से निपुण व्यक्ति कोई भी अनुष्ठान नहीं करता है क्योंकि वह जानता है कि कृष्ण की पूर्ण चेतना में सेवा करने से, सभी अनुष्ठान स्वतः ही संपन्न हो जाते हैं.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” तीसरा सर्ग, अध्याय 20 – पाठ 43

योग अभ्यास उन व्यक्तियों द्वारा सफलतापूर्वक किया जा सकता है जिनके पास जीवन की बहुत लंबी अवधि है.

योग अभ्यास के आठ प्रभागों को (1) इंद्रियों के नियंत्रण, (2) नियमों और विनियमों का कड़ाई से पालन, (3) अलग-अलग आसनों के अभ्यास, (4) श्वास पर नियंत्रण, (5) इंद्रिय विषयों से इंद्रियों को हटाना, (6) मन की एकाग्रता, (7) ध्यान और (8) आत्मबोध के रूप में वर्णित किया गया है. आत्म-साक्षात्कार के बाद परिपूर्णता के आठ और चरण हैं, जिन्हें योग-सिद्धियाँ कहा जाता है. योग प्रणाली में मन को नियंत्रित करना आवश्यक होता है, और मन के भगवान अनिरुद्ध हैं. कहा जाता है कि अनिरुद्ध चार हाथों वाले, सुदर्शन चक्र, शंख, दंड और कमल पुष्प धारी होते हैं. विष्णु के चौबीस रूप हैं, प्रत्येक का नाम भिन्न है. इन चौबीस रूपों में, शंकर्षण, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न और वासुदेव को चैतन्य-चरितामृत में बहुत भली प्रकार से चित्रित किया गया है, जहाँ कहा गया है कि अनिरुद्ध की पूजा योगियों द्वारा की जाती है. शून्य पर ध्यान किसी अटकलबाज के उपजाऊ मस्तिष्क का एक आधुनिक आविष्कार है. जैसा कि इस श्लोक में सुझाया गया है, वास्तव में योग ध्यान की प्रक्रिया को अनिरुद्ध के रूप पर केंद्रित होना चाहिए. अनिरुद्ध का ध्यान करने से व्यक्ति स्वीकृति और अस्वीकृति की व्यग्रता से मुक्त हो सकता है. जब किसी का मन अनिरुद्ध पर स्थिर हो जाता है, तो धीरे-धीरे व्यक्ति ईश्वर के प्रति चेतन हो जाता है; वह कृष्ण चेतना की शुद्ध स्थिति के समीप पहुँचता है, जो योग का अंतिम लक्ष्य है. यह समझा जाता है कि पूर्णता प्राप्त करने से पहले कर्दम मुनि ने दस हजार वर्षों तक योग में ध्यान लगाया था. इसी प्रकार, हमारे पास जानकारी है कि पूर्णता प्राप्त करने से पहले वाल्मीकि मुनि ने भी साठ हजार वर्षों तक योग साधना की थी. इसलिए, योग अभ्यास उन व्यक्तियों द्वारा सफलतापूर्वक किया जा सकता है जिनके पास जीवन की बहुत लंबी अवधि है, जैसे कि एक लाख साल; इस प्रकार से योग में पूर्णता संभव है. अन्यथा, वास्तविक पूर्णता प्राप्त करने की कोई संभावना नहीं है. नियमों का पालन करना, इंद्रियों को नियंत्रित करना और विभिन्न मुद्राओं में बैठने का अभ्यास करना केवल प्रारंभिक अभ्यास हैं. हम नहीं जानते कि कैसे लोग छद्म योग प्रणाली द्वारा आकर्षित किए जा सकते हैं जिसमें कहा जाता है कि बस पंद्रह मिनट नित्य ध्यान करने से व्यक्ति भगवान के साथ एकाकार होने की पूर्णता प्राप्त कर सकता है. यह युग (कलियुग) झांसा देने और झगड़ों का युग है. वास्तव में इस प्रकार के तुच्छ प्रस्तावों द्वारा योग की पूर्णता अर्जित करने की कोई संभावना नहीं है. बल देने के लिए, वैदिक साहित्य स्पष्ट रूप से तीन बार कहता है कि कलि के इस युग में – कलौ नास्त्यैव नास्त्यैव नास्त्यैव– हरेर्नाम, भगवान के पवित्र नाम के जाप के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं है, कोई दूसरा विकल्प नहीं है, कोई दूसरा विकल्प नहीं है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” तीसरा सर्ग, अध्याय 21 – पाठ 4 व 6
अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” तीसरा सर्ग, अध्याय 26 – पाठ 28

पुराने समय में भी अंतर्जातीय विवाह प्रचलित थे.

केवल भगवान की कृपा से ही किसी व्यक्ति को उसकी इच्छानुसार अच्छी पत्नी प्राप्त हो सकती है. समान रूप से, केवल भगवान कृपा से ही किसी कन्या को अपने हृदय के उपयुक्त पति मिलता है. इसलिए कहा जाता है कि यदि हम अपने भौतिक अस्तित्व के प्रत्येक व्यवहार में परम भगवान की प्रार्थना करें, तो सभी चीज़ें अच्छी तरह से संपन्न होंगी और हमारे हृदय की इच्छा के अनुसार होंगी. दूसरे शब्दों में, सभी परिस्थितियों में हमें भगवान के परम व्यक्तित्व की शरण में जाना चाहिए और पूरी तरह से उनके निर्णय पर निर्भर करना चाहिए. मानव प्रस्ताव करता है; भगवान प्रवृत्त करते हैं. इसलिए, कामनाओं की पूर्ति भगवान के परम व्यक्तित्व पर छोड़ देनी चाहिए; वह सबसे उत्तम निराकरण है. कर्दम मुनि ने केवल एक पत्नी की इच्छा की थी, लेकिन चूंकि वह भगवान के भक्त थे, भगवान ने उनके लिए एक ऐसी पत्नी का चयन किया जो सम्राट की पुत्री, एक राजकुमारी थी. इस प्रकार कर्दम मुनि को उनकी अपेक्षा से बढ़ कर एक पत्नी मिली. यदि हम भगवान के परम व्यक्तित्व के चुनाव पर निर्भर करते हैं, तो हम अपनी इच्छा से अधिक एश्वर्य और आशीर्वाद प्राप्त करेंगे. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि कर्दम मुनि एक ब्राह्मण थे, जबकि सम्राट स्वयंभुव क्षत्रिय थे. इसलिए, उन दिनों में भी अंतर्जातीय विवाह प्रचलित थे. व्यवस्था यह थी कि एक ब्राह्मण एक क्षत्रिय की बेटी से विवाह कर सकता था, लेकिन एक क्षत्रिय ब्राह्मण की बेटी से विवाह नहीं कर सकता था. हमारे पास वैदिक युग के इतिहास से साक्ष्य हैं कि शुक्राचार्य ने महाराजा ययाति को अपनी पुत्री प्रस्तुत की थी, लेकिन राजा को ब्राह्मण की पुत्री से शादी करने से इनकार करना पड़ा; वे केवल ब्राह्मण की विशेष अनुमति से विवाह कर सकते थे. इसलिए, कई लाखों साल पहले, पुरातन काल में अंतर्जातीय विवाह निषिद्ध नहीं था, लेकिन सामाजिक व्यवहार की एक नियमित प्रणाली थी.

स्रोत: अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), श्रीमद् भागवतम्, तीसरा सर्ग, अध्याय 21 – पाठ 28

दहेज सद्भावना दिखाने के लिए पिता द्वारा पुत्री को दिया गया उपहार है.

दहेज के साथ किसी की पुत्री को दान में देने की परंपरा आज भी भारत में है. उपहार वधू के पिता की परिस्थिति के अनुसार दिए जाते हैं. परिभरण महादानम् अर्थात् वह दहेज जो विवाह के समय वर को दिया जाना चाहिए. यहाँ महा-दान का अर्थ साम्राज्ञी के दहेज के समान बहुत मूल्यवान उपहार हैं. भूषा-वासः परिच्छदन शब्द भी यहाँ दिखाई देते हैं. भूषा का अर्थ है “आभूषण”, वासः का अर्थ “कपड़ें” हैं, और परिच्छदन का अर्थ है “विभिन्न घरेलू सामान”. एक सम्राट की पुत्री के विवाह समारोह में दी जाने वाली सभी चीजें कर्दम मुनि को प्रदान की गईं, जो अब तक ब्रह्मचारी के रूप में ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे थे. वधू देवाहुति आभूषणों और पोशाख के साथ बहुत वैभव से सजी हुई थी. इस तरह से कर्दम मुनि का विवाह एक योग्य पत्नी के साथ पूर्ण वैभव के साथ और गृहस्थ जीवन के लिए आवश्यक सामग्री के साथ संपन्न हुआ. विवाह की वैदिक पद्धति में आज भी वधू के पिता द्वारा वर को दहेज दिया जाता है; गरीबी से जूझ रहे भारत में भी ऐसे विवाह होते हैं जहां दहेज के लिए सैकड़ों और हजारों रुपए खर्च किए जाते हैं. दहेज प्रथा गैरकानूनी नहीं है, जैसा कि कुछ लोगों ने सिद्ध करने की कोशिश की है. दहेज सद्भाव दिखाने के लिए पिता द्वारा पुत्री को दिया गया उपहार होता है, और यह अनिवार्य है. दुर्लभ मामलों में जहाँ पिता दहेज देने में पूरी तरह से असमर्थ होता है, वहाँ यह कहा जाता है कि उसे कम से कम एक फल और एक फूल देना चाहिए. जैसा कि भगवद-गीता में कहा गया है, भगवान को एक फल और एक फूल से भी प्रसन्न किया जा सकता है. जब वित्तीय अक्षमता होती है और किसी अन्य माध्यम से दहेज जुटाने का कोई सवाल नहीं उठता, तब वर की संतुष्टि के लिए व्यक्ति फल और फूल दे सकता है.

स्रोत: अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), श्रीमद् भागवतम्, तीसरा सर्ग, अध्याय 22 – पाठ 23

जब पुरुष का स्खलन अधिक होता है, तब पुरुष शिशु गर्भ में आता है.

देवाहुति अत्यधिक कामातुर थी, और इसलिए उसने अधिक अण्डाणु का स्राव किया, और नौ पुत्रियों का जन्म हुआ. स्मृति-शास्त्र में, और साथ ही आयुर्वेद में कहा गया है कि जब पुरुष का स्खलन अधिक होता है, तब पुत्र का गर्भधारण होता है, लेकिन जब स्त्री का स्राव अधिक होता है तब, पुत्रियाँ गर्भ में आती हैं. परिस्थितियों से ऐसा लगता है कि देेवाहुति अधिक कामातुर थी, और इसलिए उसे एक साथ नौ पुत्रियाँ हो गईं. हालाँकि सभी पुत्रियाँ, बहुत सुंदर थीं, और उनके शरीर रूपवान थे; प्रत्येक एक कमल के फूल के समान थी और उनकी सुगंध भी कमल के समान ही थी.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), "श्रीमद् भागवतम्", तृतीय सर्ग, अध्याय 23 - पाठ 48

मायावी भौतिक ऊर्जा सबको ठग रही है.

एक बुद्धिमान व्यक्ति को अच्छे अवसरों का उपयोग करना चाहिए. पहला अवसर जीवन का मानवीय रूप है, और दूसरा अवसर एक उपयुक्त परिवार में जन्म लेने का है जहाँ आध्यात्मिक ज्ञान का संस्कार दिया जाता है; ऐसा कम ही मिलता है. सबसे बड़ा अवसर एक संत व्यक्ति से जुड़ाव होता है. देवहुति सचेत थीं कि वे एक सम्राट की बेटी के रूप में पैदा हुईं थी. वे पर्याप्त रूप से शिक्षित और सुसंस्कृत थीं, और अंत में उन्हें कर्दम मुनि, एक संत और एक महान योगी, अपने पति के रूप में प्राप्त हुए. तब भी, यदि उन्हें भौतिक ऊर्जा के जंजाल से मुक्ति नहीं मिलती, तो निश्चित ही उनके साथ अद्म्य मायावी ऊर्जा द्वारा छल किया जाता. वास्त्व में, भौतिक ऊर्जा सभी के साथ छल कर रही है. लोग जब भौतिक वरदानों के लिए देवी काली या दुर्गा के रूप में भौतिक ऊर्जा की पूजा करते हैं तो वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं. वे मांगते हैं, “माँ, मुझे बहुत धन दें, मुझे एक अच्छी पत्नी दें, मुझे प्रसिद्धि दें, मुझे विजय दिलाएँ.” लेकिन माया या दुर्गा देवी के ऐसे भक्त नहीं जानते कि उस देवी द्वारा ही उनके साथ छल किया जा रहा है. भौतिक उपलब्धि वास्तव में कोई उपलब्धि नहीं है क्योंकि जैसे ही व्यक्ति भौतिक उपहारों के भ्रम में पड़ जाता है, वह अधिक से अधिक उलझता जाता है, और मुक्ति का कोई प्रश्न ही नहीं होता. व्यक्ति को यह जानने के लिए पर्याप्त बुद्धिमान होना चाहिए कि आध्यात्मिक बोध के उद्देश्य से भौतिक संपत्ति का उपयोग कैसे किया जाए. वह कर्म-योग या ज्ञान-योग कहलाता है। हमारे पास जो कुछ भी हो उसे हमें परम व्यक्तित्व की सेवा के रूप में उपयोग करना चाहिए. भगवद गीता में यह सुझाव दिया गया है स्व- कर्मण तम अभ्यार्च्य: व्यक्ति को अपनी संपत्ति के द्वारा भगवान के परम व्यक्तित्व की पूजा करने का प्रयास करना चाहिए. परम भगवान की सेवा के कई रूप हैं, और कोई भी अपनी क्षमता के अनुसार सेवा प्रदान कर सकता है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” तीसरा सर्ग, अध्याय 23 – पाठ 57

भगवान विष्णु (कृष्ण) को त्रि-युग के रूप में जाना जाता है.

भगवान विष्णु को त्रि-युग कहा जाता है. वे तीन युगों–सत्य, त्रेता और द्वापर– में प्रकट होते हैं, लेकिन कलि युग में वे प्रकट नहीं होते. यद्यपि पह्लाद महाराज की प्रार्थना से हम समझते हैं कि कलियुग में वे एक भक्त के रूप में प्रकट होते हैं. भगवान चैतन्य वह भक्त हैं. कृष्ण एक भक्त के रूप में प्रकट हुए हैं, लेकिन यद्यपि उन्होंने कभी भी स्वयं को उजागर नहीं किया, रूप गोस्वामी उनकी पहचान को समझ सकते थे, क्योंकि भगवान किसी विशुद्ध भक्त से छिप नहीं सकते. भगवान चैतन्य ने उन्हें पहचान लिया था जब उन्होंने पहली बार भगवान चैतन्य का सत्कार किया था. वे जानते थे कि भगवान चैतन्य स्वयं कृष्ण थे और इसलिए उन्होंने इन शब्दों के साथ उनका सम्मान किया: “मैं कृष्ण के प्रति अपना सम्मान ज्ञापित करता हूँ, जो अब भगवान चैतन्य के रूप में प्रकट हुए हैं.” इसकी पुष्टि प्रह्लाद महाराज की प्रार्थना में भी की गई है: कलि-युग में वे प्रत्यक्ष प्रकट नहीं होते, लेकिन वे एक भक्त के रूप में प्रकट होते हैं. इसलिए, विष्णु को त्रियुग के रूप में जाना जाता है. त्रियुग की एक और व्याख्या यह है कि उनके पास दिव्य गुणों के तीन जोड़े हैं, शक्ति और समृद्धि, पवित्रता और यश, और बुद्धि और उदासीनता. श्रीधर स्वामी के अनुसार, उनके ऐश्वर्यों के तीन जोड़े संपूर्ण संपन्नता औऱ संपूर्ण शक्ति, संपूर्ण प्रसिद्धि और संपूर्ण सौंदर्य, और संपूर्ण बुद्धि और संपूर्ण त्याग हैं. त्रि-युग के विभिन्न व्याख्याएँ हैं, लेकिन त्रि-युग का अर्थ विष्णु है यह सभी विद्वान स्वीकार करते हैं.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी) “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 24- पाठ 26

एक स्त्री को सन्यास नहीं लेना चाहिए.

कर्दम मुनि घर से जाते समय अपनी पत्नी, देवाहुति के लिए चिंतित थे, और इसलिए योग्य पुत्र ने वचन दिया कि न केवल कर्दम मुनि भौतिक बंधनों से मुक्त होंगे, बल्कि देवाहुति भी अपने पुत्र के निर्देश प्राप्त करके मुक्त होंगी. यहाँ एक बहुत अच्छा उदारण प्रस्तुत किया गया है: आत्म-साक्षात्कार के लिए सन्यास आश्रम अपनाकर, पति चला जाता है, लेकिन उसका प्रतिनिधि, पुत्र, जो कि समान रूप से शिक्षित है, माँ की सेवा के लिए घर पर रह जाता है. एक सन्यासी को अपनी पत्नी को अपने साथ नहीं ले जाना चाहिए. निवृत्त जीवन की वानप्रस्थ अवस्था या गृहस्थ जीवन और त्याग के जीवन के मध्यमार्ग की अवस्था में, व्यक्ति अपनी पत्नी को बिना यौन संबंध के एक सहयोगी के रूप में रख सकता है, लेकिन सन्यास जीवन की व्यवस्था में व्यक्ति अपनी पत्नी को साथ नहीं रख सकता. अन्यथा, कर्दम मुनि जैसा व्यक्ति अपनी पत्नी को साथ रख सकता था, और आत्म-साक्षात्कार के उनके अभियोजन के लिए कोई बाधा नहीं होती. कर्दम मुनि ने वैदिक निषेधाज्ञा का पालन किया कि संन्यास जीवन में कोई भी स्त्रियों के साथ किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं रख सकता है. लेकिन उस स्त्री की स्थिति क्या है जिसे उसका पति छोड़ गया हो? उसे अपने पुत्र को सौंपा गया है, और पुत्र वचन देता है कि वह अपनी माता को बंधनों से मुक्ति दिलाएगा. एक स्त्री को सन्यास नहीं लेना चाहिए. आधुनिक काल में मनगढ़ंत आध्यात्मिक समाज महिलाओं को भी सन्यास दे देते हैं, यद्यपि वैदिक साहित्य में किसी स्त्री के लिए सन्यास स्वीकार करने की अनुमति नहीं है. अन्यथा, यदि अनुमति होती, तो कर्दम मुनि अपनी पत्नी को ले जाते और उन्हें सन्यास दे देते. स्त्री को घर पर ही रहना चाहिए. उसके जीवन की केवल तीन अवस्थाएँ होती हैं: बचपन में पिता पर निर्भरता, युवावस्था में पति पर निर्भरता, वृद्धावस्था में, बड़े हो चुके पुत्र पर निर्भरता, जैसे कपिल. वृद्धावस्था में स्त्री की प्रगति बड़े हो चुके पुत्र पर निर्भर होती है. आदर्श पुत्र, कपिल मुनि, अपने पिता को अपनी माँ की मुक्ति का भरोसा दिला रहे हैं ताकि पिता अपनी अच्छी पत्नी के लिए किसी भी चिंता के बिना शांतिपूर्वक जा सकें.

स्रोत: अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 24- पाठ 40

समय का कारक इतना बाध्यकारी होता है कि कालांतर में इस भौतिक संसार की सभी वस्तुएँ समाप्त हो जाती हैं या खो जाती हैं.

“यह सत्य नहीं है कि सांख्य दर्शन कपिल द्वारा शुरू की गई दर्शन की एक नई प्रणाली है क्योंकि भौतिक दार्शनिक अन्य किसी दार्शनिक के विचार का अतिक्रमण करने के लिए नए प्रकार के मानसिक कल्पनाशील विचार प्रस्तुत करते हैं. भौतिक स्तर पर, हर कोई, विशेष रूप से मानसिक कल्पना करने वाला अन्य से अधिक प्रभावशाली होने का प्रयास करता है. कल्पना करने वालों की गतिविधि का क्षेत्र मस्तिष्क है; उन तरीकों से कोई सीमा नहीं है जिनसे कोई मस्तिष्क को उत्तेजित कर सकता है. मस्तिष्क असीमित रूप से उत्तेजित किया जा सकता है, और इस प्रकार कोई व्यक्ति असीमित संख्या में सिद्धांतों को सामने रख सकता है. सांख्य दर्शन वैसा नहीं है; वह कोई मानसिक अटकलबाजी नहीं है. वह तथ्यात्मक है, लेकिन कपिल के समय वह खो गया था.

कालांतर में, कोई विशेष प्रकार का ज्ञान लुप्त हो सकता है या समय विशेष के लिए छिपाया जा सकता है; यह इस भौतिक दुनिया की प्रकृति है. भगवद्-गीता में भगवान कृष्ण द्वारा इसी तरह का कथन दिया गया था. सा कलिनेहा महता योगो नास्तः “कालांतर में भगवद्-गीता में कही गई योग प्रणाली लुप्त हो गई थी.” वह परम्परा में, शिष्य उत्तराधिकार में आ रही था, लेकिन समय बीतने के कारण वह खो गई. समय का कारक इतना बाध्यकारी होता है कि कालांतर में इस भौतिक संसार की सभी वस्तुएँ समाप्त हो जाती हैं या खो जाती हैं. भगवद-गीता की योग प्रणाली कृष्ण और अर्जुन के मिलने से पहले खो गई थी. इसलिए कृष्ण ने फिर से वही प्राचीन योग प्रणाली अर्जुन को दी, ताकि वे वास्तव में भगवद-गीता को समझ सकें. इसी प्रकार, कपिल ने भी कहा कि सांख्य दर्शन की प्रणाली वास्तव में उनके द्वारा प्रस्तुत नहीं की जा रही थी; वह पहले से ही प्रचलन में थी, लेकिन समय के साथ वह रहस्यमय ढंग से लुप्त हो गई, और इसलिए पुनः उसका परिचय कराने के लिए भगवान प्रकट हुए. यही भगवान के अवतार का उद्देश्य है. यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत. धर्म का अर्थ है जीवित प्राणियों की वास्तविक जीविका. जब प्राणी की शाश्वत जीविका में विसंगति होती है, तो भगवान आते हैं और जीवन के वास्तविक कर्म का परिचय देते हैं. कोई भी तथाकथित धार्मिक व्यवस्था जो आध्यात्मिक सेवा की दिशा में नहीं है, उसे अधर्म-संस्थापना कहा जाता है. जब लोग भगवान के साथ उनके शाश्वत संबंध को भूल जाते हैं और आध्यात्मिक सेवा छोड़ अन्य कार्यों में लग जाते हैं, तो उनकी लिप्तता अधर्म कहलाती है. भौतिक जीवन की नारकीय परिस्थिति से बाहर कैसे निकला जा सकता है यह सांख्य दर्शन में बताया गया है, और भगवान स्वयं इस उदात्त प्रणाली की व्याख्या कर रहे हैं.”

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संसंकरण, अंग्रेजी), श्रीमद् भागवतम्, तीसरा सर्ग, अध्याय 24 – पाछ 37.

भक्ति क्यों मुक्ति से श्रेष्ठ है?

भक्ति मुक्ति की अपेक्षा कहीं ऊँची स्थिति में है क्योंकि व्यक्ति के भौतिक बंधन से मुक्ति पाने के प्रयास का फल भक्ति सेवा में स्वतः ही दिया जाता है. यहाँ उदाहरण दिया गया है कि पेट की अग्नि हम जो भी खाएँ उसे पचा देती है. यदि पाचन शक्ति पर्याप्त हो, तो हम जो भी खा सकते हों उसे पेट की अग्नि द्वारा पचा दिया जाएगा. उसी प्रकार, एक भक्त को मुक्ति पाने के लिए अलग से प्रयास नहीं करना होता. भगवान के परम व्यक्तित्व की वह सेवा ही उसकी मुक्ति की प्रक्रिया होती है क्योंकि स्वयं को भगवान की सेवा में लगाना स्वयं को भौतिक बंधन से मुक्त करना है. श्री बिल्वमंगल ठाकुर ने इस स्थिति को बहुत अच्छे से समझाया है, उन्होंने कहा है “यदि परम भगवान के चरण कमलों के प्रति मेरा समर्पण अदम्य है, तो मुक्ति, या स्वतंत्रता, मेरी सेवा मेरी सेविका के जैसे करेगी. मुक्ति, वह सेविका, हमेशा वह करने के लिए तत्पर है जो भी मैं कहूँ.” एक भक्त के लिए, मुक्ति कोई भी समस्या नहीं है. मुक्ति किसी भी भिन्न प्रयास के बिना हो जाती है. इसलिए, भक्ति, मुक्ति या अवैयक्तिक स्थिति से बहुत श्रेष्ठ होती है. अवैयक्तिकवादी मुक्ति पाने के लिए गंभीर तप और साधनाएँ करते हैं, लेकिन भक्त, केवल स्वयं को भक्ति की प्रक्रिया में लगाकर मुक्ति पा लेता है, विशेषकर हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे. हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे, के जाप में जिव्हा को जाप में लगाने पर, और भगवान के परम व्यक्तित्व को लगाए गए भोग के बचे हुए भाग को स्वीकार करने पर तुरंत ही उस पर नियंत्रण विकसित कर देता है. जैसे ही जिव्हा पर नियंत्रण हो जाता है, स्वाभाविक रूप से सभी अन्य इंद्रियाँ स्वतः नियंत्रित हो जाती हैं. इंद्रिय नियंत्रण योग सिद्धांत की पूर्णता है, और व्यक्ति की मुक्ति तुरंत प्रारंभ हो जाती है जैसे ही वह स्वयं को भगवान की सेवा में लगा देता है. कपिलदेव द्वारा इसकी पुष्टि की गई है कि भक्ति, या भक्ति सेवा, गरीयसि है, सिद्धि, मुक्ति से अधिक उत्तम है.

अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 25- पाठ 33

मायावादी और एक विशुद्ध भक्त में अंतर.

ऐसे कई तथाकथित भक्त हैं जो सोचते हैं कि बद्ध अवस्था में हम भगवान के परम व्यक्तित्व की पूजा कर सकते हैं किंतु यह कि अंततः ऐसा कोई व्यक्तित्व नहीं है; वे कहते हैं कि चूँकि परम सत्य अवैयक्तिक है, कोई भी वर्तमान में अवैयक्तिक परम सत्य के व्यक्तिगत रूप की कल्पना नहीं कर सकता, लेकिन जैसे ही कोई मुक्त हो जाता है पूजन रुक जाता है. मायावाद दर्शन द्वारा इस अवधारणा को प्रस्तुत किया जाता है. वास्तविकता में अवैयक्तिकतावादी परम व्यक्ति के अस्तित्व में विलीन नहीं होते बल्कि उसके व्यक्तिगत शारीरिक आलोक में, जिसे ब्रम्हज्योति कहा जाता है. यद्यपि वह ब्रमहज्योति उसके व्यक्तिगत शरीर से भिन्न नहीं होती, इस प्रकार का ऐक्य एक विशुद्ध भक्त द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता क्योंकि भक्त उसके अस्तित्व में विलीन होने के तथाकथित आनंद से श्रेष्ठतर आनंद में रत होते हैं. सबसे महान आनंद भगवान की सेवा करना है. भक्त हमेशा उनकी सेवा करने के बारे में विचारमग्न रहते हैं; वे सदैव परम भगवान की सेवा करने की विधियों का आकल्पन करते रहते हैं, भले ही वे भौतिक अस्तित्व की महानतम बाधाओं के बीच हों. मायावादी भगवान की लीलाओं को कहानियों के रूप में स्वीकार करते हैं, लेकिन वास्तव में वे कहानियाँ नहीं हैं; वे ऐतिहासिक तथ्य हैं. विशुद्ध भक्त भगवान की लीलाओं के कथन को कहानियों के रूप में नहीं बल्कि परम सत्य के रूप में स्वीकारते हैं. शब्द मम पुरुषाणि महत्वपूर्ण हैं. भक्त भगवान की गतिविधियों का गुणगान करने में बहुत रुचि रखते हैं, जबकि मायावादी इन गतिविधियों के बारे में विचार भी नहीं कर सकते. उनके अनुसार परम सत्य अवैयक्तिक है. व्यक्तिगत अस्तित्व के बिना, कोई गतिविधि कैसे हो सकती है? अवैयक्तिकतावादी श्रीमद्-भागवतम्, भगवद-गीता और अन्य वैदिक ग्रंथों में वर्णित गतिविधियों को काल्पनिक कहानियाँ समझते हैं, और इसलिए वे उन्हें बहुत उच्छृंखलता से उनका अर्थ निकालते हैं. उन्हें भगवान के परम व्यक्तित्व की कोई कल्पना नहीं है. वे अनावश्यक रूप से शास्त्रों में हस्तक्षेप करते हैं और भोली जनता को पथभ्रष्ट करने के लिए उनकी कपटपूर्ण व्याख्या करते हैं. मायावाद दर्शन के कार्यकलाप जनता के लिए बहुत घातक हैं, और इसीलिए भगवान चैतन्य ने किसी मायावादी से शास्त्रों के बारे में न सुनने की चेतावनी दी थी. वे पूरी प्रक्रिया की क्षति कर देंगे, और उन्हें सुनने वाला व्यक्ति कभी भी उच्चतम पूर्णता को अर्जित करने के लिए भक्ति सेवा के मार्ग पर आने के योग्य नहीं होगा. कपिल मुनि द्वारा यह स्पष्ट कहा गया है कि भक्ति कर्म, या भक्ति सेवा की गतिविधियाँ मुक्ति से पारलौकिक होती हैं. इसे पंचम पुरुषार्थ कहते हैं. सामान्यतः, लोग धर्म, आर्थिक विकास और इंद्रिय तुष्टि की गतिविधियों में लगे होते हैं, और अंततः वे इस विचार के साथ कार्य करते हैं कि उनका परम भगवान के साथ ऐक्य हो जाएगा (मुक्ति). लेकिन भक्ति इन सभी गतिविधियों से परे हैं. इसलिए श्रीमद्-भागवतम्, इस कथन के साथ प्रारंभ होती है कि सभी प्रकार की पूर्वाग्रहित धार्मिकता को भागवतम् से पूर्णतः मिटा दी गई हैं. आर्थिक विकास और इंद्रिय तुष्टि, और निराशा के बाद इंद्रिय तुष्टि, परम भगवान के साथ एक होने की लालसा के लिए धार्मिक गतिविधियों को भागवतम् में पूर्ण रूप से नकारा गया है. भागवतम विशेष रूप से विशुद्ध भक्तों के लिए है, जो हमेशा कृष्ण चेतना में संलग्न रहते हैं, भगवान की गतिविधियों में, और सदैव इन पारलौकिक गतिविधियों का महिमामंडन करते हैं. विशुद्ध भक्त वृंदावन, द्वारका और मथुरा में भगवान की पारलौकिक गतिविधियों की पूजा करते हैं, क्योंकि वे श्रीमद-भागवतम और अन्य पुराणों में वर्णित हैं. मायावादी दार्शनिकों ने उन्हें कहानियों के रूप में पूरी तरह से अस्वीकार किया है,, लेकिन वास्तव में वे महान और पूजनीय विषय हैं और इस प्रकार केवल भक्तों के लिए आस्वाद के योग्य हैं. यही मायावादी और एक विशुद्ध भक्त का अंतर होता है.

स्रोत: अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 25- पाठ 34

कोई भी भौतिक वैज्ञानिक प्रगति जीवन का निर्माण नहीं कर सकती.

भौतकि प्रकृति का प्रमुख घटक महत्-तत्व, या सभी प्रकारों का पोषक स्रोत होता है. भौतिक प्रकृति का यह भाग, जिसे प्रधान और साथ ही ब्रम्हन कहा जाता है, वह परम भगवान के व्यक्तित्व से गर्भवान होता है और जीवों के विभिन्न प्रकारों को जन्म देता है. इस संबंध में भौतिक प्रकृति को ब्रम्हन कहा जाता है क्योंकि यह आध्यात्मिक प्रकृति का विकृत प्रतिबिंब होता है.

विष्णु पुराण में वर्णन किया गया है कि जीवों का संबंध आध्यात्मिक प्रकृति से होता है. परम भगवान का पौरुष, और जीव, हालाँकि उन्हें मामूली पौरुष कहा जाता है, वे भी आध्यात्मिक हैं. यदि जीव आध्यात्मिक न होते, तो भगवान द्वारा गर्भवान किए जाने का यह वर्णन लागू नहीं होता. परम भगवान अपना वीर्य उसमें नहीं रोपते जो आध्यात्मिक न हो, लेकिन यहाँ कहा गया है कि परम व्यक्तित्व अपना वीर्य भौतिक प्रकृति में रोपता है. इसका अर्थ है कि जीव स्वभाव से आध्यात्मिक होते हैं. गर्भधारण के बाद, भौतिक प्रकृति सभी प्रकार के जीवों को जन्म देती है, महानतम जीवित प्राणी, भगवान ब्रम्हा से प्रारंभ करते हुए, मामूली सी चींटी तक, रूप की समस्त विभिन्नताओं में. भागवद्-गीता (14.4) में भौतिक प्रकृति को स्पष्ट रूप से सर्व-योनिषु के रूप में वर्णित किया गया है. इसका अर्थ है कि सभी जातियों–देवता, मानव, पशु, पक्षी (जो भी उत्पन्न हुआ है) — के सभी प्रकारों की माता भौतिक प्रकृति है, और परम भगवान का व्यक्तित्व बीज-देने वाला पिता है.
सामान्य रूप से समझा जाता है कि पिता ही संतान को जीवन देता है किंतु माता उसका शरीर देती है; हालाँकि जीवन का बीज पिता द्वारा दिया जाता है, लेकिन शरीर माता की कोख में विकसित होता है. इसी प्रकार, आध्यात्मिक जीवों को भौतिक प्रकृति के गर्भ में स्थापित किया जाता है, लेकिन भौतिक प्रकृति द्वारा प्रदत्त, शरीर, जीवन की कई विभिन्न जातियों और रूपों को ग्रहण करता है. यह सिद्धांत कि जीवन के लक्षण चौबीस भौतिक तत्वों के संपर्क से प्रकट होते हैं, यहाँ समर्थित नहीं है. जीवित शक्ति सीधे परम भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व से आती है और पूरी तरह से आध्यात्मिक है. इसलिए, कोई भी भौतिक वैज्ञानिक उन्नति जीवन का उत्पादन नहीं कर सकती है. जीवन शक्ति आध्यात्मिक संसार से आती है और भौतिक तत्वों की अंतःक्रिया से इसका कोई लेना-देना नहीं है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 26 – पाठ 19

भगवान परम भगवान के चार व्यक्तित्वों के रूप में विस्तार लेते हैं.

वासुदेव उत्पत्ति, या भगवान के परम व्यक्तित्व की समझ की अवस्था, को विशुद्ध मंगल, या शुद्ध-सत्व कहा जाता है. शुद्ध-तत्व अवस्था में दूसरे गुणों का कोई अतिक्रमण नहीं होता, जिनका नाम वासना और अज्ञान है. वैदिक साहित्य में परम भगवान के चार व्यक्तित्वों के रूप में भगवान के विस्तार का उल्लेख है – वासुदेव, शंकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध. यहाँ महत्-तत्व के पुनः प्रकट होने पर भगवान के चार विस्तार होते हैं. वह जो परमात्मा के भीतर आसीन है पहले वासुदेव के रूप में विस्तार लेता है. वासुदेव अवस्था भौतिक इच्छाओं के उल्लंघन से मुक्त होती है और वह स्थिति है जिसमें कोई व्यक्ति भगवान के परम व्यक्तित्व, या उस उद्देश्य को समझ सकता है जिसका वर्णन भगवद्-गीता में अद्भुत के रूप में किया गया है. यह महत्-तत्व की एक और विशेषता है. वासुदेव विस्तार को कृष्ण चेतना भी कहा जाता है, क्योंकि यह भौतिक वासना और अज्ञान के सभी प्रभावों से मुक्त है. समझ की यह स्पष्ट स्थिति भगवान के परम व्यक्तित्व को जानने में सहायता करती है. वासुदेव स्थिति को भगवद-गीता में क्षेत्र-ज्ञ के रूप में भी समझाया गया है, जिसका अर्थ गतिविधियों के क्षेत्र का ज्ञाता और साथ ही सर्व-ज्ञानी भी है. एक विशेष प्रकार के शरीर को धारण करने वाला प्राणी उस शरीर को जानता है, लेकिन सर्व-ज्ञाता, वासुदेव, केवल किसी विशिष्ट प्रकार के शरीर को ही नहीं, बल्कि विभिन्न प्रकार के शरीरों में गतिविधियों के क्षेत्र को भी जानता है. स्पष्ट चेतना या कृष्ण चेतना में स्थित होने के लिए, वासुदेव की पूजा करनी चाहिए. वासुदेव अकेले कृष्ण हैं, जब कृष्ण, या विष्णु, उनकी आंतरिक ऊर्जा की संगत के बिना अकेले हैं, तो वे वासुदेव होते हैं. जब वे अपनी आंतरिक शक्ति के साथ होते हैं, तो उन्हें द्वारकाधीश कहा जाता है. स्पष्ट चेतना या कृष्ण चेतना के लिए, वासुदेव की पूजा करनी होगी. भगवद-गीता में यह भी बताया गया है कि कई जन्मों के बाद, व्यक्ति वासुदेव को समर्पित हो पाता है. ऐसी महान आत्मा विलक्षण है. झूठे अहंकार से मुक्ति पाने के लिए व्यक्ति को शंकर्षण की पूजा करनी होगी. शंकर्षण की पूजा भगवान शिव के माध्यम से भी की जाती है; वे भुजंग जो भगवान शिव के शरीर को ढँकते हैं संकर्षण के प्रतिनिधि हैं, और भगवान शिव हमेशा संकर्षण के ध्यान में लीन रहते हैं. वह जो वास्तव में भगवान शंकर का उपासक है संकर्षण के भक्त के रूप में झूठे, भौतिक अहंकार से मुक्त हो सकता है. यदि व्यक्ति मानसिक व्यवधानों से स्वतंंत्र होना चाहता है, तो उसे अनिरुद्ध की पूजा करनी होगी. इस उद्देश्य के लिए, वैदिक साहित्य में चंद्र ग्रह की पूजा करने का सुझाव भी दिया गया है. उसी प्रकार, व्यक्ति को उसकी बुद्धि में स्थित होने के लिए प्रद्युम्न की पूजा करनी होगी, जिन तक ब्रम्हा की पूजा के माध्यम से पहुँचा जा सकता है. ये प्रसंग वैदिक साहित्य में समझाए गए हैं.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी) “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 26- पाठ 21

मिथ्या अहंकार स्वतंत्रता के दुरुउपयोग से उपजता है.

प्रारंभ में, शुद्ध चेतना से, या कृष्ण चेतना की विशुद्ध अवस्था द्वारा, पहला संदूषण हो गया. यही मिथ्या अहंकार, या शरीर की पहचान आत्म के रूप में करना कहलाता है. जीव कृष्ण चेतना की प्राकृतिक अवस्था में अस्तित्वमान रहता है, लेकिन उसे नाम मात्र की स्वतंत्रता होती है, और इस कारण वह कृष्ण को भूल जाता है. मूल रूप से, विशुद्ध कृष्ण चेतना अस्तित्व में होती है, लेकिन सीमित स्वतंत्रता के दुरुपयोग के कारण कृष्ण को भूलने की संभावना होती है. यह वास्तविक जीवन में प्रदर्शित होता है; ऐसे कई उदाहरण हैं जिसमें कृष्ण चेतना में कर्मरत व्यक्ति अचानक परिवर्तित हो जाता है. इसलिए उपनिषदों में यह बताया गया है, कि आध्यात्मिक अनुभूति का मार्ग चाकू की तीखी धार जैसा ही होता है. उदाहरण बिल्कुल उचित है. व्यक्ति एक धारदार उस्तरे से अपनी दाढ़ी बहुत अच्छे से बना लेता है, लेकिन जैसे ही उसका ध्यान उस कर्म से हट जाता है, वह अपना गाल काट बैठता है क्योंकि उसने उस्तरे के प्रयोग में गलती की.

व्यक्ति को न केवल विशुद्ध कृष्ण चेतना के स्तर तक पहुँचना चाहिए, बल्कि उसे बहुत सावधान भी रहना चाहिए. किसी भी प्रकार की असावधानी का परिणाम पतन हो सकता है. इस पतन का कारण मिथ्या अहंकार है. विशुद्ध चेतना की स्थिति से, मिथ्या अहंकार का जन्म स्वतंत्रता के दुरुपयोग के कारण होता है. हम इस पर बहस नहीं कर सकते कि मिथ्या अहंकार विशुद्ध चेतना से क्यों उदित होता है. वास्तविकता में, एसा होगा इसकी संभावना हमेशा रहती है, और इसलिए व्यक्ति को बहुत सावधान रहना चाहिए. मिथ्या अहंकार उन सभी भौतिक कर्मों का मूल सिद्धांत है, जो भौतिक प्रकृति की रीतियों में संपन्न किए जाते हैं. जैसे ही कई विशुद्ध कृष्ण चेतना से हटता है, उसका भौतिक प्रतिक्रियाओं में उलझाव बढ़ जाता है. भौतिकवाद का उलझाव भौतिक चित्त है, और इस भौतिक चित्त से, इंद्रियों और भौतिक अंगों का प्रकटन होता है.

स्रोत:अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण- अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तीसरा सर्ग, अध्याय 26 – पाठ 24

मिथ्या अहंकार के द्वारा ही सभी भौतिक वस्तुओं का निर्माण भोग के साधनों के रूप में होता है.

मिथ्या अहंकार, देवताओं में रूपांतरित हो जाता है, जो भौतिक प्रकरणों के नियंत्रण अधिकारी होते हैं. एक उपकरण के रूप में मिथ्या अहंकार का प्रतिनिधित्व विभिन्न इंद्रियों और इंद्रियबोध अंगों के रूप में किया जाता है, और देवताओं और इंद्रिबोध के संयुक्त होने के परिणाम स्वरूप, भौतिक वस्तुओं का निर्माण होता है. भौतिक संसार में हम बहुत सारी वस्तुओं का उत्पादन कर रहे हैं, और यह सभ्यता का विकास कहलाता है, लेकिन वास्तविकता में सभ्यता का विकास मिथ्या अहंकार का प्रकटीकरण है. मिथ्या अहंकार द्वारा भौतिक वस्तुओं का निर्माण भोग के साधनों के रूप में किया जाता है. व्यक्ति को भौतिक चीज़ों के रूप में कृत्रिम आवश्यकताओं को बढ़ाना बंद करना चाहिए. एक महान आचार्य, नरोत्तम दास ठाकुर ने शोकपूर्वक कहा है कि जब कोई वासुदेव या कृष्ण चेतना की शुद्ध चेतना से विचलित होता है, तो वह भौतिक गतिविधियों में उलझ जाता है. उनके वास्तविक शब्द हैं, ‘सत-संग चढ़ी’कैनु असते विलास/ ते-करने लगिला ये कर्म-बंध-फंसा: “मैंने चेतना की विशुद्ध अवस्था को त्याग दिया क्योंकि मैं अस्थायी भौतिक संसार को भोगना चाहता था; इसलिए मैं क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के जाल में उलझ गया हूँ.”

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण – अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 26 – पाठ 26

मन अच्छाई में अहंकार का उत्पाद है और बुद्धि लालसा में अहंकार का उत्पाद है.

मन अच्छाई में अहंकार का उत्पाद है और मन का कार्य लालसा के अनुसार स्वीकृति या अस्वीकृति है. लेकिन यहाँ बुद्धि को लालसा में अहंकार का उत्पाद कहा गया है. यह मन और बुद्धि के बीच का भेद है; मन अच्छाई में अहंकार का उत्पाद है, और बुद्धि लालसा में अहंकार का उत्पाद है. किसी वस्तु को स्वीकार करने और किसी वस्तु को अस्वीकार करने की इच्छा मन का बहुत महत्वपूर्ण घटक है. चूँकि मन अच्छाई की अवस्था का उत्पाद है, यदि यह मन के स्वामी, अनिरुद्ध पर एकाग्र किया जाता है, तब मन को कृष्ण चेतना में बदला जा सकता है. नरोत्तम दास द्वारा कहा गया है कि हम हमेशा लालसा करते हैं. लालसाओं को रोका नहीं जा सकता. लेकिन यदि हम हमारी इच्छाओं को परम भगवान के व्यक्तित्व पर स्थानांतरित कर दें, तो वह जीवन का सर्वोत्तम होगा. जैसे ही इच्छा को भौतिक प्रकृति पर आधिपत्य करने के लिए स्थानांतरित किया जाता है, यह पदार्थ से दूषित हो जाती है. इच्छाओं को शुद्ध करना पड़ता है. शुरुआत में, इस शुद्धिकरण प्रक्रिया को आध्यात्मिक गुरु के आदेश से पूरा किया जाना होता है, क्योंकि आध्यात्मिक गुरु जानते हैं कि शिष्य की इच्छा को कृष्ण चेतना में रूपांतरित किया जा सकता है. जहाँ तक बुद्धि का प्रश्न है, यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि वह लालसा में अहंकार का उत्पाद है. अभ्यास द्वारा व्यक्ति अच्छाई की अवस्था के बिंदु तक पहुँच जाता है, और मन को परम भगवान के व्यक्तित्व के प्रति समर्पित या एकाग्र करने पर, व्यक्ति एक महान व्यक्तित्व, या महात्मा बन जाता है. भागवद्-गीता में स्पष्ट कहा गया है, स महात्मा सुदुर्लभः: “ऐसी आत्मा बहुत दुर्लभ होती है.”

इस पद में स्पष्ट है कि दोनों प्रकार की चेतना, ज्ञान प्राप्त करने की चेतना और क्रियाओं की चेतना लालसा की अवस्था में अहंकार के उत्पाद हैं. और क्योंकि क्रिया करने और ज्ञान प्राप्ति की इंद्रियों को ऊर्जा,की आवश्यकता होती है, महत्वपूर्ण ऊर्जा, या जीवन ऊर्जा का निर्माण लालसा की अवस्था में अहंकार द्वारा किया जाता है. इसलिए हम वास्तव में देख सकते हैं, कि जो लोग बहुत लालसामय हैं वे भौतिक प्राप्तियों को बहुत तेज़ी से पा सकते हैं. वैदिक शास्त्रों में सुझाया गया है कि यदि कोई किसी व्यक्ति को भौतिक संग्रहण में प्रोत्साहित करना चाहता है, तो उसे यौन जीवन में भी प्रोत्साहित करना चाहिए. हम स्वाभाविक रूप से पा सकते हैं कि जो लोग यौन जीवन के आदी हैं वे भौतिक रूप से भी आगे हैं क्योंकि यौन जीवन या लालसामय जीवन सभ्यता के भौतिक विकास का संवेग है. जो लोग आध्यात्मिक विकास करना चाहते हैं, उनके लिए लालसा की अवस्था का कोई अस्तित्व नहीं है. केवल अच्छाई की स्थिति प्रमुख है. हम देखते हैं कि जो लोग कृष्ण चेतना में लिप्त हैं वे भौतिक रूप से विपन्न होते हैं, लेकिन जिनकी भी आँख हैं वे देख सकते हैं कि कौन बड़ा है. हालांकि वह भौतिक रूप से विपन्न लगता है, कृष्ण चेतना में रत कोई व्यक्ति वास्तव में विपन्न नहीं होता है, बल्कि वह व्यक्ति जिसे कृष्ण चेतना का बोध नहीं है और भौतिक वस्तुओं के साथ बहुत प्रसन्न नज़र आता है वास्तव में वही विपन्न है. भौतिक चेतना की ओर आकर्षित व्यक्ति भौतिक सुविधा के लिए वस्तुएँ ढूंढने में बहुत चतुर होते हैं, लेकिन इसीलिए उनकी पहुँच आत्मा और आध्यात्मिक जीवन की समझ तक नहीं होती. इसलिए, यदि कोई आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करना चाहता है, तो उसे शुद्धीकृत कामना, आध्यात्मिक सेवा के लिए शुद्धीकृत कामना के स्तर पर वापस आना होगा. जैसाकि नारद-पंचरात्र में कहा गया है, कि जब इंद्रियाँ कृष्ण चेतना में शुद्ध हो जाती हैं तब भगवान की सेवा में संलग्नता को विशुद्ध समर्पण कहा जाता है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण – अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 26 – पाठ 31

जीवित ऊर्जा के बिना, ऐसी कोई संभावना नहीं होती कि पदार्थ उत्पन्न हो सकें.

यौन जीवन में, अभिभावकों से पदार्थ का संगम, जिसमें पायसीकरण और स्राव, शामिल होते हैं, वह परिस्थिति निर्मित करता है जहाँ आत्मा को पदार्थ के भीतर प्राप्त किया जाता है, और पदार्थ का संगम धीरे-धीरे संपूर्ण शरीर में बदल जाता है. समान सिद्धांत ब्रम्हांडीय सृष्टि में भी अस्तित्वमान होता है: सामग्री उपलब्ध थी, लेकिन केवल जब भगवान ने सामग्री में प्रवेश किया तभी वास्तव में पदार्थ सक्रिय हुआ. यही सृष्टि का कारण है. इसे हम अपने सामान्य अनुभवों में देख सकते हैं. चाहे हमारे पास मिट्टी, पानी और अग्नि हो, लेकिन ये तत्व ईंट का आकार केवल तभी लेते हैं जब हम उन्हें मिलाने का परिश्रम करते हैं. बिना जीवित ऊर्जा के, पदार्थ के आकार लेने की कोई संभावना नहीं होती. इसी प्रकार यह भौतिक संसार तब तक विकसित नहीं होता जब तक कि उसे विराट-पुरुष के रूप में भगवान सक्रिय नहीं करते. यस्मद् उदतिष्ठद् असौ विराट: उसके उद्दीपन द्वारा, आकाश की रचना की गई, और भगवान का सार्वभौमिक रूप भी ऐसे ही प्रकट हुआ.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण – अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 26 – पाठ 51

ब्रम्हांड का विस्तृत विवरण.

यह ब्रम्हांड, या सार्वभौमिक आकाश जिसकी कल्पना हम असंख्य ग्रहों के साथ कर सकते हैं, उसका आकार एक अंडे के समान है. जिस प्रकार अंडा खोल से ढंका होता है, उसी प्रकार ब्रम्हांड भी विभिन्न परतों से ढंका होता है. पहली परत जल, अगली अग्नि, फिर वायु, फिर आकाश, और अंततः सबको पकड़े रखने वाली परत प्रधान है. इस अंडे के समान ब्रम्हांड के भीतर भगवान का सार्वभौमिक स्वरूप विराट-पुरुष होता है. सभी विभिन्न ग्रह स्थितियाँ उनके शरीर के भाग हैं. यह श्रीमद्-भागवतम् की शुरुआत, द्वितीय सर्ग में पहले ही बता दिया गया है. माना जाता है कि ग्रह मण्डल भगवान के सार्वभौमिक रूप के शारीरिक भागों की रचना करते हैं. वे लोग जो भगवान के अलौकिक रूप की पूजा में प्रत्यक्ष भाग नहीं ले सकते, उन्हें इस सार्वभौमिक रूप का ध्यान और पूजा करने का परामर्श दिया जाता है. सबसे निचले ग्रह मण्डल, पाताल को परम भगवान के पैर का तलवा माना जाता है, और पृथ्वी को भगवान का उदर माना जाता है. ब्रम्हलोक, या सर्वोच्च ग्रह मण्डल, जहाँ ब्रम्हा रहते हैं, उसे भगवान की शीर्ष माना जाता है.

इस विराट-पुरुष को भगवान का अवतार माना जाता है. भगवान का मूल स्वरूप कृष्ण है, जैसा कि ब्रम्ह-संहिता: आदि पुरुष में पुष्टि की गई है. विराट-पुरुष भी पुरुष है, लेकिन वह आदि-पुरुष नहीं है. आदि-पुरुष कृष्ण हैं. ईश्वरः परमः कृष्णः सद्-चित-आनंद-विग्रहः अनादिर् आदिर् गोविंदः. भगवत्गीता में कृष्ण को आदि-पुरुष के रूप में भी स्वीकार किया गया है, मौलिक कृष्ण कहते हैं, “मुझसे उच्चतर कोई भी नहीं है”. भगवान के असंख्य विस्तार हैं, और वे सभी पुरुष, या भोक्ता हैं, लेकिन न तो विराट-पुरुष और न ही पुरुष-अवतार-कारणोदकशायी विष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु और क्षीरोदकशायी विष्णु– न ही कई अन्य विस्तार, मौलिक हैं. प्रत्येक ब्रम्हांड में गर्भोदकशायी विष्णु, विराटपुरुष और क्षीरोदकशायी विष्णु होते हैं. विराट-पुरुष की सक्रिय उत्पत्ति का वर्णन यहाँ किया गया है. जो लोग परम भगवान के व्यक्तित्व के बारे में निचले स्तर की समझ रखते हैं, वे भगवान के सार्वभौमिक रूप का विचार कर सकते हैं, क्योंकि भागवतम् में ऐसा परामर्श किया गया है.

यहाँ ब्रम्हांड के आकार का अनुमान लगाया गया है. बाहरी आवरण जल, वायु, अग्नि, आकाश, अहम् और महत्-तत्व की परतों से बना हुआ है, और हरेक परत पिछली परत से दस गुना विशाल है. ब्रम्हांड के खोखल में व्याप्त अंतरिक्ष को किसी भी मानव वैज्ञानिक या किसी के भी द्वारा मापा नहीं जा सकता, और उस खोखल के आगे सात आवरण हैं, और प्रत्येक आवरण पहले वाले आवरण से दस गुना बड़ा है. जल की परत ब्रम्हांड के आकार से दस गुना बड़ी है, और अग्नि की परत, जल की परत से दस गुना बड़ी है. इसी प्रकार, वायु की परत, अग्नि की परत से दस गुना बड़ी है. ये आकार किसी भी मानव मात्र के छोटे से मष्तिष्क द्वारा कल्पनीय नहीं हैं.

यह भी कहा गया है कि यह विवरण केवल एक अंडे सदृश ब्रम्हांड का है. इस एक के अतिरिक्त असंख्य ब्रम्हांड हैं, और उनमें से कुछ कई-कई गुना बड़े हैं. वास्तव में, यह माना जाता है, कि यह ब्रम्हांड सबसे छोट है; इसलिए पूर्ववर्ती अधीक्षक, या ब्रह्म, के प्रबंधन के लिए केवल चार शीर्ष हैं. अन्य ब्रम्हांडों में, जो इससे बहुत बड़े हैं, ब्रम्हा के अधिक शीर्ष हैं. चैतन्य-चरितामृत में यह कहा गया है कि छोटे ब्रम्हा के अनुरोधप एक दिन इन सभी ब्रम्हाओं को भगवान कृष्ण द्वारा बुलाया गया, जो सभी बड़े ब्रह्माओं को देखने के बाद अचंभित थे. ये भगवान की अकल्पनीय शक्ति है. अनुमान द्वारा या भगवान की झूठी पहचान से कोई भी भगवान की लंबाई और चौड़ाई को नहीं माप सकता. ये सारे प्रयास विक्षिप्तता के लक्षण हैं.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद्भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 26 – पाठ 52.

जितना अधिक व्यक्ति यौन सुख का आसक्त होता है, उतनी ही शीघ्रता से उसकी मृत्यु होने की आशंका होती है.

योगी और परलोकवादी जो अधिक समय तक जीवित रहना चाहते हैं वे स्वयं को वीर्य स्खलन से दूर रखते हैं. जो व्यक्ति वीर्य के स्खलन से जितना भी परहेज कर सकता है, उतना ही वह मृत्यु की समस्या से दूर रह सकता है. ऐसे कई योगी हैं जो इस प्रक्रिया द्वारा तीन सौ या सात सौ सालों तक जीवित रहते हैं, और भागवतम् में यह स्पष्ट कहा गया है कि वीर्य स्खलित करना भयानक मृत्यु का कारण है. वयक्ति जितना अधिक यौन सुख में आसक्त होगा, उसकी मृत्यु उतनी ही शीघ्र होने की संभावना होगी.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), "श्रीमद् भागवतम्", तृतीय सर्ग, अध्याय 26 - पाठ 57

भौतिक शरीर से मुक्ति पाकर आत्मा कहाँ जाती है?

स्व-संस्थान सूचित करता है कि अवैयक्तिकों के पास रहने के लिए कोई विशेष स्थान नहीं होता है. अवैयक्तिक उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व को त्याग देते हैं ताकि जीवन सजीवता भगवान के अतींद्रिय शरीर से प्रकट होने वाली अवैयक्तिक दीप्ति में समा सके, लेकिन भक्त के लिए निर्दिष्ट निवास होता है. ग्रह सूर्य के प्रकाश में स्थित होते हैं, लेकिन स्वयं सूर्य के प्रकाश का अपना कोई विशेष विश्राम स्थान नहीं होता है. आध्यात्मिक आकाश, जो कैवल्य कहलाता है, बस सभी ओर व्याप्त आनंदमय प्रकाश होता है, और वह भगवान के परम व्यक्तित्व के संरक्षण के अधीन होता है. जैसा कि भगवद-गीता (14.27) में कहा गया है, ब्राह्मणो हि प्रतिमाहम्: अवैयक्तिक ब्राह्मण दीप्ति भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के शरीर पर स्थित होती है. दूसरे शब्दों में, भगवान के परम व्यक्तित्व की दैहिक दीप्ति कैवल्य, या अवैयक्तिक ब्राह्मण है. अवैयक्तिक दीप्ति में आध्यात्मिक ग्रह होते हैं, जिन्हें वैकुंठों के रूप में जाना जाता है, जिसमें कृष्णलोक प्रधान है. कुछ भक्त वैकुंठ ग्रहों तक उन्नत हो जाते हैं, और कुछ कृष्णलोक ग्रह की ऊँचाई तक पहुँच जाते हैं. विशिष्ट भक्त की कामना के अनुसार, उसे विशिष्ट निवास दिया जाता है, जिसे स्व-संस्थान कहा जाता है, उसकी इच्छित गंतव्य. भगवान की कृपा से, धार्मिक सेवा में रत आत्म-ज्ञानी भक्त अपने गंतव्य को समझता है भले ही वह भौतिक शरीर में हो. इस प्रकार वह अपनी धार्मिक गतिविधियों को निर्बाध पूरा करता है, और अपने भौतिक शरीर को छोड़ने के बाद तुरंत उस गंतव्य तक पहुँच जाता है जिसके लिए उसेन स्वयं को तैयार कर रखा है. उस धाम तक पहुँचने के बाद, वह इस भौतिक संसार में वापस नहीं आता.

शब्द लिंगादि विनिर्गमे, जिनका यहाँ उपयोग किया गया है, इनका अर्थ है “दो प्रकार के शरीरों, सूक्ष्म और स्थूल से मुक्त हो जाने के बाद.” सूक्ष्म शरीर मन, बुद्धि, मिथ्या अहंकार और दूषित चेतना से बना होता है, और स्थूल शरीर पाँच तत्वों–पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बना है.

जब कोई आध्यात्मिक संसार में स्थानांतरित हो जाता है, तब वह इस भौतिक संसार के सूक्ष्म और स्थूल दोनों शरीरों को त्याग देता है. तब वह अपने मूल, आध्यात्मिक शरीर के साथ आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश करता है और किसी आध्यात्मिक ग्रह में स्थित हो जाता है. हालाँकि अवैयक्तिक भी सूक्ष्म और स्थूल शरीरों का त्याग करने के बाद उस आध्यात्मिक आकाश तक पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें आध्यात्मिक ग्रह में स्थान नहीं मिलता; उनकी इच्छा के अनुसार उन्हें, भगवान के शरीर से निकलने वाली आध्यात्मिक दीप्ति में समाहित होने की अनुमति होती है. स्वसंस्थानम् शब्द भी बहुत महत्वपूर्ण है. जैसे कोई स्वयं को अपने धाम तक पहुँचने के लिए तैयार करता है. अवैयक्तिकों को अवैयक्तिक ब्राम्हण दीप्ति प्रदान की जाती है, लेकिन जो लोग भगवान के परम व्यक्तित्व जैसे वैकुंठ के नारायण, या कृष्णलोक में कृष्ण, से उनके पारलौकिक रूप से जुड़ना चाहते हैं, उन धामों में जाते हैं, जहाँ से वे कभी वापस नहीं लौटते.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण – अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 27 – पाठ 29

अतीत की गतिविधियों की निरंतरता के रूप में मुक्त आत्मा की गतिविधियों को स्वीकार किया जाएगा.

ऐसे प्रश्न किए जा सकते हैं. जब तक मुक्त आत्मा शरीर के संपर्क में रहती है, तब तक उस पर शारीरिक गतिविधियाँ प्रभाव क्यों नहीं डालती? क्या वह वास्तव में भौतिक गतिविधियों की क्रिया और प्रतिक्रिया द्वारा दूषित नहीं होता? ऐसे प्रश्नों के उत्तर में, यह श्लोक बताता है कि किसी मुक्त आत्मा के भौतिक शरीर का प्रभार भगवान के परम व्यक्तित्व द्वारा ले लिया जाता है. यह जीव की जीवन शक्ति के कारण कार्य करना नहीं है; यह बस पिछली गतिविधियों की प्रतिक्रियाओं के रूप में कार्य करना है. बंद कर दिए जाने के बाद भी, एक बिजली का पंखा कुछ देर के लिए चलता रहता है. वह गति विद्युत प्रवाह के कारण नहीं होती है, लेकिन पिछली गति की निरंतरता होती है; उसी प्रकार, यद्यपि एक मुक्त आत्मा किसी सामान्य व्यक्ति के समान कर्म करता हुआ लगता है, उसकी गतिविधियाँ पिछले कर्मों की निरंतरता के रूप में स्वीकार की जानी चाहिए. किसी स्वप्न में व्यक्ति स्वयं को कई शरीरों के माध्यम से विस्तारित देख सकता है, लेकिन जब जागता है तो समझता है कि वे सभी शरीर मिथ्या थे. उसी प्रकार, यद्यपि एक मुक्त आत्मा के उपादान होते हैं-शरीर के उत्पाद– संतानें, पत्नी, घर, इत्यादि.– वह स्वयं को उन शारीरिक विस्तारों से नहीं पहचानता. वह जानता है कि वे सभी भौतिक स्वप्न के उत्पाद होते हैं. स्थूल शरीर पदार्थ के स्थूल तत्व से बना होता है, और सूक्ष्म शरीर मन, बुद्धि, अहंकार और दूषित चेतना से बना होता है. यदी व्यक्ति किसी स्वप्न के सूक्ष्म शरीर को मिथ्या के रूप में स्वीकारता है और स्वयं की पहचान शरीर से नहीं करता, तब निश्चित ही किसी जागृत मनुष्य को स्थूल शरीर से पहचान बनाने की आवश्यकता नहीं होती. क्योंकि वह जो जागृत है उसका किसी स्वप्न में शरीर की गतिविधियों से कोई संबंध नहीं होता, एक जागृत, मुक्त आत्मा का वर्तमान शरीर की गतिविधियों से कोई संपर्क नहीं होता. दूसरे शब्दों में, वह अपनी वैधानिक स्थिति का अभ्यस्त होता है, वह जीवन की शारीरिक अवधारणा को स्वीकार नहीं करता.

स्रोत: अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 28- पाठ 38

वह दर्शन जो भगवान की भक्ति सेवा का लक्ष्य नहीं करती उसे मानसिक अटकल माना जाता है.

भक्ति-योग, भक्ति सेवा, समस्त दर्शन प्रणालियों का आधार है; सारा दर्शन जो भगवान की भक्ति सेवा को लक्ष्य नहीं करता उसे केवल मानसिक अटकल माना जाता है. लेकिन निश्चित ही बिना दार्शनिक आधार के बिना भक्ति-योग न्यूनाधिक रूप से केवल भावुकता है. व्यक्तियों के दो वर्ग होते हैं. कुछ स्वयं को बौद्धिक रूप से विकसित समझते हैं और बस अनुमान लगाते और ध्यान करते हैं, औऱ दूसरे भावुक होते हैं और अपने प्रस्तावों के लिए उनके पास कोई दार्शनिक आधार नहीं होता. इनमें से कोई भी जीवन का उच्चतम लक्ष्य नहीं पा सकते–या, यदि वे पा सकते हैं, तो उनको बहुत वर्ष लगने वाले हैं. वैदिक साहित्य इसलिए यह सुझाव देते हैं कि तीन तत्व होते हैं–जो परम भगवान, जीव, और उनका शाश्वत संबंध– और जीवन का लक्ष्य भक्ति, या भक्ति सेवा के सिद्धांतों का पालन करना होता है, और अंततः भगवान के सेवक के रूप में पूर्ण समर्पण और प्रेम में परम भगवान के ग्रह को अर्जित करना होता है.

सांख्य दर्शन समस्त अस्तित्व का विश्लेषणात्मक अध्ययन है. व्यक्ति को सभी कुछ उसकी प्रकृति और लक्षणों का परीक्षण करके समझना होगा. इसे ज्ञान अर्जित करना कहते हैं. लेकिन व्यक्ति को जीवन का लक्ष्य या ज्ञान प्राप्त करने का आधारभूत सिद्धांत–भक्ति-योग प्राप्त किए बिना केवल ज्ञान ही अर्जित नहीं करना चाहिए. यदि हम भक्ति योग त्याग दें औऱ बस चीज़ों (जैसी वे होती हैं) के स्वभाव के विश्लेषणात्मक अध्ययन में व्यस्त हो जाएँ, तो फिर परिणाम व्यावहारिक रूप से शून्य होगा. भागवतम् में कहा गया है कि इस प्रकार का जुड़ाव कुछ-कुछ धान कूटने जैसै होता है. यदि अनाज पहले ही निकाला जा चुका हो तो धान कूटने का कोई अर्थ नहीं होता. भौतिक प्रकृति, जीव और परमात्मा के वैज्ञानिक अध्ययन द्वारा, व्यक्ति को भगवान की भक्ति सेवा के आधारभूत सिद्धांतों को समझना होगा.

स्रोत: अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 29- पाठ 02

बद्धजीव अपने विशेष प्रकार के शरीर में संतुष्ट है जो उसे प्रदान किया जाता है।

ऐसा कहा जाता है कि एक बार स्वर्ग के राजा, इंद्र को उनके आध्यात्मिक गुरु, ब्रहस्पति ने उनके दुर्व्यवहार के कारण शाप दिया था, और वह इस ग्रह पर शूकर बन गए थे. बहुत दिनों के बाद, जब ब्रह्मा ने उन्हें अपने स्वर्गीय राज्य में वापस बुलाना चाहा, तो शूकर के रूप में इंद्र स्वर्गीय राज्य में अपनी राजकीय स्थिति के बारे में सबकुछ भूल गए, और उन्होंने वापस जाने से मना कर दिया. यही मायाजाल है. यहाँ तक कि इंद्र भी अपने स्वर्गीय जीवन को भूल जाते हैं और शूकर के जीवन स्तर से संतुष्ट हो जाते हैं. माया के प्रभाव से बद्ध आत्मा अपने विशेष प्रकार के शरीर के प्रति इतनी स्नेह-पूर्ण हो जाती है कि यदि उसे प्रस्ताव दिया जाए, “इस शरीर को त्याग दो, और तुम्हारे पास तत्काल एक राजा का शरीर होगा,” तो वह सहमत नहीं होगा. यह लगाव सभी बद्ध जीवों को दृढ़ता से प्रभावित करता है. भगवान कृष्ण व्यक्तिगत रूप से प्रचार कर रहे हैं, “इस भौतिक संसार में सब कुछ त्याग दो. मेरे पास आओ, और मैं तुम्हें समस्त सुरक्षा दूंगा,” लेकिन हम सहमत नहीं होते हैं. हम सोचते हैं, “हम बिलकुल ठीक हैं. हमें कृष्ण के प्रति समर्पण क्यों करना चाहिए और उनकेराज्य में वापस क्यों जाना चाहिए? इसे भ्रम, या माया कहा जाता है. हर कोई अपने जीवन स्तर से संतुष्ट है, चाहे वह कितना भी घृणास्पद हो.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” तीसरा सर्ग, अध्याय 30 – पाठ 05

मृत्यु के समय व्यक्ति उन विचारों में खो जाएगा जो उसने जीवन भर की अवधि में पोषित किए हैं.

भगवद्-गीता में कहा गया है कि मृत्यु के समय व्यक्ति उन विचारों में खो जाएगा जो उसने जीवन भर की अवधि में पोषित किए हैं. कोई व्यक्ति जिसका अपने परिवार के सदस्यों का उचित रूप से पालन करने के अतिरिक्त कोई भी विचार नहीं रहा हो उसके अंतिम विचार पारिवारिक प्रसंगों के ही होंगे. किसी सामान्य व्यक्ति के लिए यही प्राकृतिक तारतम्य है. सामान्य व्यक्ति अपने जीवन की नियति नहीं जानता; वह बस अपने जीवन की कौंध में व्यस्त है, परिवार का पालन कर रहा है. अंतिम स्थिति पर, कोई भी इस बात से संतुष्ट नहीं होता कि उसने पारिवारिक आर्थिक स्थिति को कैसे सुधारा है; सभी यह विचार करते हैं कि वह पर्याप्त नहीं दे सका. अपने गहरे पारिवारिक स्नेह के कारण, वह इंद्रियों का नियंत्रण करने और अपनी आध्यात्मिक चेतना को बेहतर करने का अपना मुख्य कर्तव्य भूल जाता है. कभी-कभी मरता हुआ एक व्यक्ति अपने बेटे या किसी संबंधी को परिवार के प्रसंग यह कहते हुए सौंप देता है, कि “मैं जा रहा हूँ. कृपया परिवार का ध्यान रखना.” वह नहीं जानता कि वह कहाँ जा रहा है, बल्कि मृत्यु के समय भी उसे अपने परिवार के पालन की चिंता होती है. कभी-कभी यह देखा जाता है कि एक मरणासन्न व्यक्ति चिकित्सक से अपने जीवन को कम से कम कुछ वर्षों के लिए बढ़ाने का अनुरोध करता है ताकि परिवार के पालन की जिस योजना को उसने शुरू किया है वह पूरी की जा सके. ये बद्ध आत्मा के भौतिक रोग होते हैं. वह अपनी वास्तविक वचनबद्धता–कृष्ण चैतन्य बनना– को पूरी तरह से भूल जाता है, और अपने परिवार के पालन की योजना के बारे में सदैव गंभीर रहता है, यद्यपि वह एक के बाद एक परिवार बदलता है.

स्रोत: अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 30- पाठ 18

भगवान द्वारा रची गई स्त्री माया का ही प्रतिनिधित्व है.

कभी-कभी ऐसा होता है कि एक परित्यक्त कुआँ घास से ढँक जाता है, और एक अनजान यात्री जिसे कुएँ के अस्तित्व का पता नहीं है, वह नीचे गिर जाता है, और उसकी मृत्यु निश्चित होती है. इसी प्रकार से, किसी स्त्री के साथ संबंध तब शुरू होता है जब कोई उससे सेवा स्वीकार करता है, क्योंकि स्त्री को भगवान द्वारा विशेष रूप से पुरुष की सेवा करने के लिए रचा गया है. उसकी सेवा स्वीकार करके, पुरुष फंस जाता है. यदि वह यह जानने के लिए पर्याप्त बुद्धिमान नहीं है कि स्त्री नारकीय जीवन का प्रवेश द्वार है, तो वह उसके संगति में बहुत उदारता से लिप्त हो सकता है. यह उन लोगों के लिए प्रतिबंधित है जो पारलौकिक स्तर पर ऊँचा उठने की आकांक्षा रखते हैं. पचास साल पहले भी हिंदू समाज में इस तरह का संबंध प्रतिबंधित था. एक पत्नी अपने पति को दिन के समय में नहीं देख सकती थी. गृहस्थों के पास अलग-अलग आवासीय भवन भी होते थे. एक आवासीय निवास के आंतरिक भाग स्त्री के लिए होते थे, और बाहरी भाग पुरुष के लिए थे. किसी स्त्री द्वारा प्रदान की गई सेवा को स्वीकार करना बहुत ही सुखद लग सकता है, लेकिन इस तरह की सेवा को स्वीकार करने में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि स्त्री मृत्यु या व्यक्ति की आत्म विस्मृति का प्रवेश द्वार होती है. वह आध्यात्मिक बोध का मार्ग अवरुद्ध कर देती है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” तीसरा सर्ग, अध्याय 31 – पाठ 40

स्त्री और पुरुष दोनों को ही भगवान की सेवा की ओर आकृष्ट होना चाहिए.

भगवान कपिलदेव के इन निर्देशों में यह समझाया गया है कि स्त्री न केवल पुरुष के लिए नर्क का द्वार है, बल्कि पुरुष भी स्त्री के लिए नर्क का द्वार है. यह आसक्ति का प्रश्न है. एक पुरुष उसकी सेवा, सुंदरता और कई अन्य गुणों के कारण एक स्त्री से आसक्त हो जाता है, और इसी प्रकार एक स्त्री किसी पुरुष के प्रति उसके द्वारा प्रदान किए गए घर, गहने, परिधान और बच्चों के लिए आसक्त हो जाती है. यह एक दूसरे के लिए परस्पर आसक्ति का प्रश्न है. जब तक दोनों में से कोई भी ऐसे भौतिक आनंद के लिए दूसरे के प्रति आसक्त हो, स्त्री पुरुष के लिए हानिकारक, और पुरुष भी स्त्री के लिए हानिकारक होता है. लेकिन यदि आसक्ति कृष्ण की ओर स्थानांतरित हो जाए, तो दोनों कृष्ण चेतन हो जाते हैं, और तब विवाह बहुत अच्छा होता है. इसलिए श्रील रूप गोस्वामी सुझाव देते हैं: अनासक्त विषयन यथार्हम् उपयुजतः निर्बंधः कृष्ण-संबंधे युक्तम् वैराग्यम् उच्यते (भक्ति-रसामृत-सिंधु 1.2.255) पुरुष और स्त्री को साथ में गृहस्थ के रूप में कृष्ण के संबंध में रहना चाहिए, केवल कृष्ण के प्रति कर्तव्य निभाने के लिए. कृष्ण चेतना के कर्तव्यों में, बच्चों को शामिल करें, पत्नी को शामिल करें और पति को शामिल करें, और फिर ये सभी शारीरिक या भौतिक बंधन अदश्य हो जाएंगे. चूँकि माध्यम कृष्ण हैं, चेतना शुद्ध है, और किसी भी समय पतन की संभावना नहीं है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” तीसरा सर्ग, अध्याय 31 – पाठ 42

भौतिकवादी व्यक्ति परम भगवान की पारलौकिक गतिविधियों मे रुचि नहीं लेते.

वैदिक विचार के अनुसार, धर्म, आर्थिक विकास, अर्थ संतुष्टि और मुक्ति जैसे उत्थान की चार सिद्धांत होते हैं. भौतिक भोग में रुचि रखने वाले व्यक्ति निर्धारित कर्तव्यों को पूरा करने की योजना बनाते हैं. वे धार्मिक अनुष्ठानों, आर्थिक उन्नयन और इंद्रिय भोग की तीन उत्थान प्रक्रियाओं में रुचि रखते हैं. अपनी आर्थिक स्थिति को विकसित करके, वे भौतिक जीवन का आनंद ले सकते हैं. इसलिए भौतिकवादी व्यक्ति, उन उत्थान प्रक्रियाओं में रुचि रखते हैं, जिन्हें त्रै-वर्गिक कहा जाता है. त्रै का अर्थ है “तीन”; वर्गिक का अर्थ है “उत्थान प्रक्रियाएँ.” इस प्रकार के भौतिकवादी व्यक्ति भगवान के परम व्यक्तित्व से कभी आकर्षित नहीं होते हैं. बल्कि, वे उसके प्रति विरोधी होते हैं. भगवान के परम व्यक्तित्व को यहाँ हरि-मेधाः के रूप में वर्णित किया गया है, या “वह जो जन्म और मृत्यु के चक्र से उद्धार कर सकता है.” भौतिकवादी व्यक्तियों को भगवुान की अद्भुत लीलाओं के बारे में सुनने में कोई रुचि नहीं होती है. वे सोचते हैं कि वे कल्पना और कहानियाँ हैं और परम भगवान भी भौतिक प्रकृति का व्यक्ति है. वे भक्ति सेवा, या कृष्ण चेतना में प्रगति करने के लिए योग्य नहीं होते हैं. ऐसे भौतिकवादी व्यक्ति अखबार की कहानियों, उपन्यासों और काल्पनिक नाटकों में रुचि रखते हैं. भगवान की तथ्यात्मक गतिविधियाँ, जैसे कुरुक्षेत्र के युद्ध में भगवान कृष्ण का व्यवहार, या पांडवों की गतिविधियाँ, या वृंदावन या द्वारका में भगवान की गतिविधियाँ, भगवद्गीता और श्रीमद-भागवतम में संबंधित हैं, जो भगवान की गतिविधियों से पूर्ण है. लेकिन भौतिकवादी व्यक्ति जो भौतिक संसार में अपनी स्थिति का उत्थान करने में संलग्न हैं, उन्हें भगवान की ऐसी गतिविधियों में कोई रुचि नहीं होती है. वे एक महान राजनेता या इस संसार के एक अत्यंत धनाड्य व्यक्ति की गतिविधियों में रुचि ले सकते हैं, लेकिन वे परम भगवान की पारलौकिक गतिविधियों में रुचि नहीं रखते हैं. हर कोई किसी अन्य व्यक्ति की गतिविधियों के बारे में सुनने का अभ्यस्त है, चाहे वह एक राजनेता या एक धनाड्य व्यक्ति या कोई काल्पनिक चरित्र हो जिसकी गतिविधियों को एक उपन्यास में रचा गया हो. निरर्थक साहित्य, कहानियों और अनुमान परक दर्शन की बहुत सी पुस्तकें हैं. भौतिकवादी व्यक्तियों को इस प्रकार के साहित्य को पढ़ने में बहुत रुचि है, लेकिन जब उन्हें श्रीमद-भागवतम, भगवद-गीता, विष्णु पुराण या संसार के अन्य धर्मग्रंथों जैसे कि बाइबल और कुरान जैसी ज्ञान की वास्तविक पुस्तकें प्रस्तुत की जाती हैं, तो वे रुचि नहीं लेते हैं. इन व्यक्तियों को परम व्यवस्था द्वारा वैसे ही निंदित किया जाता है जैसे एक शूकर को किया जाता है. शूकर को मल खाने में रुचि होती है. यदि शूकर को संगनित दूध या घी से बने व्यंजन प्रस्तुत किए जाएँ, तो वह उन्हें पसंद नहीं करेगा; वह अप्रिय, बदबूदार मल पसंद करेगा, जो उसे बहुत आनंददायक लगता है. भौतिकवादी व्यक्तियों को निंदित माना जाता है क्योंकि वे नारकीय गतिविधियों में रुचि रखते हैं न कि पारलौकिक गतिविधियों में. भगवान की गतिविधियों का संदेश अमृत है, और उस संदेश के अतिरिक्त, कोई भी जानकारी जिसमें हमें रुचि हो सकती है, वास्तव में नारकीय होती है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014, अंग्रेजी संस्करण), “श्रीमद्-भागवतम” तीसरा सर्ग, अध्याय 32 – पाठ 18 व 19

कृष्ण चेतना में कुछ भी प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन हर चीज़ को युक्त, नियमित बनाया गया है.

व्यक्ति को निर्धारित नियमों और विनियमों का पालन करना होता है, जैसा कि भगवद्-गीता में पुष्टि की गई है, युक्तहार-विहारस्य. जब कोई कृष्ण चेतना में भक्ति सेवा रत हो जाता है, तो तब भी उसे खाना, सोना, सुरक्षा और मैथुन करना पड़ता है क्योंकि ये शरीर की आवश्यकताएँ हैं. लेकिन वह ये गतिविधियाँ विनियमित विधि से करता है. उसे कृष्ण प्रसाद खाना होता है. उसे विनियमित सिद्धांतों के अनुसार सोना होता है. सिद्धांत नींद की अवधि को कम करने और खाना कम करने के लिए है, केवल शरीर को चुस्त रखने के लिए जो आवश्यक है वह लेना. संक्षिप्त में, लक्ष्य आध्यात्मिक प्रगति है, ना कि इंद्रिय तुष्टि. समान रूप से, यौन जीवन भी कम किया जाना चाहिए. यौन जीवन का उद्धेश्य केवल कृष्ण चैतन्य संताने प्राप्त करना होता है. अन्यथा यौन जीवन की कोई आवश्यकता नहीं होती. कुछ भी प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन उच्चतर उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, सभी को युक्त, विनियमित बनाया गया है. जीवन जीने के इन सभी नियमों और विनियमों का पालन करके, व्यक्ति शुद्ध हो जाता है, और अज्ञानता के वशीभूत सारी भ्रांतियाँ शून्य हो जाती हैं. यहाँ विशिष्ट रूप से बताया गया है कि भौतिक उलझन के कारणों को पूर्ण रूप से वश में कर लिया जाता है. संस्कृत कथन अनर्थ-निवृत्ति सूचित करता है कि यह शरीर अवांछित है. हम आत्मा हैं, और इस शरीर की कोई भी आवश्यकता कभी नहीं थी. लेकिन चूँकि हम भौतिक शरीर का आनंद लेना चाहते थे, हमें यह शरीर, भगवान के परम व्यक्तित्व के निर्देश के अधीन भौतिक ऊर्जा के माध्यम से मिला. जैसे ही हम परम भगवान के सेवक के रूप में हमारी मूल स्थिति में पुनर्स्थापित हो जाते हैं, हम शरीर की आवश्यकताओं को भूलने लगते हैं, और अंततः हम शरीर को भूल जाते हैं. कभी-कभी किसी स्वप्न में हमें किसी विशेष प्रकार का शरीर मिल जाता है जिसके माध्यम से स्वप्न में कार्य करना होता है. मैं स्वप्न देख सकता हूँ कि मैं आकाश में उड़ रहा हूँ या यह कि मैं वन में या किसी अज्ञात स्थान पर चला गया हूँ. लेकिन जैसे ही मैं जागता हूँ मैं इन शरीरों को भूल जाता हूँ. उसी प्रकार, जब कोई कृष्ण चैतन्य, पूर्ण समर्पित हो जाता है, वह अपने सभी शारीरिक परिवर्तनों को भूल जाता है. हम, जन्म के समय अपनी माता की कोख से प्रारंभ करके हमेशा शरीर बदलते रहते हैं. लेकिन जब हम कृष्ण चैतन्य में जागृत होते हैं, हम इन सभी शरीरों को भूल जाते हैं. शारीरिक आवश्यकताएँ गौण हो जाती हैं, क्योंकि प्राथमिक आवश्यकता आत्मा का वास्तविक, आध्यात्मिक जीवन में रत होना होता है. संपूर्ण कृष्ण चेतना में भक्ति सेवा की गतिविधियाँ परलोक में हमारे होने का कारण होती हैं. भगवते आत्मा-संस्राय परमात्मा, या सभी की आत्मा के रूप में भगवान के परम व्यक्तित्व की सूचना देता है. भगवद्-गीता में कृष्ण कहते हैं, बीजं मम सर्व-भूतानाम: “मैं सभी जीवों का बीज हूँ.” भक्ति सेवा की प्रक्रिया द्वारा परम आत्मा की शरण लेकर, व्यक्ति पूर्ण रूप से भगवान के व्यक्तित्व की अवधारणा में स्थापित हो जाता है. जैसा कि कपिल द्वारा वर्णन किया गया है,मद-गुण-श्रुति-मात्रेना: वह जो पूर्ण रूप से कृष्ण चैतन्य है, भगवान के व्यक्तित्व में स्थित है, वह जैसे ही भगवान के पारलौकिक गुणों के बारे में सुनता है, तुरंत भगवान के प्रेम से संतृप्त हो जाता है.

स्रोत: अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 33- पाठ 26

काल और दिक्

“श्रीमद्-भागवतम् का परमाणु संबंधी वर्णन लगभग आधुनिक विज्ञान के परमाणु सिद्धांत जैसा ही है. आधुनिक विज्ञान में भी, परमाणु को परम अविभाज्य कण के रूप में स्वीकार किया जाता है, जिससे ब्रह्मांड की रचना होती है. श्रीमद्-भागवतम् ज्ञान के सभी वर्णनों का संपूर्ण पाठ है, जिसमें परमाणु का सिद्धांत भी शामिल है. परमाणु शाश्वत समय का सूक्ष्म रूप है। परमाणु, प्रकट ब्रह्मांड की अंतिम स्थिति हैं. जब वे अलग-अलग भौतिक निकायों के गठन के बिना स्वयं अपने रूपों में रहते हैं, तो उन्हें असीमित इकाई कहा जाता है. भौतिक रूपों में निश्चित रूप से अलग-अलग निकाय हैं, लेकिन परमाणु स्वयं पूर्ण अभिव्यक्ति का निर्माण करते हैं. निकायों के परमाणु संयोजन की गति को मापकर समय का अनुमान लगाया जा सकता है. समय भगवान, हरि के सर्वशक्तिमान व्यक्तित्व की शक्ति है, जो सभी भौतिक हलचलों को नियंत्रित करता है, हालांकि वह भौतिक दुनिया में दिखाई नहीं देता है.

समय और स्थान दो परस्पर संबंधी शब्द हैं. समय को परमाणुओं के एक निश्चित स्थान को व्याप्त करने के संदर्भ में मापा जाता है. मानक समय की गणना सूर्य की गति के संदर्भ में की जाती है. किसी परमाणु पर से गुज़रने में सूर्य द्वारा लगाए गए समय की गणना परमाणविक समय के रूप में की जाती है. सबसे महान समय अ-द्वैत जगत के संपूर्ण अस्तित्व पर व्याप्त होता है. सभी ग्रह परिक्रमा करते हुए अंतरिक्ष की यात्रा करते हैं, और अंतरिक्ष की गणना परमाणु के संदर्भ में की जाती है. परिक्रमा करने के लिए प्रत्येक ग्रह की अपनी विशिष्ट कक्षा होती है, जिसमें वह मार्ग बदले बिना घूमता रहता है, और इसी प्रकार, सूर्य की भी अपनी कक्षा है. निर्माण, पालन-पोषण और विलय के समय की संपूर्ण गणना समस्त ग्रह प्रणालियों द्वारा निर्माण की समाप्ति तक के चक्र के संदर्भ में की जाती है, और वह परम काल कहलाता है. सकल समय के विभाजन की गणना निम्न प्रकार से की जाती है: दो परमाणु एक दोहरा परमाणु बनाते हैं, और तीन दोहरे परमाणु एक षटाणु या त्रसरेणु बनाते हैं. यह त्रसरेणु सूर्य के प्रकाश में देखा जा सकता है जो किसी खिड़की के छिद्र से होकर आता है. सपष्ट रूप से देखा जा सकता है कि त्रसरेणु ऊपर आकाश की ओर जाता है. तीन त्रसरेणु के एकीकरण के लिए आवश्यक समयावधि को त्रुटि कहते हैं, और एक सौ त्रुटि से मिलकर एक वेध बनाता है. तीन वेध से एक लावा बनता है. ऐसी गणना की गई है कि यदि एक सेकंड को 1687.5 भागों में विभक्त किया जाए, तो प्रत्येक भाग की अवधि एक त्रुटि जितनी होगी, जो वह समय है जो अठारह परमाणु कणों के एकीकरण में लगता है. विभिन्न निकायों में परमाणुओं का ऐसा संयोजन भौतिक समय की गणना की रचना करता है. सभी अलग-अलग अवधियों की गणना के लिए सूर्य केंद्रीय बिंदु है. तीन लावा के समय की अवधि एक निमेष के बराबर होती है, तीन निमेष का संयोजन एक क्षण होता है, पाँच क्षणों को साथ मिलाने पर एक काष्ठा बनती है, और पंद्रह काष्ठा से एक लघु बनता है. गणना से पाया गया है कि एक लघु दो मिनटों के बराबर होता है. वैदिक ज्ञान के संदर्भ में समय की परमाणु गणना इस समझ के साथ वर्तमान समय में परिवर्तित हो सकती है. पंद्रह लघु से एक नाड़िका बनती है, जिसे दंड भी कहा जाता है. मानव गणना के अनुसार दो दंड से एक मुहूर्त बनता है, और छः या सात दंड, दिन या रात के चौथाई भाग के बराबर होते हैं. एक नाड़िका, या दंड के लिए मापने वाला बर्तन, तांबे के छह-पल-भार [चौदह औंस] के पात्र से तैयार किया जा सकता है, जिसमें चार माशा भार की और चार अंगुल लंबी सोने की सुई से एक छेद किया जाता है. जब पात्र को पानी पर रखा जाता है, तो पानी पात्र में पूरा भर जाने के जितना समय एक दंड कहलाता है. यह सुझाव दिया जाता है कि मापने के लिए तांबे के पात्र में छेद एसी सुई से किया जाना चाहिए, जिसका भार चार माशा से अधिक और माप चार अंगुल से लंबा न हो. यह छेद के व्यास को नियंत्रित करता है. पात्र को पानी में डुबोया जाता है और पूरा भर जाने का समय एक दंड कहलाता है. यह दंड को मापने का दूसरा ढंग है, वैसे ही जैसे समय का माप काँच में रेत द्वारा किया जाता है. ऐसा लगता है कि वैदिक सभ्यता के दिनों में भौतिकी, रसायन या उच्च गणित के ज्ञान की कोई कमी नहीं थी.

माप की गणना विभिन्न तरीकों से की जाती थी, जो यथासंभव सरल हों. यह गणना की गई है कि मानव के एक दिन के चार प्रहर होते हैं, जिन्हें यम भी कहा जाता है, और रात में भी चार प्रहर होते हैं. इसी तरह, पंद्रह दिन और रात का एक पखवाड़ा (पक्ष) होता है, और एक माह में दो पक्ष, शुक्ल और कृष्ण होते हैं. दो पक्षों का योग एक माह होता है, और पिता ग्रहों के लिए वह अवधि एक पूर्ण दिन और रात होती है. इस तरह एक मौसम में दो महीने होते हैं, और छह महीने में दक्षिण से उत्तर की ओर सूर्य की एक पूर्ण गति होती है. सूर्य की दो पूर्ण गति से देवताओं का एक दिन और रात बनती है, और दिन और रात का यह संयोजन मानव का एक पूर्ण पंचांग वर्ष होता है. मनुष्य के जीवन की अवधि एक सौ वर्ष है. ब्रह्माण्ड भर के प्रभावशाली तारे, ग्रह, प्रकाशमान और परमाणु अपनी-अपनी कक्षाओं में परमात्मा की दिशा में घूम रहे हैं, जिसका प्रतिनिधित्व शास्वत काल करता हैं. ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि सूर्य परमात्मा की आँख है और यह अपनी विशेष कक्षा में घूमता है, उसी प्रकार, सूर्य से लेकर परमाणु तक, सभी पिंड काल-चक्र, या शास्वत समय की कक्षा से प्रभावित होते हैं. और उनमें से प्रत्येक के पास एक संवत्सर का निर्धारित कक्षीय समय होता है. श्रीमद-भागवतम के उपर्युक्त छंदों में भौतिकी, रसायन विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, काल और दिक् के विषय निश्चित रूप से विषय विशेष के छात्रों के लिए बहुत दिलचस्प हैं, लेकिन जहाँ तक हमारा संबंध है, हम उन्हें तकनीकी ज्ञान के संदर्भ में बहुत अच्छी तरह से नहीं समझा सकते हैं. विषय का सारांश इस कथन द्वारा किया गया है कि ज्ञान की सभी विभिन्न शाखाओं के ऊपर काल, भगवान के परम व्यक्तित्व के पूर्ण प्रतिनिधित्व का नियंत्रण है. उनके बिना कोई भी अस्तित्व संभव नहीं, और इसलिए, वह सबकुछ, जो हमारे सीमित ज्ञान को चमत्कारिक प्रतीत होता है, वह परम भगवान के जादुई छड़ी का कार्य है. जहाँ तक समय का संबंध है, हम आधुनिक घड़ी के संदर्भ में समय की एक तालिका को यहाँ शामिल करने की प्रार्थना करते हैं.

> एक त्रुटि – 8.13,500 सेकंड
> एक वेध – 8.135 सेकंड
> एक लावा – 8.45 सेकंड
> एक निमेष – 8.15 सेकंड
> एक क्षण – 8.5 सेकंड
> एक काष्ठ – 8 सेकंड
> एक लघु – 2 मिनट
> एक दंड – 30 मिनट
> एक प्रहर – 3 घंटे
> एक दिन – 12 घंटे
> एक रात – 12 घंटे
> एक पक्ष – 15 दिन

एक महीने में दो पक्ष होते हैं, और एक पंचांग वर्ष में बारह महीने होते हैं, या सूर्य की एक पूर्ण कक्षा. एक मनुष्य के जीवित रहने की आशा 100 वर्षों की होती है. यह अनंत समय के माप को नियंत्रित करने का तरीका है.”

ब्रह्म-संहिता (5.52) इस नियंत्रण की पुष्टि इस प्रकार करती है:

यच-चक्षूर एसा सविता सकल-ग्रहणं राजा समस्त-सूर-मूर्तिर असेसा-तेजः
यस्यज्ञाय भ्रामति सम्भृत-काल-चक्रो गोविन्दम् आदि-पुरुषं तं अहं भजमी

“मैं गोविंदा, आदि भगवान, भगवान के परम व्यक्तित्व की पूजा करता हूं, जिनके नियंत्रण में सूर्य भी, जिसे भगवान की आंख माना जाता है, शाश्वत समय की निश्चित कक्षा के भीतर घूमता है। सूर्य सभी ग्रह प्रणालियों का राजा है और इसमें गर्मी और प्रकाश की असीमित क्षमता है।”

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), श्रीमद् भागवतम्, तृतीय सर्ग, खंड 11 – पाठ 1 – 14.

भगवान भौतिक संसार का निर्माण अपनी संतुष्टि के लिए नहीं करते.

भगवान कृष्ण ही परम भगवान का मूल व्यक्तित्व हैं जिनसे तीन रचनात्मक अवतार, अर्थात् पुरुष अवतार–कारणार्णवशायी विष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु और क्षीरोदकशायी विष्णु–विस्तार लेते हैं. संपूर्ण भौतिक रचना प्रभु की बाह्यीय ऊर्जा की छाया में तीन पुरुषों द्वारा क्रमिक चरणों में की जाती है, और इस प्रकार भौतिक प्रकृति उनके द्वारा ही नियंत्रित होती है. भौतिक प्रकृति को स्वतंत्र मानना वैसा ही है जैसे किसी बकरी के गले पर पाई जाने वाली थन के समान थैलियों से दूध पाने की चेष्टा करना. भगवान अनिर्भर और इच्छाहीन हैं. वे अपनी संतुष्टि के लिए भौतिक संसार की रचना नहीं करते जैसे हम अपनी भौतिक इच्छाओंं की पूर्ति के लिए अपने घरेलू प्रसंग पैदा करते हैं. वास्तव में भौतिक संसार अनुकूलित आत्माओं के भ्रामक भोग के लिए बनाया गया है, जो अनादि काल से प्रभु की पारलौकिक सेवा के विरुद्ध हैं. किंतु भौतिक ब्रम्हांड अपने आप में संपूर्ण हैं. भौतिक संसार में पोषण के लिए कोई कमी नहीं है. अपने अल्प ज्ञान के कारण, भौतिकवादी उस समय व्याकुल हो जाते हैं जब पृथ्वी पर स्पष्ट जनसंख्या वृद्धि होती है. अपितु, जब भी पृथ्वी पर कोई जीवित प्राणी होता है, तब प्रभु द्वारा उसके पोषण का प्रबंध तुरंत कर दिया जाता है. पालन-पोषण के लिए जीवित प्राणियों की अन्य जातियों को कभी बाधित नहीं किया जाता, जो मानवों की तुलना में बहुत अधिक हैं; उनकी मृत्यु कभी भूख से नहीं होती. यह केवल मानव समाज है जो खाद्य स्थिति के बारे में परेशान है और, प्रशासनिक कुप्रबंधन के वास्तविक तथ्य को ढाँकने के लिए लिए, इस कुतर्क का आश्रय लेता है कि जनसंख्या अत्यधिक बढ़ रही है. यदि संसार में किसी वस्तु की कमी है तो वह ईश्वर चेतना की है; अन्यथा, भगवान की कृपा से, किसी भी वस्तु की कमी नहीं है.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रमुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), श्रीमद् भागवतम्, तृतीय सर्ग, खंड 5-पाठ 5.

यमराज के धाम में दंड की प्रक्रिया.

प्रत्येक जीव एक सूक्ष्म और स्थूल शरीर से आच्छादित होता है. सूक्ष्म शरीर मन, अहंकार, बुद्धि और चेतना का आवरण होता है. शास्त्रों में कहा गया है कि यमराज के दूत अपराधी के सूक्ष्म शरीर की देख-रेख करते हैं और उसे यमराज के धाम तक ले जाते हैं ताकि उसे उसकी सहन शक्ति के अनुसार दंड दिया जा सके. वह उसके दंड से नहीं मरता क्योंकि यदि वह मृत हो जाए, तो फिर दंड कौन भोगेगा? व्यक्ति को मृत्यु देना यमराज के दूतों का कार्य नहीं है. वास्तव में, किसी जीव की हत्या करना असंभव है क्योंकि वास्तविकता में वह अमर है; उसे बस इंद्रिय संतुष्टि की अपनी गतिविधियों के परिणाम भुगतने होते हैं. चैतन्य चरितामृत में दंड की प्रक्रिया को समझाया गया है. पूर्व में राजा के सैनिक किसी अपराधी को एक नाव से नदी के बीच में ले जाते थे. वे उसके बाल पकड़ कर उसे पानी में डुबोते थे, और जब उसकी साँस लगभग रुक जाती थी, तब राजा के सैनिक उसे पानी से बाहर निकाल लेते थे और उसे कुछ देर के लिए साँस लेने देते थे, और फिर से उसकी साँस रोकने के लिए पानी में डुबोते थे. यमराज द्वारा विस्मृत आत्मा को इस प्रकार का दंड दिया जाता है, जैसा कि आगामी श्लोक में वर्णित किया गया है. इस ग्रह से निकल कर यमराज के ग्रह जाते समय, यमराज के दूतों द्वारा बंदी बनाए गए अपराधी को बहुत से कुत्ते मिलते हैं, जो केवल उसके इंद्रिय तुष्टि के आपराधिक कृत्यों का स्मरण कराने के लिए भौंकते और काटते हैं. भागवद्-गीता में कहा गया है कि जब कोई इंद्रिय संतुष्टि की कामना से पीड़ित होता है तब वह लगभग अंधा हो जाता है और उसकी बुद्धि खो जाती है. वह सबकुछ भूल जाता है. कामैस तैस तैर हृत ज्ञानाः. जब कोई इंद्रिय तुष्टि से बहुत आकृष्ट हो जाता है तब उसकी बुद्धि समाप्त हो जाती है, और वह भूल जाता है कि उसे परिणाम भी भोगने पड़ेंगे. यहाँ यमराज द्वारा भेजे गए कुत्तों के माध्यम से इंद्रिय संतुष्टि की उनकी गतिविधियों का स्मरण करने का अवसर दिया जाता है. जबकि हम स्थूल शरीर में रहते हैं, इंद्रिय संतुष्टि के ऐसे कृत्यों को सरकारी नियमों द्वारा भी प्रोत्साहन दिया जाता है. सारे संसार के सभी राज्यों में, सरकार द्वारा जन्म नियंत्रण के रूप में ऐसे कृत्यों को प्रोत्साहन दिया जाता है. महिलाओं को गोलियाँ दी जाती हैं, और उन्हें गर्भपात में सहयोग के लिए चिकित्सालयों में जाने की अनुमति होती है. यह इंद्रिय संतुष्टि के परिणाम के रूप में ही चल रहा है. वास्तव में यौन जीवन का उद्देश्य एक अच्छी संतान पाना होता है, लेकिन चूँकि लोगों का अपनी इंद्रियों पर कोई नियंत्रण नहीं है और ऐसा कोई संस्थान नहीं है जो उन्हें इंद्रियों पर नियंत्रण सिखाए, बेचारे इंद्रिय तुष्टिकरण के आपराधिक कृत्यों के शिकार बनते हैं, और उन्हें श्रीमद्-भागवतम् के इन पृष्ठों में दिए गए अनुसार मृत्यु के बाद दण्ड मिलता है. अपराधी को तपते सूरज की धूप में गर्म रेत की सड़क को पार करना पड़ता है जिसके दोनों ओर वन की अग्नि होती है. चलने में असमर्थ होने के कारण यमदूतों द्वारा उन्हें पीठ पर को़ड़े मारे जाते हैं, उसे भूख और प्यास सताती है, लेकिन दुर्भाग्य से वहाँ पीने के लिए पानी, कोई आश्रय और सड़क पर विश्राम करने के लिए कोई स्थान नहीं होता. कभी-कभी अपराधी थकान के कारण गिर जाता है, और कुछ बार वह अचेत हो जाता है, लेकिन उसे फिर से उठने के लिए विवश किया जाता है. इस प्रकार से उसे बहुत शीघ्रता से यमराज के सम्मुख ले जाया जाता है. इस प्रकार अपराधी को दो या तीन क्षणों में निन्यानवे सहस्त्र योजन पार करना पड़ते हैं, और फिर उसे तुरंत यातनामय दण्ड दिया जाता है जिसे भुगतना उसके लिए निर्धारित होता है. एक योजन आठ मील का होता है, और उसे ऐसी सड़क को पार करना होता है जो 792,000 मील जितनी लंबी होती है. इतनी लंबी दूरी केवल कुछ ही क्षणों में पार की जाती है. सूक्ष्म शरीर पर दूतों का वर्चस्व होता है ताकि जीव इतनी लंबी दूरी को तेज़ी से पार कर ले और साथ ही यातना भी सहे. यह आवरण, चाहे भौतिक हो, इतने महीन तत्वों से बना होता है कि भौतिक वैज्ञानिक यह पता नहीं कर सकते कि आवरण किस पदार्थ से बने हैं. 792,000 मील कुछ ही क्षणों में पार करना आधुनिक अंतरिक्ष यात्रियों के लिए अचरज हो सकता है. अब तक वे 18,000 मील प्रति घंटे की गति से यात्रा कर चुके हैं, लेकिन यहाँ हम देखते हैं कि एक अपराधी 792,000 मील कुछ ही क्षणों में पार कर लेता है, हालाँकि प्रक्रिया आध्यात्मिक नहीं बल्कि भौतिक है. नर्क में अपराधी को अग्नि में जलते हुए, स्वयं अपना मांस खाना पड़ता है, या अपने समान अन्य लोगों को खाने देना पड़ता है जो वहाँ उपस्थित हैं. पिछले महायुद्ध में, यातना शिविरों में लोगों ने कभी-कभी स्वयं अपना मल खाया था, इसलिए कोई आश्चर्य नहीं है कि यमराज के धाम, यमसदन में, दूसरों का मांस खाकर विलासी जीवन जी चुके व्यक्ति को स्वयं अपना मांस भी खाना पड़ता है. उसकी आँत को नर्क के कुत्तों और गिद्धों द्वारा नोच कर बाहर निकाल लिया जाता है, जबकि वह यह देखने के लिए अभी भी जीवित होता है, और उसे नागों, बिच्छुओं और पिस्सुओं द्वारा पीड़ा सहनी पड़ती है जो उसे काटते हैं. उसके बाद उसके अंगों को काटा जाता है और हाथियों द्वारा चीर कर अलग कर दिया जाता है. उसे पर्वत शिखर से धकेल दिया जाता है, और उसे पानी के भीतर और गुफा में बंदी बनाकर भी रखा जाता है. आधुनिक सभ्यता की गलती यह है कि मानव अगले जन्म में विश्वास नहीं करता. लेकिन भले ही वह विश्वास करे या न करे, अगला जन्म होता है, और यदि व्यक्ति ने वेदों और पुराणों जैसे आधिकारिक शास्त्रों के निषेध के संदर्भ में उत्तरदायी जीवन नहीं जिया है तो उसे पीड़ा भोगना पड़ती है. मानव से निम्नतर जीव अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी नहीं होते क्योंकि उन्हें किसी विशिष्ट विधि से कर्म करने के लिए नहीं बनाया गया है, लेकिन मानव चेतना के उच्चतर जीवन में, यदि कोई अपनी गतिविधियों के लिए उत्तरदायी नहीं होता, तो फिर निश्चित ही उसे नारकीय जीवन मिलने वाला है, जैसा कि यहाँ वर्णन किया गया है.

स्रोत: अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी) “श्रीमद् भागवतम्”, तीसरा सर्ग, खंड 30 – पाठ 20 – 27 और पाठ 30

यहाँ तक कि ब्रम्हा जैसे महान देवता और भगवान शिव भी स्त्री सौंदर्य से मोहित हो जाते हैं.

भगवान ब्रम्हा का अपनी पुत्री पर आकर्षित होना और भगवान शिव का भगवान के मोहिनी रूप पर मोहित हो जाना विशिष्ट उदाहरण हैं, जो हमें निर्देश देते हैं कि ब्रह्मा और भगवान शिव जैसे महान देवता भी नारी की सुंदरता से मोहित हो जाते हैं, तो साधारण बाधित आत्माओं की क्या बात. इसलिए सभी व्यक्तियों के लिए परामर्श है कि उसे अपनी पुत्री या अपनी माँ या अपनी बहन के साथ भी स्वतंत्रापूर्वक मेलजोल नहीं करना चाहिए, क्योंकि इंद्रिय इतनी बलिष्ठ होती हैं कि जब कोई आकर्षण में फंसता है तो इंद्रिया पुत्री, माँ या बहन के संबंध को भी नहीं मानतीं. इसलिए, भक्ति-योग करके इंद्रियों को नियंत्रित करने का अभ्यास करना, मदन-मोहना की सेवा में संलग्न होना ही सर्वश्रेष्ठ है. भगवान कृष्ण का नाम मदन-मोहन है, क्योंकि वे कामदेव या वासना को वश में कर सकते हैं. मदनमोहन की सेवा में संलग्न होकर ही, मदन, कामदेव की मनमानी पर अंकुश लगाया जा सकता है. अन्यथा, इंद्रियों को नियंत्रित करने का प्रयास विफल हो जाएगा.

प्रथम जीवित प्राणी स्वयं ब्रह्मा हैं, और उनसे मारिचि जैसे ऋषि उत्पन्न किए गए थे, जिन्होंने अपनी बारी आने पर कश्यप मुनि और अन्य को उत्पन्न किया, और कश्यप मुनि और मनु ने विभिन्न लोक और मानव आदि की रचना की, लेकिन उनमें से कोई भी नहीं जो स्त्री के रूप में माया के जादू से आकर्षित नहीं हुआ. संपूर्ण भौतिक संसार में ब्रम्हा से प्रारंभ करते हुए, चींटी जैसे छोटे, महत्वहीन प्राणियों तक, हर कोई यौन जीवन से आकर्षित होता है. यही इस भौतिक संसार का मूलभूत सिद्धांत है. भगवान ब्रह्मा का अपनी पुत्री की ओर आकर्षित होना इसका ज्वलंत उदाहरण है कि कोई भी स्त्री के प्रति आकर्षण से नहीं बचता है. इसलिए, नारी बाधित आत्माओं को बंधन में रखने के लिए माया की एक अद्भुत रचना है.

विश्व इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जिसमें कोई महान विजेता किसी क्लियोपेट्रा के आकर्षण में फंस गया. व्यक्ति को स्त्री की मनोरम शक्ति, और पुरुष का उस शक्ति की ओर आकर्षण का अध्ययन करना चाहिए. यह किस स्रोत से उत्पन्न हुआ था? वेदांत-सूत्र के अनुसार, हम समझ सकते हैं कि सब कुछ भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व से उत्पन्न होता है. यह वहाँ पर निर्धारित है, जन्मद्य अस्य यतः. इसका अर्थ है कि भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व या सर्वोच्च व्यक्ति, ब्रह्म, पूर्ण सत्य,ग्राह्यता, आध्यात्मिक संसार में भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व में भी उपस्थित होना चाहिए और भगवान की पारलौकिक लीला में उसका प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए. भगवान परम व्यक्ति, परम पुरुष हैं. जैसे एक सामान्य पुरुष एक स्त्री द्वारा आकर्षित किया जाना चाहता है, वह प्रवृत्ति भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व में समान रूप से मौजूद है. वे भी स्त्री के सौंदर्य से आकर्षित होना चाहता है. अब प्रश्न उठता है कि, यदि वे इस प्रकार के स्त्रियोचित आकर्षण से मोहित होना चाहते हैं, तो क्या वे भौतिक स्त्रियों से आकर्षित होंगे? यह संभव नहीं है. यहां तक कि इस भौतिक अस्तित्व में उपस्थित व्यक्ति भी स्त्री के आकर्षण को त्याग सकते हैं यदि उन्हें परम ब्राम्हण का आकर्षण हो जाए. ऐसा ही हरिदास ठाकुर के साथ हुआ था. बहुत रात्रि में उन्हें एक सुंदर वेश्या ने आकर्षित करने का प्रयास किया था, परंतु चूँकि वे आध्यात्मिक सेवा में, परम भगवान के पारलौकिक प्रेम में रत थे, हरिदास ठाकुर आसक्त नहीं हुए. बल्कि, उन्होंने उस वेश्या को अपनी आध्यात्मिक संगति से एक महान भक्त में परिवर्तित कर दिया. इसलिए यह भौतिक आकर्षण, परम भगवान को निश्चित ही आकर्षित नहीं कर सकता. जब वे किसी स्त्री से आकर्षित होना चाहें, तो उन्हें स्वयं अपनी ऊर्जा से ऐसी स्त्री की रचना करनी होगी. वह स्त्री राधारानी हैं. गोस्वामियों द्वारा समझाया गया है कि राधारानी, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की भोग क्षमता का प्रकटीकरण है. जब परम भगवान पारलौकिक सुख प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें अपने आंतरिक पौरुष शक्ति से एक स्त्री की रचना करनी पड़ती है. इस प्रकार स्त्री सौंदर्य से आकर्षित होने की प्रवृत्ति स्वाभाविक है क्योंकि यह आध्यात्मिक दुनिया में उपस्थित है. भौतिक संसार में इसकी परिलक्षणा विकृत रूप में होती है, और इसलिए बहुत मदांधता व्याप्त है. भौतिक सौंदर्य से आकर्षित होने के स्थान पर, यदि व्यक्ति राधारानी और कृष्ण की सुंदरता से आकर्षित होने का अभ्यस्त हो जाए, तो भगवद्-गीता का कथन, परम दृष्ट्वा निवर्तते, सत्य होता है. जब कोई राधा और कृष्ण की पारलौकिक सुंदरता से आकर्षित हो जाता है, तो फिर वह भौतिक स्त्री सौंदर्य से आकर्षित नहीं होता. राधा-कृष्ण भक्ति में इसका विशेष महत्व है. जिसका प्रमाण यमुनाचार्य देते हैं. वह कहते हैं, “चूँकि मैं राधा और कृष्ण की सुंदरता से आकर्षित हो चुका हूँ, तो जब किसी स्त्री के लिए आकर्षण होता है या किसी स्त्री के साथ यौन जीवन की स्मृति होती है, तो मैं तुरंत उस पर थूकता हूँ, और मैं घृणा से मुख फेर लेता हूँ.” जब हम मदन-मोहन और कृष्ण और उनके सहचरों से आकर्षित होते हैं, तो फिर सीमित जीवन का बंधन, अर्थात किसी भौतिक स्त्री का सौंदर्य हमें आकर्षित नहीं कर सकता.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), "श्रीमद् भागवतम्", तृतीय सर्ग, अध्याय - पाठ 36 से 38

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