मूर्ख लोग आत्मा के अस्तित्व से इंकार करते, लेकिन यह वास्तविकता है कि जब हम सोते हैं तो हम भौतिक शरीर की पहचान भूल जाते हैं और जब हम जागृत होते हैं तब हम सूक्ष्म शरीर की पहचान भूल जाते हैं. दूसरे शब्दों में, सोते समय हम स्थूल शरीर की गतिविधियों को भूल जाते हैं, और स्थूल शरीर में सक्रिय रहते समय हम नींद की गतिविधियों को भूल जाते हैं. वास्तव में–सोने और जागने– की दोनों अवस्थाएँ मायावी ऊर्जा की रचना हैं. जीवों का वास्तविकता में नींद की गतिविधियों या तथाकथित जागृत अवस्था दोनों से ही कोई संबंध नहीं होता. जब कोई व्यक्ति गहरी निद्रा में होता है या जब वह मूर्च्छित हो जाता है, वह अपने स्थूल शरीर को भूल जाता है.

उसी समान, क्लोरोफ़ॉर्म या किसी अन्य बेहोशी की दवा के प्रभाव में, जीव अपने स्थूल शरीर को भूल जाता है और उसे किसी शल्य क्रिया के दौरान पीड़ा या आनंद का अनुभव नहीं होता. समान रूप से, जब किसी व्यक्ति को किसी भारी हानि के कारण धक्का लगता है, तो वह अपने स्थूल शरीर की पहचान भूल जाता है. मृत्यु के समय, जब शरीर का तापमान 107 डिग्री तक पहुँच जाता है, तो जीव अचेत अवस्था में चले जाते हैं और अपने स्थूल शरीर को नहीं पहचान पाते. ऐसे प्रसंगों में, शरीर में भ्रमण करने वाली प्राणवायु अवरुद्ध हो जाती है, और जीव स्थूल शरीर के साथ अपनी पहचान भूल जाता है. आध्यात्मिक शरीर के प्रति हमारे अज्ञान के कारण, जिसका हमें कोई अनुभव नहीं है, हम आध्यात्मिक शरीर की गतिविधियाँ नहीं जानते, और अज्ञानतावश हम एक झूठे स्तर से दूसरे तक भटकते रहते हैं. हम कभी स्थूल शरीर के संबंध में और कभी सूक्ष्म शरीर से संबंधित गतिविधियाँ करते हैं. यदि, कृष्ण की कृपा से, हम अपने आध्यात्मिक शरीर के अनुसार कर्म करें, तो हम स्थूल और शरीर दोनों को उच्च स्तर पर रूपांतरित कर सकते हैं. दूसरे शब्दों में, हम धीरे-धीरे स्वयं को आध्यात्मिक शरीर के संदर्भ में कार्य करने के लिए प्रशिक्षित कर सकते हैं. जैसा कि नारद-पंचरात्र में कहा गया है, ह्रिषिकेण ह्रिषिकेश-सेवनम् भक्तिर् उच्यते: धार्मिक सेवा का अर्थ है कि आध्यात्मिक शरीर और आध्यात्मिक इंद्रियों को भगवान की सेवा में लगाना. जब हम ऐसी गतिविधियों में रत होते हैं, तब स्थूल और सूक्ष्म शरीरों की प्रतिक्रियाएँ रुक जाती हैं.

अभय भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण – अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, चतुर्थ सर्ग, अध्याय 29 – पाठ 71

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