“भगवान कृष्ण के भगवान के परम व्यक्तित्व होने का उदाहरण आध्यात्मिक गुरु को समझने के लिए उपयुक्त है. आध्यात्मिक गुरु को सेवक-भगवान, भगवान के परम व्यक्तित्व का सेवक कहते हैं, और कृष्ण को सेव्य- भगवान, भगवान का परम व्यक्तित्व कहते हैं, जिनकी पूजा करनी चाहिए. आध्यात्मिक गुरु पूजा करने वाले भगवान होते हैं, जबकि भगवान का परम व्यक्तित्व, कृष्ण, पूजा करने योग्य भगवान होते हैं. यही आध्यात्मिक गुरु और भगवान के परम व्यक्तित्व का अंतर है.

एक और बिंदु : भगवद्-गीता, जो भगवान के परम व्यक्तित्व के निर्देशों का विधान करती है, को आध्यात्मिक गुरु द्वारा बिना अंतर के जस की तस प्रस्तुत किया जाता है. इसलिए आध्यात्मिक गुरु में परम सत्य उपस्थित होता है. भगवान का परम व्यक्तित्व समस्त संसार को वास्तविक ज्ञान प्रदान करता है, और आध्यात्मिक गुरु, भगवान के परम व्यक्तित्व के प्रतिनिधि के रूप में, संसार भर में संदेश पहुँचाता है. इसलिए, परम स्तर पर, आध्यात्मिक गुरु और भगवान के परम व्यक्तित्व में कोई अंतर नहीं होता. यदि कोई परम व्यक्तित्व–कृष्ण या भगवान रामचंद्र– को सामान्य मानव मानता है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि भगवान कोई सामान्य व्यक्ति नहीं बन जाते. उसी प्रकार, यदि आध्यात्मिक गुरु, जो भगवान के परम व्यक्तित्व का प्रामाणिक प्रतिनिधि होता है, के पारिवारिक सदस्य, उसे सामान्य मानव मानें, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह सामान्य मनुष्य बन जाता है. आध्यात्मिक गुरु और भगवान के परम व्यक्तित्व समान ही होते हैं, और इसलिए वह व्यक्ति जो आध्यात्मिक प्रगति के लिए बहुत गंभीर हो, उसे आध्यात्मिक गुरु के बारे में ऐसे ही विचार करना चाहिए. इस धारणा से थोड़ा भी विचलन शिष्य के वैदिक अध्ययन और तप में विपत्ति पैदा कर सकता है. ”

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 15 – पाठ 27

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