“भगवद्-गीता (7.11) में कहा गया है: धर्मविरुद्धौ भूतेषु कामो’स्मि भारतर्षभ. यौन संबंध की आज्ञा केवल संतान प्राप्ति के लिए है, भोग के लिए नहीं. व्यक्ति परिवार, समाज और संसार के लाभ के लिए एक उत्तम संतान की प्राप्ति हेतु मैथुन में रत हो सकता है. अन्यथा यौन संबंध धार्मिक जीवन के नियमों के विरुद्ध है. एक भौतिकवादी व्यक्ति विश्वास नहीं करता कि प्रकृति में सभी वस्तुओं का प्रबंधन किया जाता है, और वह नहीं जानता कि यदि व्यक्ति कुछ गलत करता है, तो विभिन्न देवता उसके साक्षी होते हैं. कोई व्यक्ति अवैध मैथुन का आनंद लेता है, और अपनी अंधी, वासना के कारण वह सोचता है कि कोई भी उसे नहीं देख सकता है, परंतु इस अवैध मैथुन को भगवान के परम व्यक्तित्व के प्रतिनिधि पूर्णता से देख लेते हैं. इस प्रकार व्यक्ति को कई तरीकों से दंडित किया जाता है. वर्तमान में कलयुग में अवैध मैथुन के कारण कई गर्भधारण होते हैं, और कभी-कभी गर्भपात भी हो जाता है. भगवान के परम व्यक्तित्व के प्रतिनिधि इन पापमयी गतिविधियों के साक्षी होते हैं, और ऐसी परिस्थिति का निर्माण करने वाले पुरुष और स्त्री को भविष्य में भौतिक प्रकृति के कठोर नियमों द्वारा दंडित किया जाता है (दैवी ह्य एषा गुण-मयी मम माया दुरात्यय). अवैध मैथुन को कभी क्षमा नहीं किया जाता, और जो इसमें भाग लेते हैं उन्हें जीवनांतर तक दंडित किया जाता है. जैसा कि भगवद-गीता (16.20) में पुष्टि की गई है:

असुरिम् योनिम् आपन्न मुधा जन्मानि जन्मानि
मम अप्रप्यैव कौन्तेय ततो यन्त्य अधमम गतिम्

“पैशाचिक जीवन की प्रजाति में बारंबार जन्म लेने वाले व्यक्ति मुझ तक कभी नहीं पहुँच सकते. धीरे-धीरे वे सबसे घृणित प्रकार के अस्तित्व तक पतित हो जाते हैं.” भगवान का परम व्यक्तित्व किसी को भी प्रकृति के कठोर नियमों के विरुद्ध व्यवहार नहीं करने देता; इसलिए अवैध यौन संबंध का दंड जन्म-जन्मांतरों तक दिया जाता है. अवैध यौन संबंध से गर्भधारण होते हैं, और ये अनचाहे गर्भधारण गर्भपात की ओर ले जाते हैं. इसमें शामिल व्यक्ति इन पापों के भागी होते हैं, इतने अधिक कि उन्हें आगामी जीवन में भी इसी समान दंडित किया जाता है. अतः अगले जीवन में वे भी किसी माता के गर्भ में प्रवेश लेते हैं और उसी विधि से मार दिए जाते हैं. कृष्ण चेतना के पारलौकिक स्तर पर रहते हुए इन सभी चीज़ों से बचा जा सकता है. इस विधि से व्यक्ति पापमय गतिविधियाँ नहीं करता. अवैध यौन संबंध वासना के कारण सर्वाधिक प्रचलित है. जब व्यक्ति कामना की अवस्था से संबंध बनाता है, तब वह जन्म जन्मांतर के लिए कष्टों में फँस जाता है. ”

 

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, पाँचवाँ सर्ग, अध्याय 14 – पाठ 09

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