“जब तक व्यक्ति भगवान के चरण कमलों में चित्त को स्थिर करने में सक्षम नहीं होता, तब तक मन को नियंत्रण में रखना असंभव होता है.
जैसा कि भगवद्-गीता (6.34) में अर्जुन कहते हैं:

चंचलम् हि मनः कृष्ण प्रमथि बलवद् दृढम्
तस्यहम् निग्रहम् मान्ये वायोर् इव सुदुष्कारम्

“हे कृष्ण, चूँकि चित्त अधीर, चंचल, हठी और अत्यंत शक्तिशाली होता है, और मुझे ऐसा लगता है कि उसे वश में रखना पवन को नियंत्रित रखने से भी अधिक कठिन है.” मन को नियंत्रित रखने की एकमात्र प्रक्रिया मन को भगवान की सेवा में एकाग्र करना है. हम चित्त के निर्देशानुसार ही मित्र और शत्रु बनाते हैं, किंतु वास्तव में कोई शत्रु या मित्र नहीं होता. पंडिताः सम-दर्शिणाः. समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिम् लभते परम. यह समझना ही आध्यात्मिक सेवा के राज्य में प्रवेश पाने की मुख्य शर्त होती है. ”

 

स्रोत- अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, सातवाँ सर्ग, खंड 8- पाठ 09

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