दो ऊर्जाएं हैं – भौतिक और आध्यात्मिक – और दोनों मूल रूप से कृष्ण से आती हैं. दो ऊर्जाओं में से [आत्मा और निष्क्रिय पदार्थ] प्रकट होते हैं, जिन प्राणियों के पास जीवन शक्ति [सब्जियां, घास, पेड़ और पौधे] होती है वे निष्क्रिय पदार्थों [पत्थर, पृथ्वी, आदि] से श्रेष्ण होते हैं. गतिहीन पौधों और वनस्पतियों से कीड़े और साँप श्रेष्ठ हैं, जो गतिशील रह सकते हैं. कीड़े और सांपों से बेहतर वे जानवर हैं जिन्होंने बुद्धि विकसित की है. पशुओं से मानव श्रेष्ठ होते हैं, मानवों से भूत श्रेष्ठ होते हैं क्योंकि उनके कोई भौतिक शरीर नहीं होते. भूतों से श्रेष्ठ गंधर्व होते हैं, और उनसे श्रेष्ठ सिद्ध होते हैं. सिद्धों से श्रेष्ठ किन्नर होते हैं, और उनसे श्रेष्ठ असुर होते हैं. असुरों से श्रेष्ठ देवता हैं, और देवताओं में, स्वर्ग के राजा, इंद्र श्रेष्ठतम हैं. इंद्र से श्रेष्ठ भगवान ब्रम्हा के प्रत्यक्ष पुत्र हैं, राजा दक्ष जैसे पुत्र, और ब्रम्हा के पुत्रों में भगवान शिव श्रेष्ठ हैं. चूँकि भगवान शिव भगवान ब्रम्हा के पुत्र हैं, इसलिए ब्रम्हा को उच्चतर माना जाता है, लेकिन ब्रम्हा भी मेरे, भगवान के परम व्यक्तित्व के अधीन हैं. चूँकि मेरा झुकाव ब्राम्हणों की ओर है, ब्राम्हण सबसे श्रेष्ठ होते हैं. भगवान को ब्रह्मयज्ञ के रूप में पूजा जाता है. भगवान भक्तों या ब्राह्मणों पर बहुत अनुराग रखते हैं. इसमें तथाकथित जाति के ब्राह्मणों का उल्लेख नहीं है, बल्कि योग्य ब्राह्मणों का है. ब्राह्मण को आठ गुणों जैसे कि साम, दाम, सत्य और तितीक्षा से योग्य होना चाहिए. ब्राह्मणों की हमेशा पूजा की जानी चाहिए, और उनके मार्गदर्शन में शासक को अपने कर्तव्य का निर्वहन करना चाहिए और नागरिकों पर शासन करना चाहिए. दुर्भाग्य से, कलि के इस युग में, कार्य करने वाले का चयन बहुत बुद्धिमान लोगों द्वारा नहीं किया गया है, और न ही उसे योग्य ब्राह्मणों द्वारा निर्देशित किया गया है. परिणामस्वरूप, अराजकता पैदा होती है. जनता को कृष्ण चेतना में शिक्षित किया जाना चाहिए ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुसार वे सरकार का नेतृत्व करने के लिए भरत महाराजा जैसे प्रथम श्रेणी के भक्त का चयन कर सकें. यदि राज्य को मुखिया का नेतृत्व योग्य ब्राम्हणों द्वारा किया जाता है, तब सब कुछ श्रेष्ठ होता है.

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण – अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, पांचवाँ सर्ग, अध्याय 21 – पाठ 22

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