व्यक्ति स्त्री के बारे में विचार करना नहीं छोड़ सकता, क्योंकि इस प्रकार विचार करना प्राकृतिक होता है; भले ही सड़क पर चल रहे हों, व्यक्ति बहुत सी स्त्रियाँ देखेगा. यद्यपि, यदि व्यक्ति स्त्री के साथ न रहने के लिए कृतसंकल्प हो, तो वह स्त्री को देखकर भी कामुक नहीं बनेगा. यदि व्यक्ति संभोग न करने की ठान ले, तो वह स्वयमेव कामुक इच्छाओं पर विजय पा सकता है. इस संबंध में यह उदाहरण दिया गया है कि यदि भले ही कोई भूखा हो, यदि किसी अमुक दिन उसने उपवास करना ठाना है, वह स्वाभाविक रूप से भूख और प्यास के व्यवधान पर विजय पा लेगा.

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 15 – पाठ 22

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