भगवान कृष्ण ही परम भगवान का मूल व्यक्तित्व हैं जिनसे तीन रचनात्मक अवतार, अर्थात् पुरुष अवतार–कारणार्णवशायी विष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु और क्षीरोदकशायी विष्णु–विस्तार लेते हैं. संपूर्ण भौतिक रचना प्रभु की बाह्यीय ऊर्जा की छाया में तीन पुरुषों द्वारा क्रमिक चरणों में की जाती है, और इस प्रकार भौतिक प्रकृति उनके द्वारा ही नियंत्रित होती है. भौतिक प्रकृति को स्वतंत्र मानना वैसा ही है जैसे किसी बकरी के गले पर पाई जाने वाली थन के समान थैलियों से दूध पाने की चेष्टा करना. भगवान अनिर्भर और इच्छाहीन हैं. वे अपनी संतुष्टि के लिए भौतिक संसार की रचना नहीं करते जैसे हम अपनी भौतिक इच्छाओंं की पूर्ति के लिए अपने घरेलू प्रसंग पैदा करते हैं. वास्तव में भौतिक संसार अनुकूलित आत्माओं के भ्रामक भोग के लिए बनाया गया है, जो अनादि काल से प्रभु की पारलौकिक सेवा के विरुद्ध हैं. किंतु भौतिक ब्रम्हांड अपने आप में संपूर्ण हैं. भौतिक संसार में पोषण के लिए कोई कमी नहीं है. अपने अल्प ज्ञान के कारण, भौतिकवादी उस समय व्याकुल हो जाते हैं जब पृथ्वी पर स्पष्ट जनसंख्या वृद्धि होती है. अपितु, जब भी पृथ्वी पर कोई जीवित प्राणी होता है, तब प्रभु द्वारा उसके पोषण का प्रबंध तुरंत कर दिया जाता है. पालन-पोषण के लिए जीवित प्राणियों की अन्य जातियों को कभी बाधित नहीं किया जाता, जो मानवों की तुलना में बहुत अधिक हैं; उनकी मृत्यु कभी भूख से नहीं होती. यह केवल मानव समाज है जो खाद्य स्थिति के बारे में परेशान है और, प्रशासनिक कुप्रबंधन के वास्तविक तथ्य को ढाँकने के लिए लिए, इस कुतर्क का आश्रय लेता है कि जनसंख्या अत्यधिक बढ़ रही है. यदि संसार में किसी वस्तु की कमी है तो वह ईश्वर चेतना की है; अन्यथा, भगवान की कृपा से, किसी भी वस्तु की कमी नहीं है.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रमुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), श्रीमद् भागवतम्, तृतीय सर्ग, खंड 5-पाठ 5.
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