आध्यात्मिक पथ पर प्रगति कैसे करें?

खैर, हमारे मन में सृष्टि के संबंध में अंतहीन प्रश्न हैं, उनमें से कुछ हैं, हमारे अस्तित्व का उद्देश्य, दुनिया में इतनी पीड़ा और असमानता क्यों है, आदि. और यदि हम अधिकृत शास्त्रों को देखें तो हमें अपने प्रश्नों के उत्तर मिल सकते हैं. यद्यपि, यदि हम अपने आध्यात्मिक जीवन में गंभीरता से प्रगति करना चाहते हैं, तो ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है.

जीवन की भौतिक अवधारणा में, हम इंद्रिय संतुष्टि के प्रसंग में व्यस्त हैं जैसे कि हम निम्नतर, पशु अवस्था में हों. इंद्रिय संतुष्टि की इस अवस्था से थोड़ा उठकर, व्यक्ति भौतिक चंगुल से निकलने के उद्देश्य से मानसिक अटकलों में उलझ जाता है. इस अटकल भरी स्थिति से थोड़ा ऊँचा होने पर, जब व्यक्ति पर्याप्त बुद्धिमान होता है तो व्यक्ति भीतर और बाहर के सभी कारणों के परम कारण का पता लगाने का प्रयास करता है. और जब कोई वास्तविक रूप से आध्यात्मिक समझ के धरातल पर होता है, तो वह इंद्रिय, मन और बुद्धि के चरणों को पार कर लेता है, तब वह पारलौकिक स्तर पर अवस्थित हो जाता है.

आध्यात्मिक जीवन में प्रगति के लिए व्यक्ति को प्रक्रिया का पालन करना होता है. तो प्रश्न है कौनसी प्रक्रिया? क्या वह प्रक्रिया उदात्त है और मार्गदर्शन के लिए हमें किसके पास जाना चाहिए.

प्रक्रिया सुनने (श्रवणम) से शुरू होती है यह भक्ति सेवा का पहला चरण है. इस युग में, वेदों के नियामक सिद्धांतों और अध्ययनों का भली प्रकार से पालन करना बहुत कठिन है, जिनकी अनुशंसा पूर्व में की जाती थी. यद्यपि, यदि व्यक्ति महान भक्तों और आचार्यों द्वारा गुंजायमान ध्वनि को श्रवण से स्वीकार करता है, तो केवल उसके माध्यम से ही उसे सभी सांसारिक प्रदूषणों से मुक्ति मिल जाएगी. इसलिए चैतन्नय महाप्रभु का सुझाव है कि व्यक्ति को केवल उन विद्वानों का श्रवण करना चाहिए जो वास्तव में भगवान के भक्त हैं. व्यावसायिक व्यक्तियों के श्रवण से कोई लाभ नहीं होगा. यदि हम उनका श्रवण करें जो वास्तव में आत्म-ज्ञानी हैं, तो फिर अमृत की वे नदियाँ जो चंद्र ग्रह पर बहती हैं, हमारे कानों में बहने लगेंगी.

भगवद-गीता और श्रीमद्-भागवतम पर प्रामाणिक व्याख्यानों के ऑडियो ऑनलाइन या कृष्ण चेतना आंदोलन से जुड़े अन्य भक्तों द्वारा सरलता से मिल सकते हैं. यहाँ प्रामाणिक शब्द इसलिए, क्योंकि कई अनधिकृत संस्करण स्वतंत्र रूप से ऑनलाइन उपलब्ध हैं. व्यक्ति को इस बारे में सावधान रहना चाहिए कि वे क्या सुन रहे हैं, क्योंकि यह पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात है.

भक्ति सेवा निष्पादित करने में अगला महत्वपूर्ण चरण जप (कीर्तनम) है, हरे कृष्ण मंत्र का जाप आध्यात्मिक धरातल से किया जाता है, और इस प्रकार यह ध्वनि कंपन चेतना के सभी निचले स्तरों — अर्थात् कामुक, मानसिक और बौद्धिक स्तरों को पार कर जाता है. इसलिए, मंत्रों की भाषा को समझने की कोई आवश्यकता नहीं है, न ही इस महामंत्र को जपने के लिए मानसिक अटकलों, या किसी बौद्धिक समायोजन की ही आवश्यकता होती है (महा का अर्थ है महान; मंत्र का अर्थ है “वह ध्वनि जो मन को अज्ञान से मुक्त करती है)”. ऐसा आध्यात्मिक धरातल से स्वतः ही होता है, और इस प्रकार, कोई भी व्यक्ति पूर्ववर्ती योग्यता के बिना जप में भाग ले सकता है.

कृष्ण या क्राइस्ट – नाम समान ही है. मुख्य बात है वैदिक निर्देशों का पालन करना जो इस युग में भगवान का नाम जपने का सुझाव देते हैं. सबसे सरल विधि है कि महा-मंत्र का जाप करें: हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे / हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे.

राम [हे परम भोक्ता] और कृष्ण [हे सर्व-आकर्षक भगवान] भगवान के नाम हैं, और हरे [भगवान की ऊर्जा है]. अतः जब हम महा-मंत्र का जाप करते हैं, तो हम भगवान को उनकी ऊर्जा के साथ-साथ संबोधित करते हैं. जप करना कृष्ण की प्रार्थना है, इसलिए हरे कृष्ण महा-मंत्र की शुरुआत में, हम पहले कृष्ण की आंतरिक ऊर्जा को संबोधित करते हैं, [हरे] का अर्थ है कि “हे राधारानी! ओ, हरे! हे भगवान की ऊर्जा! ” जब हम किसी को इस प्रकार से संबोधित करते हैं, तो वह सामान्यतः पर कहता है, “हाँ, आप क्या चाहते हैं?” उत्तर है, “कृपया मुझे अपनी सेवा में संलग्न कर लें.”

जिस प्रकार भौतिक संसार में नर और नारी होते हैं, उसी प्रकार ईश्वर मूल नर (पुरुष) हैं, और उनकी ऊर्जा (प्रकृति) मूल स्त्री हैं. यह ऊर्जा दो प्रकार की होती है, आध्यात्मिक और भौतिक. वर्तमान में हम भौतिक ऊर्जा के चंगुल में फँसे हैं. इसलिए हम कृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि वह हमें भौतिक ऊर्जा की सेवा से निकाल लें और हमें आध्यात्मिक ऊर्जा की सेवा में स्वीकार करें. नारद-पंचरात्र में यह कहा गया है कि सभी वैदिक अनुष्ठान, मंत्र और ज्ञान आठ शब्दों में संक्षिप्त होते हैं, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे. इसी प्रकार, काली-संतारण उपनिषद में कहा गया है कि ये सोलह शब्द, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे / हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, विशेष रूप से कलि के इस भौतिकवादी युग के, पतनकारी और प्रदूषणकारी प्रभाव का प्रतिकार करने के लिए हैं.

यह जप अपनी माँ की उपस्थिति के लिए किसी बालक के क्रंदन के समान ही है. माता हरा भगवान, पिता की कृपा प्राप्त करने में भक्त की सहायता करती हैं, और भगवान उस भक्त के सामने प्रकट हो जाते हैं जो निष्ठा के साथ इस मंत्र का जप करता है.

भगवान ने कृपा करके हमारे लिए उनके नामों का जप करना बहुत सरल बना दिया है, और उन्होंने अपनी सारी शक्तियाँ भी उनमें डाल दी हैं. इसलिए भगवान का नाम और स्वयं भगवान एक समान हैं. इसका अर्थ यह है कि जब हम पवित्र नामों का जप करते हैं तो हम सीधे भगवान से जुड़ जाते हैं और शुद्ध हो जाते हैं. इसलिए हमें सदैव भक्ति और श्रद्धा के साथ जप करने का प्रयास करना चाहिए. जितने ध्यान से और निष्ठा के साथ आप भगवान के इन नामों का जप करेंगे, उतनी ही आप आध्यात्मिक उन्नति करेंगे.

आप कहीं भी और किसी भी समय भगवान के इन पवित्र नामों का जप कर सकते हैं, किंतु नियमित जप करने के लिए दिन का एक निश्चित समय निर्धारित करना सर्वश्रेष्ठ होता है. प्रातः काल का समय आदर्श होता है. जब आप जप करते हैं, तो प्रार्थनापूर्ण मनोदशा में कृष्ण को संबोधित करते हुए, विशिष्ट और स्पष्ट रूप से नामों का उच्चारण करें. जब आपका मन भटकता है, तो इसे भगवान के नामों की ध्वनि पर वापस ले आएँ.

जब आप अकेले जप करते हैं, तो जप माला पर जप करना सबसे उत्तम होता है. इससे आपको पवित्र नाम पर अपना ध्यान केंद्रित करने में सहायता मिलती है. प्रत्येक जप माला में 108 छोटे मनके और एक बड़ा, मुख्य मनका होता है. मुख्य मनके के अगले मनके पर शुरु करें और धीरे-धीरे माला को अपने दाहिने हाथ के अंगूठे और मध्य उंगली के बीच घुमाएँ और साथ ही संपूर्ण हरे कृष्ण मंत्र का जप करें. फिर अगले मनके पर जाएँ और प्रक्रिया दोहराएँ. इस प्रकार, 108 मनकों में से प्रत्येक पर तब तक जप करें जब तक कि आप फिर से मुख्य मनके तक न पहुँच जाएँ. यह जप का एक चक्र होता है. फिर मुख्य मनके पर जप के बिना, मनकों को पलट दें और अपने जप के पिछले मनके पर अपना दूसरा चक्र शुरु करें.

आप प्रतिदिन दो चक्रों के साथ प्रारंभ कर सकते हैं और धीरे-धीरे हर दिन अपने जप के चक्र की संख्या बढ़ा सकते हैं. शास्त्रों के अनुसार, यदि हम प्रतिदिन 64 चक्र पूरे नहीं कर रहे हैं तो हम पतित आत्मा माने जाते हैं. यद्यपि, 64 चक्रों का जप करने के लिए दैनिक आधार पर लगभग 7-8 घंटे की आवश्यकता होगी जो कि कलि के इस युग में हममें से कई लोगों के लिए संभव नहीं है. इसलिए दया के रूप में, श्रील प्रभुपाद ने सुझाव दिया है कि हमें प्रतिदिन न्यूनतम 16 चक्र और एकादशी के दिन 25 चक्र का जप करना चाहिए. (यह पूर्णिमा के बाद ग्यारहवें दिन और अमावस्या के बाद ग्यारहवें दिन होती है). यदि आप एक व्यावसायिक कर्मचारी हैं, तो आपको हर दिन 16 चक्र लगाने में लगभग 2 घंटे लगाने होंगे. यद्यपि, हममें से कई लोगों को लंबे समय तक कार्य करने और समय निकालने में कठिनाई हो सकती है. इसलिए, भौतिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन को संतुलित करने की आवश्यकता है. इसे अनुशासित जीवन जीकर संभव बनाया जा सकता है. जल्दी सोना और जल्दी जागना इसकी कुंजी है. कई भक्त सुबह जल्दी उठते हैं (सुबह लगभग 4:00 बजे) और कार्यालय के लिए प्रारंभ करने से पहले 16 चक्र पूरा करने में सक्षम होते हैं. जब तक आप सशक्त और दृढ़ नहीं हो जाते, तब तक अपने कार्यक्रम को अचानक बदलना भी उचित नहीं है. आपको धीरे-धीरे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की आवश्यकता है, यदि आप सामान्य रूप से सुबह देर से उठते हैं अर्थात सुबह 6:00 बजे के बाद, तो आप सुबह 5: 00-5: 30 बजे उठ सकते हैं और फिर धीरे-धीरे 4: 00-4: 30 बजे की ओर बढ़ सकते हैं. वैदिक शास्त्रों में सोने के लिए सबसे अच्छा समय रात्रि 9:30 बजे से प्रातः 3:30 बजे / 10:00 बजे से प्रातः 4:00 बजे तक रखने का सुझाव दिया गया है, क्योंकि रात 9:00 से 12:00 के बीच की नींद 6 घंटे के बराबर होती है. रात्रि 12:00 से प्रातः 3:00 तक 3 घंटे के बराबर होती है. और प्रातः 3:00 से 6:00 बजे तक 1.5 घंटे के बराबर होती है. इसलिए जितनी जल्दी आप सोते हैं, आपको अपने दैनिक अनुशंसित नींद को पूरा करने के लिए उतने ही कम घंटों की आवश्यकता होगी. इसके अतिरिक्त, कामकाजी भक्त कार्यालय से आने और जाने के दौरान शास्त्रों को पढ़ते और सुनते हैं, जिस समय का उपयोग सामान्यतः संगीत सुनने या मोबाइल पर इंटरनेट ब्राउज़ करने में किया जाता है. धीरे-धीरे, यह एक दिनचर्या बन जाएगी और आप अपने भौतिक जीवन / कर्तव्यों का ध्यान रखने में सक्षम हो जाएंगे और साथ ही साथ अपने जीवन को फिर से जीवंत कर पाएंगे.

श्रवण (श्रवणम) और जप (कीर्तनम) दो बहुत महत्वपूर्ण चरण होते हैं, जिन्हें भक्तिपूर्ण जीवन के प्रारंभ में निष्पादित करने की आवश्यकता होती है. यद्यपि, भक्ति सेवा अर्जित करने के लिए अकेले व्यक्ति द्वारा आकंक्षा करना आशातीत नहीं है, क्योंकि कृष्ण किसी भी व्यक्ति को भक्ति सेवा का पुरस्कार देने के लिए सहमत नहीं होते हैं. कृष्ण सरलता से किसी व्यक्ति को भौतिक सुख या मुक्ति प्रदान कर सकते हैं, लेकिन वह अपनी भक्ति सेवा में किसी व्यक्ति को संलग्नता देने के लिए बहुत रसलता से सहमत नहीं होते हैं. इसलिए, अगला महत्वपूर्ण चरण एक आध्यात्मिक गुरु की शरण लेना होता है, आध्यात्मिक गुरु से दीक्षा प्राप्त करना, आध्यात्मिक गुरु की सेवा करना, आध्यात्मिक गुरु से प्रेम करना सीखना और भगवान की पारलौकिक प्रेममयी सेवा के लिए समर्पित पवित्र व्यक्तियों के चरणों का अनुसरण करना.

भक्ति सेवा वास्तव में शुद्ध भक्त की दया से ही प्राप्त हो सकती है. चैतन्य-चरितामृत में कहा गया है : “आध्यात्मिक गुरु की दया से जो एक शुद्ध भक्त होता है और कृष्ण की दया से व्यक्ति भक्ति सेवा के स्तर को प्राप्त कर सकता है. अन्य कोई मार्ग नहीं है.”

किसी नवदीक्षित भक्त के लिए उक्त प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक होता है जो भक्ति सेवा के मार्ग पर चलना प्रारंभ कर रहा है. इसके अतिरिक्त, उसे आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ने के लिए कुछ नियामक सिद्धांतों का पालन करना होगा, जो इस प्रकार हैं:

जो नहीं करना है
● माँस भक्षण नहीं
● कोई नशा नहीं (चाय, कॉफ़ी और चॉकलेट सहित)
● जुआ नहीं
● अनैतिक मैथुन नहीं (विवाह के अतिरिक्त मैथुन)

जो करना है

● भक्तों की संगति करना
● भगवद्-गीता, श्रीमद्-भागवतम जैसे प्रामाणिक ग्रंथों और शिष्य परंपरा में अन्य भक्तों जैसे श्रील प्रभुपाद द्वारा लिखी पुस्तकें पढ़ना
● केवल प्रसाद स्वीकार करें (भोजन पहले भगवान को अर्पित किया जाता है). यदि आप कामकाजी हैं तो भोग लगे भोजन को घर से ही रखने का प्रयास करें (भगवान को बिना प्याज और लहसुन के शुद्ध शाकाहारी भोजन अर्पित किया जाना चाहिए). यदि आपको बाहर भोजन करना पड़ता है या आप यात्रा कर रहे हों, तो बिना प्याज और लहसुन के भोजन का ऑर्डर करें और भोजन में तुलसी पत्र डालें.
● एकादशी के दिन उपवास करें. ऐसे दिन अन्न, दालें या फलियाँ नहीं खाई जातीं; केवल सब्जियाँ और उचित मात्रा में दूध लिया जाता है, और हरे कृष्ण का जप और ग्रंथों का अध्ययन बढ़ा दिया जाता है.
● भक्तों, गायों और पवित्र वृक्षों जैसे वट वृक्ष का सम्मान करें.

आपके आध्यात्मिक जीवन की सफलता इस बात पर निर्भर होती है कि आप प्रक्रिया का पालन कितनी गंभीरता से करते हैं. आपको एक चरण उठाना है और कृष्ण आपको सफल बनाने के लिए 10 चरण उठाएँगे.

पुनश्च – यदि आपको इस बारे में सहायता और मार्गदर्शन की आवश्यकता है कि भक्ति सेवा को सफलतापूर्वक संपन्न कैसे करें तो हमें लिखने में कृपया संकोच न करें. अपने विचार/अनुभव साझा करने के लिए (contact us) अनुभाग पर जाएँ. हरे कृष्ण, हरिबोल!!