“ठीक वैसे जैसे संपूर्णता में मानव जीवन का एक महान और गंभीर उद्देश्य होता है – अर्थात् आध्यात्मिक मुक्ति – आधारभूत मानव संस्थाओं जैसे विवाह और संतान का पालन भी महान उद्देश्य को समर्पित होना चाहिए। दुर्भाग्यवश, वर्तमान समय में यौन आवेग की संतुष्टि विवाह के लिए, यदि अनन्य नहीं, तो प्रधान कारण बन गई है।

यौन आवेग, जो लगभग सभी प्रजातियों के नर और मादा को, और उच्चतर प्रजातियों में भावनात्मक रूप से भी शारीरिक मिलन करने के लिए प्रेरित करता है, वह अंततः एक प्राकृतिक उत्कंठा नहीं है, क्योंकि वह शरीर के साथ आत्म की अस्वाभाविक पहचान पर आधारित नहीं है। स्वयं जीवन एक आध्यात्मिक परिघटना है। वह आत्मा ही है जो जीवित रहती है और शरीर नामक जैविक मशीन को प्रत्यक्ष जीवन देती है। चेतना आत्मा की प्रकट ऊर्जा है, और इस प्रकार चेतना, जागरूकता स्वयं में, मूलतः एक संपूर्ण आध्यात्मिक घटना है। जब जीवन, या चेतना, एक जैविक मशीन में सीमित रहता है और असत्य रूप से स्वयं को मशीन समझता है, तो भौतिक अस्तित्व जन्म लेता है और यौन इच्छा जागती है।

भगवान चाहते हैं कि मानव जीवन हमारे लिए अस्तित्व की इस भ्रामक अवस्था को सुधारने और शुद्ध, ईश्वरीय अस्तित्व की विशाल संतुष्टि की ओर लौटने का अवसर बने. किंतु चूँकि भौतिक शरीर से हमारी पहचान एक लंबा ऐतिहासिक प्रसंग है, अधिकतर लोगों के लिए भौतिक रूप से ढले हुए चित्त की माँग से तुरंत मुक्त हो जाना कठिन होता है। इसलिए वैदिक शास्त्र पवित्र विवाह का सुझाव देते हैं, जिसमें एक तथाकथित पुरुष और एक तथाकथित स्त्री, व्यापक धार्मिक निषेधाज्ञा से आश्रित एक नियंत्रित, आध्यात्मिक विवाह में मिलन कर सकते हैं। इस प्रकार से आत्म-साक्षात्कार का प्रत्याशी जिसने पारिवारिक जीवन का चयन किया है वह धार्मिक आज्ञाओं का पालन करते हुए अपनी इंद्रियों के लिए पर्याप्त संतुष्टि अर्जित कर सकता है और साथ ही अपने हृदय में स्थित भगवान को प्रसन्न कर सकता है।

कलि-युग में यह गहरी समझ लगभग खो गई है, और, जैसा इस श्लोक मे कहा गया है, पुरुष और स्त्री पशुओं की तरह मिलन करते हैं, केवल माँस, अस्थि, त्वचा, रक्त इत्यादि से बने शरीरों के परस्पर आकर्षण के आधार पर। दूसरे शब्दों में, हमारे आधुनिक, भगवान रहित समाज में मानवता की क्षीण, सतही बुद्धि अमर आत्मा की स्थूल भौतिक आवरण से आगे कदाचित् ही देख पाती है, और इस प्रकार अधिकतर प्रसंगों में पारिवारिक जीवन ने अपने उच्चतम उद्देश्य और मूल्य खो दिए हैं।

इस श्लोक में स्थापित एक परिणामी बिंदु यह है कि कलियुग में किसी स्त्री को “”एक अच्छी स्त्री”” तब माना जाता है यदि वह कामुक रूप से आकर्षक हो और वास्तव में कामुक रूप से कुशल हो। इसी प्रकार, किसी कामुक रूप से आकर्षक पुरुष को “”एक अच्छा पुरुष”” माना जाता है। इस सतहीपन का सर्वश्रेष्ण उदाहरण बीसवीं शताब्दी के लोगों द्वारा भौतिकवादी फ़िल्मी सितारों, संगीत सितारों और मनोरंजन उद्योग के अन्य व्यक्तियों को आश्चर्यजनक रूप से दिया जाने वाला महत्व है। वास्तव में, विभिन्न प्रकार के शरीरों के साथ यौन अनुभव का पीछा करना नई बोतल से पुरानी मदिरा पीने के समान है। किंतु कलि-युग में कुछ लोग इसे समझ सकते हैं।”

स्रोत – अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद भागवतम”, बारहवाँ सर्ग, अध्याय 2 – पाठ 3.

(Visited 45 times, 1 visits today)
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •