भगवान ब्रम्हा का अपनी पुत्री पर आकर्षित होना और भगवान शिव का भगवान के मोहिनी रूप पर मोहित हो जाना विशिष्ट उदाहरण हैं, जो हमें निर्देश देते हैं कि ब्रह्मा और भगवान शिव जैसे महान देवता भी नारी की सुंदरता से मोहित हो जाते हैं, तो साधारण बाधित आत्माओं की क्या बात. इसलिए सभी व्यक्तियों के लिए परामर्श है कि उसे अपनी पुत्री या अपनी माँ या अपनी बहन के साथ भी स्वतंत्रापूर्वक मेलजोल नहीं करना चाहिए, क्योंकि इंद्रिय इतनी बलिष्ठ होती हैं कि जब कोई आकर्षण में फंसता है तो इंद्रिया पुत्री, माँ या बहन के संबंध को भी नहीं मानतीं. इसलिए, भक्ति-योग करके इंद्रियों को नियंत्रित करने का अभ्यास करना, मदन-मोहना की सेवा में संलग्न होना ही सर्वश्रेष्ठ है. भगवान कृष्ण का नाम मदन-मोहन है, क्योंकि वे कामदेव या वासना को वश में कर सकते हैं. मदनमोहन की सेवा में संलग्न होकर ही, मदन, कामदेव की मनमानी पर अंकुश लगाया जा सकता है. अन्यथा, इंद्रियों को नियंत्रित करने का प्रयास विफल हो जाएगा.

प्रथम जीवित प्राणी स्वयं ब्रह्मा हैं, और उनसे मारिचि जैसे ऋषि उत्पन्न किए गए थे, जिन्होंने अपनी बारी आने पर कश्यप मुनि और अन्य को उत्पन्न किया, और कश्यप मुनि और मनु ने विभिन्न लोक और मानव आदि की रचना की, लेकिन उनमें से कोई भी नहीं जो स्त्री के रूप में माया के जादू से आकर्षित नहीं हुआ. संपूर्ण भौतिक संसार में ब्रम्हा से प्रारंभ करते हुए, चींटी जैसे छोटे, महत्वहीन प्राणियों तक, हर कोई यौन जीवन से आकर्षित होता है. यही इस भौतिक संसार का मूलभूत सिद्धांत है. भगवान ब्रह्मा का अपनी पुत्री की ओर आकर्षित होना इसका ज्वलंत उदाहरण है कि कोई भी स्त्री के प्रति आकर्षण से नहीं बचता है. इसलिए, नारी बाधित आत्माओं को बंधन में रखने के लिए माया की एक अद्भुत रचना है.

विश्व इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जिसमें कोई महान विजेता किसी क्लियोपेट्रा के आकर्षण में फंस गया. व्यक्ति को स्त्री की मनोरम शक्ति, और पुरुष का उस शक्ति की ओर आकर्षण का अध्ययन करना चाहिए. यह किस स्रोत से उत्पन्न हुआ था? वेदांत-सूत्र के अनुसार, हम समझ सकते हैं कि सब कुछ भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व से उत्पन्न होता है. यह वहाँ पर निर्धारित है, जन्मद्य अस्य यतः. इसका अर्थ है कि भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व या सर्वोच्च व्यक्ति, ब्रह्म, पूर्ण सत्य,ग्राह्यता, आध्यात्मिक संसार में भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व में भी उपस्थित होना चाहिए और भगवान की पारलौकिक लीला में उसका प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए. भगवान परम व्यक्ति, परम पुरुष हैं. जैसे एक सामान्य पुरुष एक स्त्री द्वारा आकर्षित किया जाना चाहता है, वह प्रवृत्ति भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व में समान रूप से मौजूद है. वे भी स्त्री के सौंदर्य से आकर्षित होना चाहता है. अब प्रश्न उठता है कि, यदि वे इस प्रकार के स्त्रियोचित आकर्षण से मोहित होना चाहते हैं, तो क्या वे भौतिक स्त्रियों से आकर्षित होंगे? यह संभव नहीं है. यहां तक कि इस भौतिक अस्तित्व में उपस्थित व्यक्ति भी स्त्री के आकर्षण को त्याग सकते हैं यदि उन्हें परम ब्राम्हण का आकर्षण हो जाए. ऐसा ही हरिदास ठाकुर के साथ हुआ था. बहुत रात्रि में उन्हें एक सुंदर वेश्या ने आकर्षित करने का प्रयास किया था, परंतु चूँकि वे आध्यात्मिक सेवा में, परम भगवान के पारलौकिक प्रेम में रत थे, हरिदास ठाकुर आसक्त नहीं हुए. बल्कि, उन्होंने उस वेश्या को अपनी आध्यात्मिक संगति से एक महान भक्त में परिवर्तित कर दिया. इसलिए यह भौतिक आकर्षण, परम भगवान को निश्चित ही आकर्षित नहीं कर सकता. जब वे किसी स्त्री से आकर्षित होना चाहें, तो उन्हें स्वयं अपनी ऊर्जा से ऐसी स्त्री की रचना करनी होगी. वह स्त्री राधारानी हैं. गोस्वामियों द्वारा समझाया गया है कि राधारानी, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की भोग क्षमता का प्रकटीकरण है. जब परम भगवान पारलौकिक सुख प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें अपने आंतरिक पौरुष शक्ति से एक स्त्री की रचना करनी पड़ती है. इस प्रकार स्त्री सौंदर्य से आकर्षित होने की प्रवृत्ति स्वाभाविक है क्योंकि यह आध्यात्मिक दुनिया में उपस्थित है. भौतिक संसार में इसकी परिलक्षणा विकृत रूप में होती है, और इसलिए बहुत मदांधता व्याप्त है. भौतिक सौंदर्य से आकर्षित होने के स्थान पर, यदि व्यक्ति राधारानी और कृष्ण की सुंदरता से आकर्षित होने का अभ्यस्त हो जाए, तो भगवद्-गीता का कथन, परम दृष्ट्वा निवर्तते, सत्य होता है. जब कोई राधा और कृष्ण की पारलौकिक सुंदरता से आकर्षित हो जाता है, तो फिर वह भौतिक स्त्री सौंदर्य से आकर्षित नहीं होता. राधा-कृष्ण भक्ति में इसका विशेष महत्व है. जिसका प्रमाण यमुनाचार्य देते हैं. वह कहते हैं, “चूँकि मैं राधा और कृष्ण की सुंदरता से आकर्षित हो चुका हूँ, तो जब किसी स्त्री के लिए आकर्षण होता है या किसी स्त्री के साथ यौन जीवन की स्मृति होती है, तो मैं तुरंत उस पर थूकता हूँ, और मैं घृणा से मुख फेर लेता हूँ.” जब हम मदन-मोहन और कृष्ण और उनके सहचरों से आकर्षित होते हैं, तो फिर सीमित जीवन का बंधन, अर्थात किसी भौतिक स्त्री का सौंदर्य हमें आकर्षित नहीं कर सकता.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), "श्रीमद् भागवतम्", तृतीय सर्ग, अध्याय - पाठ 36 से 38
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