उच्च वर्गों के पुरुष–ब्राम्हण, क्षत्रिय और वैश्य–निम्न वर्ग की स्त्रियों के गर्भ में संतान को जन्म नहीं देते. इसलिए वैदिक समाज में विवाह योग्य युवती और युवक की कुंडली का परीक्षण करने की परंपरा यह देखने के लिए होती है कि उनका संगम अनुकूल होगा या नहीं. वैदिक ज्योतिष उजागर करता है कि जातक भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार विप्र-वर्ण, क्षत्रिय वर्ण, वैश्य वर्ण या शूद्र वर्ण में जन्मा है. इसकी जाँच आवश्यक है क्योंकि किसी विप्र वर्ण के युवक और शूद्र वर्ण की कन्या का विवाह प्रतिकूल होता है; दांपत्य जीवन पति-पत्नी दोनों के लिए कष्टमय होगा. अतः किसी युवक को अपने समान वर्ण की कन्या से विवाह करना चाहिए. निस्संदेह यह त्रै-गुण्य है, वेदों के अनुसार एक भौतिक गणना, लेकिन यदि युवक व कन्या दोनों भक्त हों तो इस प्रकार विचार करने की आवश्यकता नहीं होती है. भक्त अतींद्रिय होता है, और इसलिए भक्तों के बीच विवाह में, युवक और युवती एक बहुत सुखी संगम का निर्माण करते हैं.

अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (2014 संस्करण, अंग्रेजी), “श्रीमद् भागवतम्”, छठा सर्ग, अध्याय 2- पाठ 26

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