काम-कस्माल-चेतसः यह भी इंगित करता है कि प्रकृति के नियमों द्वारा मानव के जीवन में अप्रतिबंधित इन्द्रिय भोग की अनुमति नहीं है. यदि कोई व्यक्ति अप्रतिबंधित रूप से इंद्रिय भोग में रत रहता है, तो वह पापमय जीवन जीता है. पशु प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं करते हैं. उदाहरण के लिए, वर्ष के कुछ विशिष्ट महीनों के दौरान पशुओं में यौन आवेग बहुत प्रबल होता है. सिंह बहुत ताकतवर होता है. वह एक मांसाहारी और बहुत बलशाली होता है, लेकिन वह साल में केवल एक बार संभोग का आनंद लेता है. इसी प्रकार से, धार्मिक निषेधाज्ञा के अनुसार, पुरुष, पत्नी के मासिक धर्म के बाद, महीने में केवल एक बार संभोग का आनंद लेने के लिए प्रतिबंधित होता है, और यदि पत्नी गर्भवती है, तो उसे संभोग की अनुमति बिल्कुल नहीं है. मानव के लिए यही नियम है. पुरुष को एक से अधिक पत्नी रखने का अनुमति है क्योंकि पत्नी के गर्भवती होने पर वह संभोग का सुख नहीं ले सकता. ऐसे समय में वह यदि संभोग सुख लेना चाहता है, तो वह दूसरी पत्नी के पास जा सकता है जो गर्भवती नहीं हो. ये मनु-संहिता और अन्य शास्त्रों में उल्लिखित नियम हैं.

ये नियम और शास्त्र मनुष्य के लिए ही हैं. इस प्रकार, अगर कोई इन नियमों का उल्लंघन करता है, तो वह पापी हो जाता है. निष्कर्ष यह है कि अप्रतिबंधित इंद्रिय भोग का अर्थ है पापमय गतिविधियाँ. अनुचित संभोग वह संभोग है जो शास्त्रों में दिए गए नियमों का उल्लंघन करता है.जब कोई शास्त्र, या वेदों के नियमों का उल्लंघन करता है, तो वह पापमय कर्म करता है. जो पापमय कर्मों में लिप्त है, वह अपनी चेतना नहीं बदल सकता है. हमारा असली कार्य है कि हम अपनी चेतना को कस्मला, पापी चेतना से, परम शुद्ध कृष्ण में बदल दें. जैसा कि भगवद्-गीता (परम ब्रह्म परम धाम पवित्रम परम भवन) में पुष्टि की गई है, कृष्ण परम शुद्ध हैं, और यदि हम अपनी चेतना को भौतिक भोग से कृष्ण में बदल लेते हैं, तो हम शुद्ध हो जाते हैं.यह भगवान चैतन्य महाप्रभु द्वारा सुझाई गई प्रक्रिया है, जो कि हृदय के दर्पण की शुद्धि के रूप में चेतो-दर्पणमर्जनम की प्रक्रिया है.

स्रोत: अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), "श्रीमद् भागवतम्", चौथा सर्ग, अध्याय 27 - पाठ 05
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