भले ही किसी व्यक्ति को चंद्रलोक जैसी उच्चतर ग्रह प्रणाली में पदोन्नत किया जा सकता है, व्यक्ति को नीचे आना ही होता है (क्षीणे पुण्ये मर्त्य-लोकम विषंति). पवित्र कर्मों के कारण व्यक्ति के आनंद के समाप्त हो जाने के बाद, व्यक्ति को वर्षा वृष्टि में इस ग्रह पर लौटना ही पड़ता है और पहले किसी पौधे या लता के रूप में जन्म लेना पड़ता है, जिसे मानवों सहित विभिन्न पशुओं द्वारा खाया जाता है, और जो वीर्य में परिवर्तित हो जाता है. यह वीर्य स्त्री शरीर में प्रविष्ट किया जाता है और इस प्रकार जीव जन्म लेता है.

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 15- पाठ 50 और 51

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