हम वास्तव में मरते नहीं हैं. मृत्यु के समय, हम बस कुछ समय के लिए निष्क्रिय रखे जाते हैं, जैसे नींद के दौरान होते हैं. रात्रि में हम सो जाते हैं, और हमारी सारी गतिविधियाँ बंद हो जाती हैं, लेकिन जैसे ही हम जागते हैं, हमारी स्मृति तुरंत लौट आती है, और हम सोचते हैं, “ओह, मैं कहाँ हूँ? मुझे क्या करना होगा?” इसे सुप्तोत्थित-न्याय कहा जाता है. मान लीजिए हम मर जाते हैं. “मरने” का अर्थ है कि हम कुछ समय के लिए निष्क्रिय हो जाते हैं और फिर से अपनी गतिविधियों को शुरू करते हैं. यह प्रत्येक जीवन के बाद बारंबार हमारे कर्म, या गतिविधियों, और स्वभाव, या प्रकृति द्वारा संगति के अनुसार होता है. अब, मानव जीवन में, यदि हम अपने आध्यात्मिक जीवन की गतिविधि शुरू करके स्वयं को तैयार करते हैं, तो हम अपने वास्तविक जीवन में लौट आते हैं और पूर्णता प्राप्त करते हैं. अन्यथा, कर्म, स्वभाव, प्रकृति आदि के अनुसार, हमारे जीवन और गतिविधि की विविधताएँ जारी रहती हैं, और इसी तरह हमारे जन्म और मृत्यु भी होते हैं. जैसा भक्तिविनोद ठाकुर ने समझाया है, मायारा वशे, याचा भेसे’, खाच्चा हबुडुबु भाई: “मेरे प्यारे भाइयों, तुम माया की लहरों में बहे क्यों जा रहे हो?” व्यक्ति को आध्यात्मिक धरातल पर आना चाहिए, और तब उसकी गतिविधियाँ स्थायी होंगी. कृत-पुण्य-पुंजः : यह अवस्था तब प्राप्त होती है जब व्यक्ति अनेक जन्मों के लिए पवित्र कर्मों का फल संचित कर लेता है. जन्म-कोटि-सुकृतैर न लभ्यते (सीसी. मध्य 8.70). कृष्ण भावनामृत आंदोलन कोटि-जन्म, बार-बार जन्म और मृत्यु को रोकना चाहता है. व्यक्ति को एक जन्म में सब कुछ ठीक करके स्थायी जीवन में आ जाना चाहिए. यही कृष्ण भावनामृत है.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), श्रीमद् भागवतम्, दसवाँ सर्ग, अध्याय 13 – पाठ 58

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