धर्म में चार प्राथमिक विषय शामिल होते हैं: (1) पवित्र कर्म, (2) आर्थिक विकास, (3) इंद्रियों की संतुष्टि, और (4) भौतिक बंधन से मुक्ति. धार्मिक जीवन बर्बरता के अधार्मिक जीवन से अलग है. निस्संदेह, यह कहा जा सकता है कि मानव जीवन वास्तव में धर्म से शुरू होता है. पशुओं के जीवन के चार सिद्धांत- खाना, सोना, सुरक्षा करना और संभोग करना- पशुओं और मनुष्यों दोनों में समान है, लेकिन धर्म मानव की अतिरिक्त चिंता है. चूँकि धर्म के बिना मानव जीवन, पशु जीवन से श्रेष्ठ नहीं है, वास्तविक मानव समाज में धर्म का कोई ऐसा रूप होता है जो आत्म बोध को लक्षित करता है और भगवान के साथ व्यक्ति के शाश्वत संबंध का संकेत करता है. मानव सभ्यता के निचले चरण में भौतिक प्रकृति पर हावी होने के उनके प्रयासों में मानव के बीच हमेशा प्रतिस्पर्धा बनी रहती है.

दूसरे शब्दों में, इंद्रियों को संतुष्ट करने के प्रयास में निरंतर प्रतिद्वंद्विता बनी रहती है. इसलिए, इंद्रियतुष्टि की चेतना से प्रेरित, मानव धार्मिक अनुष्ठानों का अभिनय करते हैं. इसलिए पवित्र कर्म और धार्मिक समारोह कुछ भौतिक लाभों को लक्ष्य में रख कर किए जाते हैं, और यदि ऐसा भौतिक लाभ किसी अन्य विधि से प्राप्य हो, तो इस तथाकथित धर्म को अनदेखा कर दिया जाता है. इसे आधुनिक मानव सभ्यता में देखा जा सकता है. चूंकि लोगों की आर्थिक इच्छाएं अन्य विधियों से पूरी होती दिखाई देती हैं, इसलिए अब किसी को भी धर्म में कोई रुचि नहीं है. चर्च, मस्जिद और मंदिर व्यावहारिक रूप से खाली हैं, क्योंकि लोग कारखानों, दुकानों और सिनेमाघरों में अधिक रुचि रखते हैं. इस प्रकार वे अपने पूर्वजों द्वारा बनाए गए धार्मिक स्थानों को छोड़ चुके हैं. यह इस बात का प्रमाण है कि धर्म आम तौर पर आर्थिक विकास के लिए किया जाता है, और आर्थिक विकास की आवश्यकता इंद्रिय संतुष्टि के लिए होती है.जब कोई इंद्रिय संतुष्टि पाने के अपने प्रयास में विफल होता है, तो वह परम संपूर्ण के साथ एक होने के लिए मोक्ष का कारण तक जाता है. ये सभी गतिविधियाँ एक ही उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उत्पन्न होती हैं – इंद्रिय संतुष्टि.

स्रोत:अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2012 संस्करण, अंग्रेजी), “भगवान चैतन्य, स्वर्ण अवतार की शिक्षाएँ”, पृ. 289 और 290
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