“आत्मा और भौतिक शरीर के बीच अतंर को समझने के लिए यह श्लोक बहुत महत्वपूर्ण है. आत्मा अमर है, जैसा कि भगवद-गीता (2.20) में कहा गया है:

न जायते मृयते व कदाचिन् नयम् भूत्वा भावित व न भूयः
अजो नित्यः शाश्वतो यम् पुराणो न हन्यते हन्यमने शरीरे

“आत्मा के लिए कोई जन्म या मृत्यु नहीं होते. न ही, एक बार होकर, उसका अस्तित्व समाप्त नहीं होता. वह अजन्मा, अमर, सदैव-अस्तित्वमान, अमर्त्य और आदि होती है. शरीर के मरने पर वह नहीं मरती.” आत्मा विनाश और परिवर्तन से मुक्त रहते हुए अमर है, जो भौतिक शरीर के कारण होते हैं. वृक्ष औऱ उसके फल और फूल का उदाहरण बहुत सरल और स्पष्ट है. एक वृक्ष कई-कई वर्षों तक खड़ा रहता है, लेकिन ऋतुओं के परिवर्तन के कारण उसके फल और फूल छः रूपांतरणों से गुज़रते हैं. आधुनिक रसायनशास्त्री की मूर्खतापूर्ण अवधारणा, कि रासायनिक प्रक्रिया द्वारा जीवन निर्मित किया जा सकता है, को सत्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता. एक मानव के भौतिक शरीर का जन्म अंडाणु और शुक्राणु के मिश्रण के कारण संभव होता है, लेकिन जन्म का इतिहास है कि भले ही अंडाणु और शुक्राणु संभोग के बाद मिश्रित होते हैं, लेकिन हमेशा गर्भाधान नहीं होता. जब तक कि आत्मा मिश्रण में प्रवेश न करे, गर्भाधान की कोई संभावना नहीं होती, लेकिन जब आत्मा मिश्रण की शरण लेती है तो शरीर जन्म लेता है, अस्तित्वमान होता है, विकसित, रूपांतरित होता है, दुर्बल होता है, और अंततः वह समाप्त हो जाता है. वृक्ष के फल और फूल ऋतुओं के साथ आते और जाते हैं, किंतु वृक्ष विद्यमान बना रहता है. उसी प्रकार, प्रवासी आत्मा विभिन्न शरीर लेती है, जिनमें छः रूपांतरण घटित होते हैं, लेकिन आत्मा स्थायी रूप से समान बनी रहती है (अजे नित्यः शाश्वतो’ यम पुराणो न हन्यते हन्यमने शरीरे). आत्मा अमर और सदा अस्तित्वमान होती है, लेकिन आत्मा द्वारा ग्रहण किए गए शरीर परिवर्तित होते रहते हैं. दो प्रकार कि आत्मा होती हैं–परम आत्मा (परम भगवान का व्यक्तित्व) और व्यक्तिगत आत्मा (जीव). जबकि व्यक्तिगत आत्मा में विभिन्न शारीरिक परिवर्तन घटित होते हैं, परम आत्मा में उत्पत्ति की विभिन्न सहस्त्राब्दियाँ घटित होती हैं. इस संबंध में, माधवाचार्य कहते हैं:

सद् विकाराः शरीरस्य न विष्णोस् तद्- गतस्य
च तद्-अधीनाम् शरीरम् च ज्ञात्व तं ममतम् त्याजेत

चूँकि शरीर आत्मा का बाहीय गुण होता है, आत्मा शरीर पर निर्भर नहीं होती; बल्कि, शरीर आत्मा पर आश्रित होता है. जो यह सत्य समझता है उसे शरीर के पालन के बारे में अधिक चिंता नहीं करना चाहिए. शरीर का पालन स्थायी रूप से या सदैव के लिए करना संभव नहीं है. अंतवंत इमे देह नित्यश्योक्तः शरीरिनः . ऐसा भगवद्-गीता (2.18) का कथन है.
भौतिक शरीर अंतवत (विनाशी) होता है, लेकिन शरीर के भीतर कि आत्मा अमर (नित्यश्योक्तः शरीरिणः) होती है. भगवान विष्णु और वैयक्तिक आत्माएँ, जो उनका ही अंश होती हैं, वे दोनों अमर हैं. नित्यो नित्यनाम चेतनस् चेतनानाम्. भगवान विष्णु प्रमुख जीव हैं, जबकि वैयक्तिक जीव भगवान विष्णु के अंश हैं. शरीरों की सारी विभिन्न श्रेणियाँ — विशाल सार्वभौमिक शरीर से लेकर एक चींटी के छोटे से शरीर तक–विनाशमान हैं, लेकिन गुणों में समान होते हुए, परम आत्मा और आत्मा, दोनों ही अनंतकील तक अस्तित्वमान रहते हैं. ”

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 7- पाठ 18

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