किसी जीव पर नक्षत्रीय प्रभावों की खगोलीय गणनाएँ अनुमान नहीं हैं बल्कि तथ्यात्मक हैं, जैसा कि श्रीमद्-भागवतम् में पुष्टि की गई है. प्रत्येक जीवित प्राणी प्रत्येक क्षण प्रकृति के नियमों के नियंत्रण में होता है, ठीक राज्य की संप्रभुता के प्रभाव से नियंत्रित नागरिक के समान. राज्य के कानून स्थूल रूप से देखे जा सकते हैं, लेकिन भौतिक प्रकृति के नियम, हमारी सकल समझ के लिए सूक्ष्म होने के कारण, स्थूल रूप से अनुभव नहीं किए जा सकते हैं. जैसा कि भगवद्-गीता (3.9) में कहा गया है, जीवन की प्रत्येक क्रिया किसी अन्य प्रतिक्रिया की उत्पादक होती है, जो कि हम पर बंधनकारी है, और केवल वही लोग प्रतिक्रियाओं के बंधन में नहीं बंधे होते हैं जो यज्ञ (विष्णु) के अनुसार कर्म कर रहे हैं. हमारे कर्मों का मूल्यांकन उच्चतर सत्ताओं, भगवान के प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है, और इस प्रकार हमारी गतिविधियों के अनुसार हमें शरीर प्रदान किए जाते हैं. प्रकृति का नियम इतना गूढ़ है कि हमारे शरीर का हर भाग संबंधित नक्षत्रों द्वारा प्रभावित होता है, और जीव को उसका कार्यकारी शरीर इसलिए प्राप्त होता है कि वह ऐसे खगोलीय प्रभाव की छलयोजना द्वारा अपने कारावास की अवधि को पूरा कर सके. इस प्रकार किसी पुरुष का भाग्य जन्म समय की नक्षत्र स्थिति द्वारा निश्चित होता है, और किसी गुणी ज्योतिषी द्वारा एक वास्तविक राशिफल बनाया जाता है. यह एक वृहद् विज्ञान है, और किसी विज्ञान का दुरुपयोग उसे अनुपयुक्त नहीं बनाता है.

महाराज परीक्षित या स्वयं भगवान का व्यक्तित्व भी नक्षत्रों की किसी विशिष्ट ग्रहदशा में प्रकट होता है, और इस प्रकार शुभ मुहूर्त में जन्मे शरीर पर उसका प्रभाव पड़ता है. नक्षत्रों की सबसे शुभ स्थिति इस संसार में भगवान के प्रकटन की अवधि में होती है, और उसे विशिष्ट रूप से जयंती कहा जाता है, ऐसा शब्द जिसका दुरुपयोग अन्य उद्देश्यों के लिए नहीं किया जाना चाहिए. महाराजा परीक्षित न केवल एक महान क्षत्रिय सम्राट थे, बल्कि भगवान के एक महान उपासक भी थे. इसलिए वे किसी अशुभ क्षण में जन्म नहीं ले सकते. किसी आदरणीय व्यक्तित्व की आगवानी के लिए एक उचित स्थान और समय का चयन किया जाता है, इसलिए महाराजा परीक्षित जैसे व्यक्तित्व की आगवानी के लिए भी, जिनकी चिंता स्वयं भगवान ने की थी, एक उचित क्षण चुना गया, जब सभी शुभ नक्षत्र राजा पर अपने प्रभाव डालने के लिए एक साथ इकट्ठे हो गए. इस प्रकार उनका जन्म केवल श्रीमद्-भागवतम् के महान नायक के रूप में ज्ञात होने के लिए ही हुआ. सूक्ष्म प्रभावों की यह उपयुक्त व्यवस्था कभी भी मनुष्य की इच्छा से रचित नहीं होती, बल्कि परम भगवान की संस्था के उच्चतर प्रबंधन की व्यवस्था होती है. निस्संदेह, यह व्यवस्था जीव के अच्छे या बुरे कर्मों के अनुसार ही की जाती है. यहाँ जीवों द्वारा किए गए पुण्य कर्मों का महत्व है. केवल पुण्य कर्मों द्वारा ही व्यक्ति को संपत्ति, अच्छी शिक्षा और सुंदर रूप-रंग प्राप्त होता है. सनातन-धर्म(मानव का शाश्वत जुड़ाव) की शिक्षा के संस्कार शुभ नक्षत्रीय प्रभावों का लाभ लेने के लिए उचित वातावरण रचने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होते हैं, और इस प्रकार गर्भाधान-संस्कार, या मानव समाज में पवित्र और बुद्धिमान पुरुषों का वर्ग प्राप्त करने के लिए उच्चतर जातियों के लिए बताई गई अंकुरण शुद्धिकरण प्रक्रिया सभी पवित्र कृत्यों का आरंभ है. केवल अच्छी और स्वस्थ चित्त जनसंख्या के कारण ही विश्व में शांति और समृद्धि होगी; नर्क और व्यवधान केवल इसलिए हैं क्योंकि अनिच्छित, उन्मत्त जन काम क्रिया के आदी हैं.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, पहला सर्ग, अध्याय 12- पाठ 12.
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