वेदों में वर्णित एक व्यवस्थित पारिवारिक जीवन एक गैर-जिम्मेदार पापी जीवन से श्रेष्ठ है. यदि कोई पति-पत्नी कृष्ण चेतना में एक साथ रहते हैं और शांति से साथ रहते हैं, तो यह बहुत अच्छा है. हालाँकि, यदि पति अपनी पत्नी से बहुत अधिक आकर्षित हो जाता है और जीवन में अपने कर्तव्य को भूल जाता है, तो भौतिकवादी जीवन के उलझाव फिर से शुरू हो जाएंगे. इसलिए श्रील रूप गोस्वामी ने अनासक्त विषयन (भक्ति-रसामृत-सिंधु 1.2.255) का सुझाव दिया है. काम वासना में लिप्त हुए बिना, पति और पत्नी आध्यात्मिक जीवन की प्रगति के लिए साथ में रह सकते हैं. पति को आध्यात्मिक सेवा में संलग्न होना चाहिए, और पत्नी को वैदिक आज्ञा के अनुसार विश्वास योग्य और धार्मिक होना चाहिए. ऐसा संयोजन बहुत अच्छा होता है. हालाँकि, यदि पति संभोग के दौरान पत्नी के प्रति बहुत अधिक आकर्षित होता है, तो स्थिति बहुत खतरनाक हो जाती है. सामान्य रूप से स्त्रियाँ बहुत अधिक यौन प्रवृत्त होती हैं. वास्तव में, यह कहा जाता है कि एक स्त्री की काम वासना पुरुष की तुलना में नौ गुना अधिक प्रबल होती है. इसलिए एक पुरुष का यह कर्तव्य है कि वह स्त्री को संतुष्ट करके, उसे गहने, अच्छा भोजन और कपड़े देकर, और उसे धार्मिक गतिविधियों में संलग्न करते हुए अपने नियंत्रण में रखे. निस्संदेह, एक स्त्री के कुछ बच्चे होने चाहिए और इस तरह वह पुरुष के लिए व्यवधान नहीं होनी चाहिए. दुर्भाग्यवश, यदि पुरुष केवल संभोग के आनंद के लिए स्त्री से आकर्षित होता है, तो पारिवारिक जीवन घृणित हो जाता है.

महान राजनीतिज्ञ चाणक्य पंडित ने कहा है: भार्या रूपवती शत्रुः–रूपवती पत्नी शत्रु होती है. वास्तव में प्रत्येक स्त्री अपने पति की दृष्टि में सुंदर ही होती है. हो सकता है अन्य लोग उसे बहुत सुंदर न मानें, लेकिन पति, उससे बहुत आकर्षित होने के कारण, उसे हमेशा बहुत सुंदर पाता है. यदि पति अपनी पत्नी को बहुत सुंदर समझता है तो यह समझना चाहिए कि वह उसके प्रति बहुत आकर्षित है. यह आकर्षण यौन आकर्षण ही है. समस्त संसार भौतिक प्रकृति के दो प्रकारों रजो-गुण (वासना) और तमो-गुण (अज्ञान) के वश में है. सामान्तः स्त्रियाँ बहुत आवेगपूर्ण होती हैं और कम बुद्धिमान होती हैं; इसलिए किसी भी प्रकार से किसी भी व्यक्ति को अपने आवेगों और अज्ञान के नियंत्रण में नहीं रहना चाहिए. भक्ति-योग, या आध्यात्मिक सेवा करके, व्यक्ति को अच्छाई के स्तर तक उठाया जा सकता है. यदि साधुता की अवस्था में स्थित पति अपनी पत्नी पर नियंत्रण रख सके, जो वासना और अज्ञानता के वश में है, तो स्त्री का लाभ होगा. वासना और अज्ञानता के लिए अपने प्राकृतिक झुकाव को भूलकर, स्त्री अपने पति के लिए आज्ञाकारी और वफादार बन जाती है, जो साधुता की स्थिति में है. ऐसा जीवन बहुत स्वागत योग्य हो जाता है. तब पुरुष और स्त्री की बुद्धिमत्ता बहुत अच्छी तरह से एक साथ कार्य कर सकते हैं, और वे आध्यात्मिक साक्षात्कार की दिशा में एक साथ प्रगति के पथ पर बढ़ सकते हैं. अन्यथा, पत्नी के नियंत्रण में आकर पति साधुता के अपने गुण को खो देता है और वासना और अज्ञान के गुणों के अधीन हो जाता है. इस प्रकार स्थिति प्रदूषित हो जाती है.

निष्कर्ष यह है कि एक गृहस्थ जीवन उत्तरदायित्व से रहित पापमय जीवन से श्रेष्ठ है, लेकिन यदि गृहस्थ जीवन में पति, पत्नी के अधीन हो जाता है, तो भौतिकवादी जीवन में भागीदारी फिर से प्रमुख हो जाती है. इस प्रकार पुरुष का भौतिक बंधन बढ़ जाता है. इसके कारण ही, वैदिक प्रणाली के अनुसार, व्यक्ति को एक निश्चित आयु के बाद वानप्रस्थ और संन्यास के चरणों के लिए अपने पारिवारिक जीवन को छोड़ने का सुझाव दिया जाता है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), "श्रीमद् भागवतम्", चौथा सर्ग, अध्याय 27 - पाठ 01
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