इस मानव जीवन का उद्देश्य मुक्ति के मार्ग पर प्रगति करना है. उसे अपवर्ग कहा जाता है, बंधनों से स्वतंत्रता. हम सभी बंधनों में बंधे हैं. हमारे द्वारा भौतिक शरीर का स्वीकार का अर्थ ही है कि हम बंधन में हैं. किंतु हमें बंधन की प्रक्रिया में प्रगति नहीं करनी चाहिए. उस प्रक्रिया का नाम कर्म है. जब तक शरीर कर्म में रत है, हमें भौतिक शरीर को स्वीकार करना पड़ेगा. मृत्यु के समय पर, हो सकता है हमारे मस्तिष्क मे विचार आए, “ओह, मैं यह कार्य पूरा नहीं कर सका. ओह, मैं मर रहा हूँ! मुझे यह करना है. मुझे वह करना है.” इसका अर्थ यह है कि कृष्ण हमें यह करने का एक और अवसर देंगे, और इसलिए हमें एक और शरीर को स्वीकार करना होगा. वह हमें अवसर देंगे “ठीक है. तुम यह नहीं कर सके. अब कर लो. यह शरीर ले लो.”

जब तक हमारे पास किसी एक या दूसरे ढंग से प्रसन्न बने रहने के विचार का थोड़ा सा भी तनाव है, तब तक हमें भौतिक शरीर को स्वीकार करना होगा. प्रकृति इतनी दयालु है कि हम इस भौतिक दुनिया का आनंद जिस तरह से लेना चाहते हैं, उसके अनुसार वह हमें प्रभु के निर्देशन में एक उपयुक्त शरीर देगी. चूँकि भगवान सबके हृदय में स्थित हैं, वे सब कुछ जानते हैं. इसलिए, यह जानते हुए कि हम अभी भी कोई सांसारिक वस्तु चाहते हैं, वह हमें एक और भौतिक शरीर प्रदान करेंगे: “हाँ, ले लो.” कृष्ण चाहते हैं कि हमारे पास पूरा अनुभव हो जिससे हम यह समझ सकें कि भौतिक लाभ से हम कभी प्रसन्न नहीं होंगे. यह कृष्ण की इच्छा है.

अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण – अग्रेज़ी), “रानी कुंती की शिक्षाएँ”, पृष्ठ 68
अभय चरणारविंद स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण – अग्रेज़ी), “आत्म साक्षात्कार का विज्ञान”, पृष्ठ 160

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