चूँकि जीव शुद्ध आत्मा होता है, सटीक ज्ञान और आनंद से सहज रूप से भरा होता है, और चूँकि भौतिक शरीर ज्ञान या व्यक्तिगत चेतना से रहित एक जैवरासायनिक मशीन होता है, तब कौन या क्या वास्तव में इस भौतिक अस्तित्व की अज्ञानता और चिंता का अनुभव कर रहा है? भौतिक जीवन के सचेतन अनुभव को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है, और इस प्रकार उद्धव ने भगवान कृष्ण से यह प्रश्न पूछा ताकि वे उस प्रक्रिया की अधिक सटीक समझ प्राप्त कर सकें जिससे भ्रम उत्पन्न होता है। आत्मा अक्षय, पारलौकिक, शुद्ध, स्वयं-प्रकाशमान होता है और कभी भी किसी भौतिक वस्तु से आच्छादित नहीं होता है। यह अग्नि के समान है, जो कभी भी अंधकार से आच्छादित नहीं हो सकती क्योंकि अग्नि स्वभाव से ही प्रकाशमान होती है। इसी प्रकार, आत्मा स्वयं-ज्योति: या स्वयं-प्रकाशमान होता है, और इस प्रकार आत्मा दिव्य है – वह कभी भी भौतिक जीवन के अंधकार से आच्छादित नहीं हो सकता है। दूसरी ओर, भौतिक शरीर, जलाऊ लकड़ी के समान, स्वभाव से सुस्त और प्रकाशहीन होता है। स्वयं में उसे जीवन का कोई बोध नहीं होता है। यदि आत्मा भौतिक जीवन से परे है और शरीर को इसकी जागरूकता भी नहीं है, तो निम्नलिखित प्रश्न उठता है: भौतिक अस्तित्व का हमारा अनुभव वास्तव में कैसे होता है? यहाँ सन्निकर्षणम शब्द इंगित करता है कि शुद्ध आत्मा स्वेच्छा से स्वयं को भौतिक शरीर से जोड़ता है, यह एक सबसे उपयोगी व्यवस्था होती है। वास्तव में, यह स्थिति अपार्थ, अनुपयोगी रहती है, जब तक कि कोई अपनी देहधारी स्थिति का उपयोग भगवान की प्रेममयी सेवा में संलग्न होने के लिए नहीं करता। उस समय व्यक्ति का संबंध वास्तव में भगवान कृष्ण के साथ होता है, न कि शरीर के साथ, जो व्यक्ति के उच्चतर उद्देश्य को पूरा करने के लिए मात्र एक साधन बन जाता है।

स्रोत – अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेज़ी), “श्रीमद भागवतम”, ग्यारहवाँ सर्ग, अध्याय 28 – पाठ 10, 11 व 12

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