यह ब्रम्हांड, या सार्वभौमिक आकाश जिसकी कल्पना हम असंख्य ग्रहों के साथ कर सकते हैं, उसका आकार एक अंडे के समान है. जिस प्रकार अंडा खोल से ढंका होता है, उसी प्रकार ब्रम्हांड भी विभिन्न परतों से ढंका होता है. पहली परत जल, अगली अग्नि, फिर वायु, फिर आकाश, और अंततः सबको पकड़े रखने वाली परत प्रधान है. इस अंडे के समान ब्रम्हांड के भीतर भगवान का सार्वभौमिक स्वरूप विराट-पुरुष होता है. सभी विभिन्न ग्रह स्थितियाँ उनके शरीर के भाग हैं. यह श्रीमद्-भागवतम् की शुरुआत, द्वितीय सर्ग में पहले ही बता दिया गया है. माना जाता है कि ग्रह मण्डल भगवान के सार्वभौमिक रूप के शारीरिक भागों की रचना करते हैं. वे लोग जो भगवान के अलौकिक रूप की पूजा में प्रत्यक्ष भाग नहीं ले सकते, उन्हें इस सार्वभौमिक रूप का ध्यान और पूजा करने का परामर्श दिया जाता है. सबसे निचले ग्रह मण्डल, पाताल को परम भगवान के पैर का तलवा माना जाता है, और पृथ्वी को भगवान का उदर माना जाता है. ब्रम्हलोक, या सर्वोच्च ग्रह मण्डल, जहाँ ब्रम्हा रहते हैं, उसे भगवान की शीर्ष माना जाता है.

इस विराट-पुरुष को भगवान का अवतार माना जाता है. भगवान का मूल स्वरूप कृष्ण है, जैसा कि ब्रम्ह-संहिता: आदि पुरुष में पुष्टि की गई है. विराट-पुरुष भी पुरुष है, लेकिन वह आदि-पुरुष नहीं है. आदि-पुरुष कृष्ण हैं. ईश्वरः परमः कृष्णः सद्-चित-आनंद-विग्रहः अनादिर् आदिर् गोविंदः. भगवत्गीता में कृष्ण को आदि-पुरुष के रूप में भी स्वीकार किया गया है, मौलिक कृष्ण कहते हैं, “मुझसे उच्चतर कोई भी नहीं है”. भगवान के असंख्य विस्तार हैं, और वे सभी पुरुष, या भोक्ता हैं, लेकिन न तो विराट-पुरुष और न ही पुरुष-अवतार-कारणोदकशायी विष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु और क्षीरोदकशायी विष्णु– न ही कई अन्य विस्तार, मौलिक हैं. प्रत्येक ब्रम्हांड में गर्भोदकशायी विष्णु, विराटपुरुष और क्षीरोदकशायी विष्णु होते हैं. विराट-पुरुष की सक्रिय उत्पत्ति का वर्णन यहाँ किया गया है. जो लोग परम भगवान के व्यक्तित्व के बारे में निचले स्तर की समझ रखते हैं, वे भगवान के सार्वभौमिक रूप का विचार कर सकते हैं, क्योंकि भागवतम् में ऐसा परामर्श किया गया है.

यहाँ ब्रम्हांड के आकार का अनुमान लगाया गया है. बाहरी आवरण जल, वायु, अग्नि, आकाश, अहम् और महत्-तत्व की परतों से बना हुआ है, और हरेक परत पिछली परत से दस गुना विशाल है. ब्रम्हांड के खोखल में व्याप्त अंतरिक्ष को किसी भी मानव वैज्ञानिक या किसी के भी द्वारा मापा नहीं जा सकता, और उस खोखल के आगे सात आवरण हैं, और प्रत्येक आवरण पहले वाले आवरण से दस गुना बड़ा है. जल की परत ब्रम्हांड के आकार से दस गुना बड़ी है, और अग्नि की परत, जल की परत से दस गुना बड़ी है. इसी प्रकार, वायु की परत, अग्नि की परत से दस गुना बड़ी है. ये आकार किसी भी मानव मात्र के छोटे से मष्तिष्क द्वारा कल्पनीय नहीं हैं.

यह भी कहा गया है कि यह विवरण केवल एक अंडे सदृश ब्रम्हांड का है. इस एक के अतिरिक्त असंख्य ब्रम्हांड हैं, और उनमें से कुछ कई-कई गुना बड़े हैं. वास्तव में, यह माना जाता है, कि यह ब्रम्हांड सबसे छोट है; इसलिए पूर्ववर्ती अधीक्षक, या ब्रह्म, के प्रबंधन के लिए केवल चार शीर्ष हैं. अन्य ब्रम्हांडों में, जो इससे बहुत बड़े हैं, ब्रम्हा के अधिक शीर्ष हैं. चैतन्य-चरितामृत में यह कहा गया है कि छोटे ब्रम्हा के अनुरोधप एक दिन इन सभी ब्रम्हाओं को भगवान कृष्ण द्वारा बुलाया गया, जो सभी बड़े ब्रह्माओं को देखने के बाद अचंभित थे. ये भगवान की अकल्पनीय शक्ति है. अनुमान द्वारा या भगवान की झूठी पहचान से कोई भी भगवान की लंबाई और चौड़ाई को नहीं माप सकता. ये सारे प्रयास विक्षिप्तता के लक्षण हैं.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद्भागवतम्”, तृतीय सर्ग, अध्याय 26 - पाठ 52.
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